The Mysterious Bell – Chapter 251
शालिनी मैडम ने काग़ज़ को देखा और उनकी आँखें भर आईं।
"ये नाम," उन्होंने कहा, "एक उस लड़के का है जिसे मैंने पिछले साल फेल किया था। और ये तारीख़ — ये उसी दिन की है।"
"तो?" मैंने कहा। "लड़के ने बदला लेने के लिए काग़ज़ चुराए और तुम पर इल्ज़ाम डाल दिया?"
"नहीं," शालिनी मैडम ने कहा। "वो लड़का शहर छोड़कर जा चुका है। उसका तो कुछ नहीं है। पर जिसने यह काग़ज़ यहाँ रखा, वो जानता था कि मुझे तो तुरंत शक हो जाएगा। वो जानता था कि मैं वेद सर पर उँगली उठाऊँगी।"
वेद सर ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर रुक गए। उन्होंने अपनी कुर्सी के हत्थे को कसकर पकड़ा।
"मैंने भी," उन्होंने धीमे से कहा, "कुछ ऐसा ही सोचा था। कि तुमने अपनी बेटी का बुखार बहाना बनाकर काग़ज़ मुझ पर डाल दिए।"
"तो अब?" शालिनी मैडम ने कहा। "अब भी यही सोच रहे हो?"
वेद सर ने उनकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर काग़ज़ की तरफ़।
"नहीं," उन्होंने कहा। "अब मुझे लग रहा है कि हम दोनों को एक ही जाल में फँसाया जा रहा है। और वो जाल स्कूल के अंदर से नहीं, बाहर से आया है।"
मैंने सीधे उनकी आँखों में देखा।
"कौन?"
वेद सर ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी नज़र स्टोर की खिड़की की तरफ़ गई, जहाँ से स्कूल के पीछे वाला प्लॉट दिखता था — वही प्लॉट, जहाँ कल सुबह सात बजे मशीन आनी थी।
"वो जानता है," वेद सर ने कहा, "कि अगर दो टीचर्स झगड़ेंगे, तो प्रिंसिपल अकेले पड़ेंगे। और अगर प्रिंसिपल अकेले पड़ेंगे, तो अंगूठा लग जाएगा।"
शालिनी मैडम ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
"मैंने कल रात," उन्होंने कहा, "अपनी बेटी के बुखार में, एक काग़ज़ पर अंगूठा लगा दिया। रमा जी, मुझे माफ़ कर दो।"
और रमा मैडम, जो अब तक चुप खड़ी थीं, आगे आईं। उन्होंने शालिनी मैडम का हाथ पकड़ा।
"कौन सा काग़ज़?"
"वो काग़ज़ जो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी लाया था। उसने कहा कि अगर मैं अंगूठा लगा दूँ, तो मेरी बेटी का इलाज अस्पताल में मुफ़्त हो जाएगा। और मैंने… मैंने बिना पढ़े अंगूठा लगा दिया।"
आँगन में फिर सन्नाटा। पर इस बार सन्नाटा अलग था। इसमें डर नहीं था, इसमें शर्म थी। और शर्म, मुझे लगा, डर से बेहतर है, क्योंकि शर्म वाला आदमी सच बोलता है।
मैंने वेद सर की तरफ़ देखा।
"और आप?"
वेद सर ने अपना बैग उठाया, उसमें से एक लिफ़ाफ़ा निकाला, और मेज़ पर रख दिया।
"यह भी उसी आदमी ने दिया था," उन्होंने कहा। "कहा कि अगर मैं चुप रहूँ, तो मेरी प्रमोशन की फ़ाइल पास हो जाएगी। और मैंने… मैंने लिफ़ाफ़ा खोला भी नहीं। बस रख लिया।"
लिफ़ाफ़े में क्या था, यह मैंने नहीं पूछा। मैंने सिर्फ़ इतना पूछा।
"आपने कल रात मुझे क्यों नहीं बताया?"
वेद सर ने कहा, "क्योंकि मुझे लगा कि तुम भी उसी जाल में हो। मैंने सोचा, साइकिल वाला लड़का, गली का, वो क्या करेगा? वो भी उन्हीं में से है।"
वो बोलते-बोलते रुक गए। फिर उन्होंने देखा, सीधे मेरी तरफ़ देखा, और कहा।
"और अब मुझे लग रहा है कि मैंने ग़लती की।"
मैंने घंटी जेब में दबाई। और इस बार मुझे ठीक-ठीक सुनाई दिया, जैसे किसी ने मेरे कान के पास झाँककर धीरे से कहा हो।
"दो टूटे हुए सच, एक ही जाल से जुड़े हैं। उन्हें बाहर से जोड़ना पड़ेगा, अंदर से नहीं।"
मैंने घंटी निकाली। जेब में ठंडी थी, और मैंने इसे उँगलियों में घुमाया। फिर मैंने दोनों टीचर्स की तरफ़ देखा और कहा।
"आप दोनों कल झगड़े थे। आज फिर उसी जगह पहुँच गए। पर इस बार झगड़ा आपका नहीं है। यह झगड़ा उसका है, जिसने आपके बीच यह काग़ज़ रखा। और आपके पास सिर्फ़ एक रास्ता है — उसका नाम लेना।"
"हमें नहीं पता," शालिनी मैडम ने कहा।
"पता है," मैंने कहा। "सफ़ेद कुर्ते वाला। और वो किसी के भेजे हुए आता है। किसके?"
