The Mysterious Bell248 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 248

7 min read November 5, 2026

शालिनी मैडम ने अपना चश्मा उतारा और फिर पहना।

मैं तुम्हारे बारे में भी वही कहूँगी, वेद। मैंने भी आज सुबह शक की शुरुआत तुमसे की थी। क्योंकि शक करना सबसे आसान है, और अपने ही ऊपर उँगली उठाना सबसे मुश्किल। मैं भी उसी आसान रास्ते पर चली गई।

दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे और अब उनके चेहरों पर वो पुरानी कड़वाहट नहीं थी।

मैंने कहा, एक काम और करो। अपनी बात खुद बोलो, मेरी ज़ुबान से नहीं। कोई बीच में नहीं खड़ा है और मैं कुछ नहीं सुनूँगा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक-दूसरे की तरफ़।

शालिनी मैडम ने पहले कहा, वेद, मैंने तुम्हें सात साल तक प्रमोशन के नाम पर चुभाया। मैं उस बात के लिए माफ़ी माँगती हूँ। और आज ये भी कहती हूँ कि तुम्हारे घर में जो सुनना बाकी है, वो तुम बाहर की बात से लेने की कोशिश करते हो, और वो ग़लत रास्ता है।

वेद सर ने कहा, और मैं माफ़ी माँगता हूँ, कि मैं तुम्हें उस काग़ज़ वाले कमरे से लौटाकर भी नहीं बोला। मैंने सिर्फ़ अपना बचाव देखा। और मैं आज तुम्हारे सामने ये वादा करता हूँ कि जो कुछ देखूँगा, पहले स्कूल में बताऊँगा। अपने बैग में नहीं रखूँगा।

दोनों ने हाथ आगे किए और एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।

और तभी, मेरी जेब में, पीतल की घंटी हिली।

बहुत हल्का सा, बिल्कुल हल्का। जैसे कोई चिड़िया किसी रस्सी पर पैर रखकर उड़ जाए।

साथ ही मेरे कान में वो आवाज़ आई, जो आज साफ़ थी, साफ़ भी और थोड़ी गरम भी, जैसे किसी ने पुराने तार में से जंग पोंछकर बजाया हो।

बीस।

कमरे में और कोई नहीं सुन रहा था।

मैंने आँखें झपकाईं।

कुल?

दो सौ अट्ठाईस।

मेरी साँस रुकी। और फिर घंटी ने कुछ ऐसा कहा जो उसने पहले इतने साफ़-साफ़ नहीं कहा था।

बड़ा जोड़, साफ़ आवाज़।

मैं मन ही मन बैठ गया। मुझे समझ आ गई। आज तक मैं समझता था कि घंटी की आवाज़ ज़्यादा अंकों से साफ़ होती है। आज पहली बार लगा कि बात उल्टी है। अंक तो पीछे चल रहे हैं, आगे जो चल रहा है, वो है जुड़ने का तरीक़ा। जितना बड़ा और पुराना रिश्ता जोड़ता हूँ, उतनी ज़्यादा साफ़ आवाज़ आती है। छोटी सुलह में घंटी सिर्फ़ फुसफुसाती है, जैसे किसी ने दरवाज़े से सिर निकालकर बोला हो और दौड़ गया हो। और ऐसी सुलह में, जो दो आदमियों ने अपनी खोदी हुई खाई को भरकर की हो, घंटी ऐसे बोलती है जैसे कोई बरसों बाद लौटा हो और कह रहा हो, सुनो, मैं आ गया हूँ।

मैंने कहा, ठीक है। मैं सुन रहा हूँ।

घंटी ने कहा, आज खर्च नहीं। आज गिनना है।

और चुप हो गई।

इस बार मेरे मन में थोड़ा गुस्सा नहीं आया। पहले आता था। जब वो आधी बात कहकर चुप हो जाती थी, तो लगता था यार, तू मुझे जानबूझकर भरोसे में रखकर छोड़ देती है। पर आज लगा कि यही उसका तरीक़ा है। वो माँ जैसी नहीं है जो हर बात खुद कर देती है। वो सिर्फ़ उँगली उठाकर इशारा करती है। चलना मुझे ही पड़ता है।

मैंने काग़ज़ों का बंडल उठाया और वेद सर से कहा, ये बंडल अब मेरे पास रहेगा। स्टोर की चाबी आज शाम प्रिंसिपल साहब को दे दीजिए। और शाम को अगर कोई आपको फिर मिलने आए, तो उससे एक बात कहिए, कि मैं स्कूल का काग़ज़ नहीं जानता, मैं सिर्फ़ अपने बच्चों के नंबर जानता हूँ।

वेद सर ने कहा, अगर वो दोबारा मिलने आया और मैं डर गया?

मैं मुस्कुराया।

डरेंगे। पर आप अब अकेले के डरे हुए नहीं हैं। ये दो चीज़ें अलग हैं।

वो दोनों उठकर बाहर चले गए, और गलियारे में जाते-जाते शालिनी मैडम ने वेद सर से कहा कि वो अपनी बेटी के लिए नई दवा लेकर आएँगी, क्योंकि वेद सर के घर के पास वाला दवाखाना सस्ता है। मुझे क्या पता, यही छोटी बात आगे बहुत काम आएगी।

टिंकू दौड़कर अंदर आया।

उस्ताद, बीस अंक?

