The Mysterious Bell – Chapter 25
"क्योंकि आज अंदर एक आवाज़ है," मैंने कहा। "जो हमेशा नहीं होती।"
"भूत की आवाज़?" गुड्डू की आँखें बड़ी हो गईं।
"नहीं।"
"आपकी वही साइकिल वाली आवाज़?"
मैं चुप हो गया।
चारों एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगे। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि इन चारों को कुछ पता है। बच्चे सब जानते हैं। यही इनकी सबसे बड़ी ताक़त है और सबसे बड़ी मुसीबत।
"तुम लोगों ने क्या सुना?"
"कुछ नहीं," सानिया ने कहा। "पर आपका चेहरा देखकर लग रहा है।"
शबनम आपा पीछे से बोलीं, "बच्चे, चाय पीओ। बड़ों के अंदर की आवाज़ नहीं सुननी। वो अंदर की होती है इसलिए अंदर ही रहने दो।"
"पर आपा," रफ़ीक़ ने कहा, "वो कभी बाहर आती है?"
शबनम आपा ने समोसे की प्लेट रखी और बोलीं, "जब बाहर आती है, तो सबको पता चल जाता है। आज चुप है। इसलिए खाओ।"
बच्चे हँसे और समोसे पर टूट पड़े।
मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया और डोंगी कटोरी में रखी। जब मैं उठा, शबनम आपा मेरी तरफ़ झुकीं और उन्होंने धीरे से कहा, "अंकुश, उस्ताद से मिला?"
"मिला।"
"कुछ बोले?"
"ना बोलने की बात बोले।"
उन्होंने सिर हिलाया। "पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "मैं छोटी थी। पर मुझे याद है कि उस्ताद के साथ एक आदमी हुआ करता था। बहुत हँसता था। दोनों भाई दुकान पर बैठते, बातें करते, और कभी-कभी मुझे भी टॉफ़ी देते।"
"फिर?"
"फिर एक दिन वो आदमी नहीं आया।" उन्होंने कटोरी पोंछी। "उस्ताद ने उनके बारे में कभी नहीं बताया। मैंने भी नहीं पूछा। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें पूछने से जवाब नहीं, दरारें खुलती हैं।"
मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनका हाथ गरम था, चूल्हे के पास का।
"आपा, अगर मैं किसी दिन उनसे पूछूँ, तो बुरा तो नहीं होगा?"
"बुरा तो नहीं होगा," उन्होंने कहा, "पर तैयार रहना। क्योंकि जवाब तेरी जेब की चीज़ से जुड़ा होगा, और तेरी जेब की चीज़ किसी को मुफ़्त में कुछ नहीं देती।"
मैं घर लौटा।
घर में बल्ब जल रहा था। माँ फ़र्श पर बैठी थीं, सामने कॉपी खुली थी, और वो उँगली से हिसाब लगा रही थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे अंदर ही अंदर जोड़-घटाव कर रही हों।
मैंने चप्पल उतारी। वो उठीं नहीं।
"आ गया?" उन्होंने पूछा, बिना ऊपर देखे।
"हाँ।"
"खाना रखा है। खा ले।"
"आप खाईं?"
"मैं बाद में।" उन्होंने कॉपी में कुछ लिखा। कलम रुकी। फिर वो बोलीं, "अंकुश, ज़रा बैठ।"
मैं बैठ गया।
उन्होंने कॉपी बंद की। उनके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं। आवाज़ सीधी थी, जैसे किसी सपाट ज़मीन पर चल रही हो।
"मैं तुझे कुछ बताने वाली हूँ," उन्होंने कहा, "और तू बीच में कुछ नहीं बोलेगा।"
"अच्छा।"
"मेरे दो टेस्ट और हैं। डॉक्टर साहब ने दवा बदली है, नई दवा महँगी है। और हिसाब देखो तो टिफ़िन से जो आता है, उतने में दवा और खाना दोनों नहीं निकलेंगे।"
"माँ —"
"मैंने बोला ना, बीच में नहीं बोलेगा।"
मैं चुप हो गया।
माँ ने गहरी साँस ली। "मैंने सोचा है कि दो हफ़्ते की दवा छोड़ दूँ।" उन्होंने कहा। "दो हफ़्ते से कुछ नहीं होगा। खाँसी थोड़ी बढ़ेगी, पर रुपये जुड़ जाएँगे। फिर जब पैसे हों, तब टेस्ट करा लूँगी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे हाथ कुछ और भी हो गए।
"अंकुश?"
"आप दवा नहीं छोड़ेंगी।"
"मैंने तुझसे कुछ और कहा था।"
"माँ, आप दवा नहीं छोड़ेंगी।" मेरी आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से कुछ ऐसा निकल रहा था जो मेरी आवाज़ नहीं थी — ये वो आवाज़ थी जो मैंने खुद नहीं सुनी थी, कभी। "मैं पैसे का इंतज़ाम करूँगा।"
"कैसे?"
