The Mysterious Bell – Chapter 250
मैंने प्रिंसिपल की तरफ़ देखा।
"सर," मैंने कहा, "छत पर कितने बच्चे हैं?"
प्रिंसिपल ने ऊपर देखा और उनका चेहरा फिर बदला।
"कम से कम दस," उन्होंने कहा। "और मैंने कहा था — आज छत बंद रहेगी।"
"पर बंद नहीं हुई," मैंने कहा। "क्योंकि ताले की चाबी आपके पास है, मेरे पास है, और रमा मैडम के पास है। और तीसरी चाबी टिंकू के मोज़े में है। तो बच्चे ऊपर कैसे गए?"
रमा मैडम ने कहा, "छत का दूसरा रास्ता है। पिछली सीढ़ी से, स्टोर के ऊपर से। वो दरवाज़ा कभी बंद ही नहीं होता।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"उस्ताद," उसने धीमे से कहा, "अगर बच्चे वहाँ हैं, और वो लोग सुबह सात बजे मशीन लेकर आएँ…"
"तो कोई नहीं चढ़ेगा," मैंने कहा। "क्योंकि छत पर आज हम होंगे।"
मैं सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। रमा मैडम मेरे पीछे आईं।
"मैं भी चलती हूँ," उन्होंने कहा। "ये बच्चे मेरे हैं।"
और यहीं मुझे पहली बार लगा कि स्कूल की असली इमारत पत्थर और चूने की नहीं है। असली इमारत इन्हीं लोगों की आवाज़ों से बनी है, जो एक-दूसरे के पीछे सीढ़ी चढ़ रही हैं।
छत पर पहुँचकर मैं कुछ पल के लिए खड़ा रह गया।
मैंने इस छत को नीचे से कई बार देखा था, दुकान की छत से भी, गली से भी, और सोचा था कि यह सिर्फ़ एक पुरानी छत है जिस पर बच्चे पतंग उड़ाते हैं। पर ऊपर आकर पता चला कि यह छत एक अलग दुनिया है।
चारों तरफ़ सीमेंट की चौड़ी पट्टी, बीच में टीन से ढका एक हिस्सा, किनारे पर लोहे की जंग लगी रेलिंग, और रेलिंग के उस पार पूरी बस्ती। मुझे पीपल दिख रहा था, चबूतरी दिख रही थी, उस्ताद की दुकान दिख रही थी, शबनम आपा की गुमटी, और उसके आगे मेरी अपनी दुकान की छत।
सब कुछ इतना छोटा लग रहा था, जैसे किसी ने पूरी गली को एक बक्से में रख दिया हो।
और उसी बक्से में — मैं भी।
बच्चे पतंग उड़ा रहे थे। चिंटू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, और पाँच-छह और। एक लड़का पतंग की डोर पकड़े भाग रहा था और दूसरा चिल्ला रहा था कि काट दो, काट दो।
"सब नीचे!" मैंने आवाज़ दी।
बच्चों ने पलटकर देखा। चिंटू ने पतंग की डोर मुझे दी, जैसे वो कोई गुनाह कर रहा हो।
"उस्ताद, हम तो बस—"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "तुम बस पतंग उड़ा रहे थे। पर यह छत आज सुरक्षित नहीं है।"
"क्यों?" सानिया ने पूछा।
"क्योंकि कल सुबह सात बजे यहाँ मशीन आएगी, और जो छत कल तक तुम्हें पतंग उड़ाने दे रही थी, वही छत कल तुम्हें गिरने से नहीं बचा पाएगी।"
चिंटू ने अपने घुटने की तरफ़ देखा, जिस पर पट्टी बँधी थी — कल की गिरावट का निशान।
रमा मैडम आगे आईं।
"नीचे चलो, बच्चों। सब के सब। और जो पतंग उड़ा रहे हैं, वो भी।"
बच्चे धीरे-धीरे रेलिंग छोड़ने लगे। पर एक बच्चा नहीं हिला।
वो रेलिंग के पास खड़ा था, दस-ग्यारह साल का, छोटी कमीज़, गोल चेहरा। उसने अपनी डोर कसकर पकड़ी थी और आसमान की तरफ़ देख रहा था।
"ये किसकी पतंग है?" मैंने पूछा।
"मेरी," उसने बिना पलटे कहा। "और ये नीचे नहीं आएगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये आख़िरी है। फिर तो छत ही नहीं रहेगी न।"
मुझे कुछ कहना चाहिए था। पर मेरे अंदर से आवाज़ नहीं निकली।
रमा मैडम उसके पास गईं और उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"वो बात सच है," उन्होंने कहा। "छत कल शायद न रहे। पर तुम यहाँ आज खड़े हो — तुम रहोगे। और जब तुम रहोगे, तो पतंग भी रहेगी। हम नई छत बनवा लेंगे।"
"बबलू वाला काका नहीं बनवाएगा," बच्चे ने कहा। "वो तो सिर्फ़ तोड़ता है।"
मैंने उसकी डोर धीरे से पकड़ी।
"तो हम बनवाएँगे," मैंने कहा। "पर पहले नीचे चलो। और अपनी पतंग मेरे हवाले करो। मैं इसे दुकान पर रखूँगा, तुम्हारे नाम की एक लकड़ी पर लिखकर। जब नई छत बनेगी, तुम यहीं से उड़ाना।"
"सच?"