हाँ।

कुल?

मैंने उसके कान के पास झुककर कहा, दो सौ अट्ठाईस।

उसकी आँखें चमक गईं।

बीस अंक से हम क्या खरीदेंगे?

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

आज कुछ नहीं।

क्यों?

क्योंकि आज बाज़ार में सबसे सस्ती चीज़ सच है और वो भी मुफ़्त नहीं मिलती। बीस अंक रख, जब किसी को बचाने का मौक़ा आए, तब काम आएंगे।

वो हमेशा की तरह मुँह बनाकर चला गया और मैं मुस्कुराता हुआ उसके पीछे आँगन में आ गया।

और वहीं, आँगन के गेट पर, मुझे मीरा दिखी।

वो सुबह आई थी। हाथ में वही कपड़े का थैला, कंधे पर कैमरा, माथे पर पसीने की एक पतली लकीर।

वो आई और महज़ दो कदम अंदर रखकर रुक गई।

रमा मैडम आँगन के उस कोने में खड़ी थीं, जहाँ नीम का पेड़ है। उनके हाथ में मेरे दिए हुए वो रजिस्टर के पन्ने थे, जो मैंने उन्हें दिखाने के लिए भेज दिए थे। उन्होंने उसे पढ़ने के लिए चश्मा लगाया हुआ था और उँगली उसके किनारे पर थी।

मीरा उन्हें देखकर रुक गई।

मैंने देखा, उसके चेहरे का रंग एक झटके में बदला। न डर, न गुस्सा। कुछ और। ऐसा जैसे कोई अंदर ही अंदर गिनती भूल गया हो।

उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो रुकी, फिर पलटी, और वहीं खड़े सानिया से बस इतना बोली, सानिया, तुम्हारी माँ को बोल देना कि मैं शाम को आऊँगी।

और वो मुड़कर गेट से बाहर चली गई।

मैं कुछ कदम दौड़ा।

मीरा!

वो रुकी, पर पलटी नहीं।

मैंने कहा, तू सुबह आई थी।

वो बोली, मुझे एक बात पक्की करनी थी।

कौन सी?

अब नहीं।

मैंने उसके कंधे के ऊपर से गेट की तरफ़ देखा और समझ गया कि वो किसकी तरफ़ देखकर ये बोल रही है।

मीरा, मैंने धीरे से कहा। जो तूने कल कहा था, वो मैं भूला नहीं हूँ।

वो फिर बोली, और इस बार उसकी आवाज़ में वो पुरानी कड़क नहीं, थकान थी।

अंकुश, कभी-कभी पत्रकार की आँख ऐसी चीज़ देख लेती है, जो दिल नहीं देखना चाहता। मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए।

और वो चली गई।

गेट के बाहर धूप में उसकी परछाईं तिरछी होकर गली में घुल गई और मैं वहीं खड़ा रह गया।

ये मेरा पहला शक था, और मुझे ईमानदारी से कहना पड़ेगा, वो शक मुझे अच्छा नहीं लगा।

वो शक ऐसा था जैसे कोई अपने ही घर के दरवाज़े पर ताला देख ले। तुम चाबी निकालते हो, पर हाथ काँपता है, क्योंकि तुम्हें पता है कि ये ताला तुमने नहीं लगाया, और ये भी पता नहीं कि किसने लगाया।

मैंने अपने आप से कहा, रुक। तू इस लड़की को जानता है। उसने कल कहा था कि उसने रमा मैडम के सामने सच बोला। उसने लिफ़ाफ़ा दिया। अब वो चुप क्यों?

जवाब तभी आया जब रमा मैडम ने मुझे आवाज़ दी। उनका चेहरा भी बदला हुआ था।

अंकुश, ये आँधी।

मैं उनके पास गया।

उन्होंने मेरी तरफ़ वो पन्ना उठाकर दिखाया और फिर उँगली उसके नीचे की तारीख़ पर रख दी।

ये तारीख़ मुझे पता है, उन्होंने कहा। ये वो दिन है जिस दिन वो खबर छपी थी। और इसी दिन मैं इस स्कूल में आई थी, क्योंकि मुझे यहाँ से पूरा सामान उठाना था। मैंने ये लिस्ट इसलिए साइन की थी कि मैं जाना चाहती थी, साफ़ निकलना चाहती थी। मेरा साइन कोई साज़िश नहीं था, अंकुश। मेरा साइन मेरी हार थी।

मैंने कहा, मैडम, मैंने ये पन्ना किसी को दोष देने के लिए नहीं भेजा था।

वो मुस्कुराईं, पर वो मुस्कान बहुत छोटी थी।

मुझे पता है। फिर भी मैंने जब मीरा को गेट पर देखा, तो मेरे अंदर वही पुरानी लकीर खिंच गई। वो लकीर, जो पाँच साल में जाने कितनी बार मिटी और फिर उभर आई।

मैंने कहा, ये लकीर आज नहीं बनी। ये उस दिन बनी थी जिस दिन वो खबर छपी। और आज मरम्मत करने का मौक़ा है, मैडम। मीरा दस बजे बोलेगी। पर उससे पहले आपको उससे बोलना पड़ेगा। काग़ज़ से नहीं, आँख से।

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