वेद सर ने कहा, "वो अपने साथ कभी नाम नहीं लिखता। पर वो जब आया था, तो उसके हाथ में एक फ़ाइल थी, जिस पर नीली मोहर थी।"
मैंने आँखें मूँद लीं।
नीली मोहर। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
फिर मैंने घंटी को जेब में रखा और बोला।
"अब सुनो। आज शाम चार बजे मुझे भारद्वाज भवन जाना है। और मैं अकेला नहीं जाऊँगा। पर उससे पहले, दस बजे चबूतरी पर आप दोनों को खड़ा होना है, और सबके सामने सच बोलना है। यह वो शर्त है जो मैं तुम्हारे सामने रख रहा हूँ।"
शालिनी मैडम ने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
रमा मैडम ने कहा, "अंकुश, वो सच बोलेंगे, तो स्कूल बचेगा?"
मैंने सीधे उनकी आँखों में देखा।
"मैडम, स्कूल तो आज भी बचा हुआ है। बचाने वाली बात यह है कि कल भी बचा रहे।"
वेद सर उठे। शालिनी मैडम भी उठीं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, और फिर वेद सर ने हाथ बढ़ाया। शालिनी मैडम ने उसे थाम लिया।
मुझे लगा कि इस बार हाथ मिलाना कल वाले हाथ मिलाने से अलग है। कल दोनों ने मिलकर कहा था — हम माफ़ करते हैं। आज दोनों ने मिलकर कहा — हमने एक ही ग़लती दो बार की।
और मुझे लगा कि असली माफ़ी कल नहीं, आज हुई।
घंटी ने जेब में हल्की सी आवाज़ की, जैसे किसी ने दूर से कहा हो — बीस और जुड़े। अब दो सौ अट्ठाईस।
मैंने घंटी जेब से निकालकर हथेली पर रखा।
"दो सौ अट्ठाईस?" मैंने धीमे से कहा। "मतलब अब तक दो सौ आठ थे, और बीस जुड़े।"
घंटी ने जवाब दिया — "अब सुनाई दे रहा है तेरे कान को। तेरी सुनने की ताक़त बढ़ी है।"
मैं मुस्कुराया। यह पहली बार था कि घंटी ने कुछ ऐसा कहा जो सिर्फ़ सूचना नहीं थी। इसमें थोड़ी शेखी थी। जैसे कोई दोस्त कहे — देखा, मैंने कहा था न?
तभी सीढ़ी की तरफ़ से पैरों की आहट आई।
सानिया दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, और वो इतनी तेज़ साँस ले रही थी जैसे पूरी गली दौड़कर आई हो।
"उस्ताद!" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये मिला। हम लोग स्टोर में गए थे, जूट का बंडल खोल रहे थे, और तभी ये नीचे से निकला।"
मैंने काग़ज़ पकड़ा।
पुराना अख़बार का कतरन था। पीला पड़ा, किनारे से फटा हुआ। और उस पर एक तस्वीर थी — एक लड़की की, स्कूल के फाटक के सामने, माइक पकड़े हुए। उसके चेहरे पर वो ज़िद थी जो अब भी है, बस उम्र कम थी।
मीरा।
तस्वीर के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — "स्कूल की खबर ने तोड़ा टीचर का घर।"
और उसके नीचे छोटे अक्षरों में — "आरोप अब तक साबित नहीं।"
मैंने काग़ज़ को करीब लाकर देखा। तस्वीर के कोने में एक आदमी का आधा चेहरा दिख रहा था, जो कट गया था। उसके हाथ में एक पीली फ़ाइल थी। और उसकी उँगली में एक काली अंगूठी।
मैंने काग़ज़ नीचे किया।
रमा मैडम मेरे पास आईं और उन्होंने काग़ज़ देखा। उनका चेहरा फीका पड़ गया।
"यह मैं हूँ," उन्होंने कहा। "यह मेरी खबर है।"
और फिर उन्होंने वो काग़ज़ उलट दिया। उसके पीछे पेंसिल से कुछ लिखा था, बहुत पुरानी लिखाई में, जो अब धुँधली हो चुकी थी। मैंने पास जाकर पढ़ा।
"इस खबर का पूरा सच मेज़ के नीचे है।"
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"कौन सी मेज़?"
रमा मैडम ने आँगन के बीच पत्थर की उस पुरानी मेज़ की तरफ़ देखा जिस पर अभी भी वो पन्ना खुला पड़ा था।
"वो।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और मेज़ की तरफ़ बढ़ा। सानिया मेरे पीछे आई, और चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़ भी।
"सानिया," मैंने कहा, "तुमने यह काग़ज़ कहाँ से निकाला, ठीक-ठीक बताओ।"
"स्टोर में, उस्ताद। जूट के बंडल के नीचे से। वही बंडल जो कल मिला था।"
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