"सच।"
उसने डोर मेरे हाथ में दी और रेलिंग से हट गया। बच्चे धीरे-धीरे सीढ़ी की तरफ़ बढ़ने लगे। और ठीक उसी वक़्त, जब आख़िरी बच्चा सीढ़ी के मुँह पर पहुँचा, मैंने पीछे मुड़कर देखा।
आँगन में कोई खड़ा था।
वेद सर। उनका काला फटा बैग कंधे पर था, और वो ऊपर देख रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई आदमी अपनी ही क़ब्र का पत्थर पढ़ रहा हो।
और उनके पीछे, स्टाफ के कमरे के दरवाज़े पर, शालिनी मैडम खड़ी थीं।
मैं सीढ़ी से नीचे उतरा। रमा मैडम ने बच्चों को सीधे क्लासरूम में भेज दिया और खुद मेरे पीछे आईं।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
वेद सर ने बैग खोला। उसमें से काग़ज़ों का एक बंडल निकाला — मोटा, जूट के धागे से बँधा, बाहर से पीला और अंदर से स्याही की गंध वाला।
"यह मिला," उन्होंने कहा, "स्टोर के पीछे की अलमारी में। शालिनी मैडम की जगह पर।"
शालिनी मैडम आगे आईं। उनका चेहरा वैसा ही था जैसा कल झगड़े के वक़्त था। पर इस बार आवाज़ में मिठास थी, जो शक से ज़्यादा डरावनी लगती है।
"मेरी जगह पर?" उन्होंने कहा। "वेद जी, वो अलमारी दोनों की है। और उसकी चाबी सिर्फ़ प्रिंसिपल के पास है।"
"तो फिर यह वहाँ कैसे पहुँचा?" वेद सर ने बंडल मेज़ पर रख दिया।
मैंने बंडल खोला।
अंदर परीक्षा के काग़ज़ थे — असली, जिन पर नंबर लिखे थे, कुछ पर मिट्टी के निशान थे। और उनके बीच से एक अलग काग़ज़ निकला — मोड़ा हुआ, पेंसिल से लिखा, जिस पर तीन लाइनें थीं — एक नंबर, एक नाम, और एक तारीख़।
मैंने वो काग़ज़ उठाया और पढ़ा।
फिर मैंने देखा कि शालिनी मैडम का चेहरा उस काग़ज़ को देखकर कैसे बदला।
"ये…" उन्होंने कहा, "ये मेरी लिखाई नहीं है।"
वेद सर हँसे — वो हँसी जिसमें हँसी नहीं होती।
"बिल्कुल मेरी भी नहीं है," उन्होंने कहा। "तो फिर किसकी है?"
मैंने दोनों को देखा। दोनों खड़े थे, दोनों का चेहरा सख़्त, और दोनों की आँखों में वो बात थी जो सिर्फ़ एक बात कहती है — कि दोनों में से कोई एक झूठ बोल रहा है।
और मुझे याद आया कि कल मैंने इन दोनों को एक कमरे में बैठाया था, दोनों ने माफ़ी माँगी थी, और दोनों ने वादा किया था कि आज नौ बजे साथ प्रिंसिपल के पास जाएँगे।
"आज सुबह नौ बजे तुम दोनों कहाँ थे?" मैंने पूछा।
शालिनी मैडम ने नज़रें चुराईं। वेद सर ने सीधा मुझे देखा।
"मैं यहाँ था," उन्होंने कहा। "अकेला।"
"और मैं," शालिनी मैडम ने कहा, "अपनी बेटी के पास। जिसका बुखार अभी भी है।"
वो दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और मैं बीच में खड़ा था। फिर रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो कहती थी — अंकुश, तू कल इन्हें जोड़ चुका था। आज ये फिर टूट रहे हैं। और अगर ये टूटे, तो सारे अंक दुगुने कटेंगे।
मैंने घंटी जेब में दबाई और मन ही मन कहा।
"अभी नहीं खरीदना। बस बता — क्या ये रिश्ता फिर टूटा है?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया। पर मुझे लगा कि वो चुप्पी भी एक जवाब थी।
मैंने दोनों को देखा और कुर्सी खींचकर बैठ गया।
"बैठिए," मैंने कहा।
"क्यों?" वेद सर ने पूछा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "आज सुबह दस बजे चबूतरी पर सौ आदमी बैठेंगे। और अगर उन सौ में से किसी ने भी पूछा कि स्कूल में परीक्षा के काग़ज़ चोरी हुए थे या नहीं, तो जवाब मुझे देना पड़ेगा। और मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
दोनों बैठ गए।
मैंने काग़ज़ उनके बीच रखा।
"अब बताइए," मैंने कहा। "इसमें जो नाम है, वो असली है या नक़ली? और जिसने यह लिखा, वो क्या चाहता था — शालिनी मैडम को फँसाना, या वेद सर को?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno