The Mysterious Bell – Chapter 249
रमा मैडम ने सिर हिलाया, पर वो कुछ कहने ही वाली थीं कि गली से एक स्कूटर की आवाज़ आई।
बबलू.
मैंने उसे स्कूटर से उतरते देखा। उसके पीछे वही दो आदमी, एक के हाथ में मोटी लाठी, दूसरे के हाथ में काला बैग। वो आज पान नहीं चबा रहा था, और यही सबसे बड़ी खबर थी। जो आदमी अपनी आदत छोड़ दे, वो कुछ बड़ा करने आया होता है।
प्रिंसिपल साहब सीढ़ी से उतर रहे थे। बबलू ने उन्हें देखा और हाथ में पकड़ी मोटी फ़ाइल उठा दी।
मास्टर जी, सुन लो। मैं आज दोबारा आया हूँ। बात साफ़ है। छत कल से खाली। मशीन आएगी, और जो मशीन के आगे खड़ा होगा, उसे उसकी ज़मीन दिखाई जाएगी।
प्रिंसिपल ने कहा, मैंने काग़ज़ नहीं देखा है।
तो देख लो।
बबलू ने फ़ाइल खोली और उसमें से एक मोटा काग़ज़ निकालकर सीधे सीढ़ी की रेलिंग पर रख दिया। उस पर नीली मोहर थी और बड़े अक्षरों में स्कूल की ज़मीन का हिसाब लिखा था। साथ में, ज़मीन का एक चौकोर नक़्शा भी था, जिसमें हमारी गली, स्कूल, अस्पताल और पीछे की झुग्गी, सब एक ही आकार में घिरे हुए थे।
मैं आगे गया और उस काग़ज़ को पढ़ने लगा।
बबलू ने मुझे देखकर मुस्कुराया। बैठ जाओ सेठ। तुम्हारा नंबर सातवाँ है, ये फ़ाइल तुम्हारे बाप के नाम से शुरू होती है।
मैंने कहा, मेरे पापा का नाम आज इस फ़ाइल में है, कल तुम्हारे नाम का भी हो जाएगा। ये फ़ाइल का तरीक़ा है।
बबलू का मुँह सख़्त हो गया।
देखो, मैं तुम्हारे साथ नरमी से बोल रहा हूँ, क्योंकि साहब ने कहा था। पर साहब का सब्र भी एक दिन खत्म होता है। तुम्हारी दुकान, ये स्कूल, ये अस्पताल, सब एक ही काग़ज़ में हैं। तुम अकेले कितने दिन लड़ोगे?
मैंने कहा, मैं अकेला कब लड़ा?
और वही हुआ जो मुझे उम्मीद थी।
पीछे से शबनम आपा आईं, हाथ में लोहे की चिमटी, और उन्होंने वो चिमटी सीढ़ी की रेलिंग पर इस तरह पटकी कि आवाज़ पूरे आँगन में गई।
बबलू, ये स्कूल है। यहाँ हमारे बच्चे पढ़ते हैं। तू अकेला तीन आदमी लेकर आया है, हम यहाँ सौ औरतें हैं, चार सौ बच्चे हैं, एक दर्ज़ी है जो सुई से काम करता है और एक साइकिल वाला, जो तेरे स्कूटर के पहिये से भी तेज़ घंटी बजा देता है। गिनकर बता, किसके साथ लड़ेगा।
बच्चे हँसे।
मीरा ने गेट से ही अपना कैमरा निकालकर ऊपर उठा दिया। वो लौट आई थी। मैंने देखा, उसकी आँखें लाल थीं, पर हाथ एकदम स्थिर।
बबलू ने कैमरा देखा और उसके जबड़े में हल्की सी हरकत हुई।
प्रिंसिपल साहब ने काग़ज़ उठाया, पढ़ा, और फिरउन्होंने काग़ज़ उठाया, पढ़ा, और उनका चेहरा ऐसे बदला जैसे किसी ने दीवार से प्लास्टर उतार दिया हो। फिर उन्होंने काग़ज़ सीढ़ी की रेलिंग पर वापस रख दिया और दोनों हाथ पीछे बाँधकर बबलू को देखने लगे।
"इसमें," प्रिंसिपल ने धीमी आवाज़ में कहा, "छत के नाम पर बस एक लाइन है — छत खाली की जाए। मरम्मत का एक भी शब्द नहीं है, बबलू। एक भी नहीं।"
बबलू ने कंधे उठाए।
"तो क्या हुआ? छत खाली होगी, तो मज़बूत बनेगी। यही तो साहब का काम है।"
"मज़बूत कैसे बनेगी?" रमा मैडम आगे आईं। उनके हाथ में चॉक का टुकड़ा था, जैसे अभी बच्चों को बोर्ड पर कुछ लिखाकर आई हों। "जिस काग़ज़ में मरम्मत का ज़िक्र नहीं, उस काग़ज़ से कोई छत नहीं बनती। उससे सिर्फ़ ज़मीन बिकती है।"
आँगन में सन्नाटा फैल गया। इतना सन्नाटा कि मुझे अपनी साँस तेज़ सुनाई देने लगी।
बबलू ने पान थूका — नहीं, इस बार उसने पान नहीं थूका। उसने जेब से रूमाल निकाला और होंठ पोंछे, जैसे अचानक उसे अंदर से गर्मी लगने लगी हो।
"देखिए प्रिंसिपल साहब," उसने आवाज़ नरम करके कहा, "मैं तो आपका दुश्मन नहीं हूँ। मैं तो बस संदेश लाया हूँ। साहब ने कहा — कल सुबह सात बजे मशीन आएगी, छत से काम शुरू होगा, और जो काग़ज़ पर अंगूठा लगाएगा, उसका नाम नई इमारत में सबसे ऊपर लिखा जाएगा।"
उसने अपनी सोने की चेन में लटकते चौकोर लॉकेट को उँगली पर घुमाया।
"और जो नहीं लगाएगा…"
उसने बात अधूरी छोड़ दी, बस मुस्कुराया। मुझे उस मुस्कान से रणवीर की मुस्कान याद आ गई। एक ही ज़ुबान, बस एक बड़ी और एक छोटी।
"जो नहीं लगाएगा," मैंने आगे आकर कहा, "उसका नाम सूची में सातवाँ होगा। यही तुम कहना चाहते हो न?"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में वो बात नहीं थी जो धमकी में होती है। कुछ और था। जैसे कोई आदमी रस्सी खींच रहा हो और रस्सी उसके हाथ से फिसल रही हो।
"अंकुश," उसने मेरा नाम लिया, पहली बार इतनी सीधी आवाज़ में, "तू बड़ा होशियार है। पर एक बात सुन — साहब तेरे जैसे होशियार लड़कों को अपने दफ़्तर में रखता है, गली में नहीं। तू सोच ले।"
मैंने उसकी बात नहीं काटी। क्योंकि इस बार वो धमकी नहीं दे रहा था। वो सच में मुझे बचा रहा था। या खुद को।
प्रिंसिपल ने काग़ज़ मोड़ा।
"यह काग़ज़," उन्होंने कहा, "मेरे पास रहेगा। और मैं आज दस बजे चबूतरी पर सबके सामने यह पढ़कर सुनाऊँगा। यह मेरा फ़ैसला है।"
बबलू की भौंहें उठीं। उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। जैसे किसी ने उसे अंदर ही अंदर रोक दिया हो।
"ठीक है," उसने कहा। "दस बजे। पर साहब ने कहा है — घंटी चबूतरी पर नहीं निकलेगी। बात अगर घंटी पर आई, तो बात काग़ज़ से आगे बढ़ेगी।"
वो मुड़ा और स्कूटर की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका, और बिना पलटे बोला।
"और प्रिंसिपल साहब, आपकी बेटी सातवीं में है न? उसका नाम भी इसी सूची में है। सोच लीजिए।"
वो चला गया। स्कूटर की आवाज़ दूर गई, और आँगन में फिर वही सन्नाटा लौटा, जो अब मुझे गली के सन्नाटे से ज़्यादा डरावना लग रहा था।
प्रिंसिपल अपनी कुर्सी पर बैठ गए। रमा मैडम ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"काग़ज़ हमें दे दीजिए," उन्होंने कहा। "आपका हाथ काँप रहा है।"
"मेरा हाथ नहीं," प्रिंसिपल ने कहा, "मेरी हिम्मत काँप रही है।"
मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया। उसके चेहरे पर वो रंग नहीं था जो रिकॉर्डिंग के वक़्त होता था। वो आगे आई और बोली।
"सर, मैं इस सूची की नक़ल ले सकती हूँ? दस बजे सभा में —"
और ठीक उसी वक़्त रमा मैडम ने मुड़कर मीरा को देखा।
मैंने यह नहीं देखा कि दोनों में क्या हुआ। मैंने सिर्फ़ यह देखा कि मीरा ने आधी बात बीच में रोक दी। जैसे किसी ने उसकी आवाज़ की चाबी घुमा दी हो।
वो एक पल के लिए रुकी, फिर अपना बैग उठाया।
"मैं… मैं बाद में आती हूँ। कुछ काम याद आ गया।"
वो पलटी और तेज़ क़दमों से गेट की तरफ़ चली। उसका बैग उसके कंधे से टकरा रहा था।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद, दीदी को क्या हुआ?"
"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा। "पर पता करना पड़ेगा।"
मैंने गेट की तरफ़ देखा। मीरा स्कूल की गली मुड़ चुकी थी। और रमा मैडम वहीं खड़ी थीं, उनका चेहरा सपाट, जैसे वो भी कुछ ऐसा देख रही हों जो सिर्फ़ उन्हें दिखता है।
मैंने गले में पड़ी घंटी को जेब के ऊपर से दबाया। ठंडी थी, चुप।
"सुन," मैंने मन ही मन कहा, "अभी कुछ नहीं। बस बता — मीरा और रमा मैडम के बीच जो है, वो जुड़ा है या टूटा?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
और फिर, जब मैंने हाथ जेब से निकाला और आँगन से बाहर देखा, तो मैंने देखा कि स्कूल की छत पर कोई खड़ा है।
बच्चों की एक टोली। पतंग उड़ा रहे हैं।
और ऊपर, उसी छत पर, चिंटू की पीली शर्ट अभी भी दिख रही थी।
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