यही सवाल। यही एक सवाल जो सबसे छोटा है और सबसे बड़ा है। कैसे।
मेरे पास जवाब नहीं था।
मैं उठ गया। शर्ट पहनी। चप्पल पहनी।
"कहाँ जा रहा है?"
"थोड़ी देर में आता हूँ।"
"अंकुश —"
"माँ, मैं ठीक हूँ। बस थोड़ी हवा लेने जा रहा हूँ।"
मैं बाहर निकला, और मुँह से एक लंबी साँस निकली, जैसे किसी साँस की जगह किसी ने दीवार बना दी हो।
मैंने बाहर से ही माँ को देखा। वो वापस बैठ गईं, कॉपी खोली, और फिर उसी पन्ने पर नज़रें गड़ा दीं। बल्ब की रोशनी में उनका चेहरा और छोटा लग रहा था।
फिर मैंने देखा कि काजल दरवाज़े की आड़ में खड़ी थी। उसने सब सुना था। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी, और उसकी आँखें भीगी थीं। उसने मुझे देखा, और जल्दी से हाथ से आँख पोंछी, जैसे अपराध पकड़ा गया हो।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं ठीक हूँ।"
"काजल —"
"अंकुश, मैं ठीक हूँ।" उसकी आवाज़ माँ जैसी हो गई थी, बस थोड़ी पतली और थोड़ी कच्ची। "मैं कल डॉक्टर साहब से पूछ लूँगी कि क्या कोई और रास्ता है।"
"क्या रास्ता?"
"कोई स्कीम, कोई फ़ंड, कुछ तो होता है। मैं पूछूँगी।"
"पूछ लेना।" मैंने कहा। "और काजल — तूने सुना जो माँ ने कहा, वो होने मत देना। किसी भी हालत में। अगर ज़रूरत पड़े तो —"
"तो?"
"तो मेरी दुकान के औज़ार बेच देना, पर माँ की दवा नहीं।"
उसकी आँखें भर आईं। "तू पागल है।"
"एक दिन पहले भी किसी ने बोला था।" मैं मुस्कुराया। "आज दोपहर में उस्ताद ने बोला।"
वो हँसने की कोशिश कर गई, फिर रोने लगी। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। वो अठारह साल की है पर उस वक़्त अस्पताल की ट्रेनी नहीं, छोटी बहन लग रही थी।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया।
अंदर लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक, बल्ब जो अभी भी धीरे से गुनगुना रहा था। और फ़र्श पर रोटी का टिफ़िन, जो माँ ने रख दिया था। वो ठंडा हो चुका था।
मैंने उसे नहीं खाया।
मैंने बल्ब बुझाया और छत पर चढ़ गया।
दुकान के पीछे वाली छत छोटी है, आधी ईंट की, आधी टीन की। वहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल का पेड़, पत्थर की चबूतरी, वो पुराना मोहाने वाला नल, और उसके पार उस्ताद की दुकान का छोटा सा अंधेरा बिंदु।
मैं लेट गया। ऊपर आसमान नहीं था, सिर्फ़ शहर की धूल थी, जिसमें दो-चार तारे मुश्किल से दिख रहे थे।
जेब में हाथ डाला। घंटी निकाली। ठंडी नहीं थी, आज गरम थी। अजीब। कल हड्डी जैसी ठंडी थी, आज जैसे किसी ने उसे चूल्हे के पास रख दिया हो।
मैंने उसे सीने पर रखा।
और मन में जो एक ही बात घूम रही थी, वो यह थी — मैं अपना घर बचा पाऊँगा या नहीं?
ये बात मैंने कभी किसी से नहीं कही। टिंकू से नहीं, मीरा से नहीं, काजल से नहीं, माँ से नहीं। अपनी छत पर, अंधेरे में, हर आदमी अपने सबसे बड़े डर से ईमानदारी से बात करता है, क्योंकि वहाँ कोई सुनने वाला नहीं होता।
पर आज सुनने वाला था।
मैंने सोचा — क्या बचाना है? दुकान? चार दीवारें? माँ का इलाज? या वो चीज़ जो अभी भी इन सबके बीच से मुझे देखती है और मुस्कुराती है?
मुझे याद आया, बचपन में पापा मुझे साइकिल पर बैठाते थे और कहते थे, "पकड़ ले कसकर।" मैं उनकी कमर पकड़ लेता था। बड़ा होकर मैंने वही साइकिल चलाई, पंचर किए, चेन लगाई, और एक दिन वो साइकिल कहीं खो गई। इतनी चुपचाप कि मुझे पता ही नहीं चला। पापा ने कभी नहीं पूछा — साइकिल कहाँ गई?
इतने साल बाद पता चला, वो दादा की थी। और उस्ताद की दुकान पर पड़ी थी। और पापा हर रोज़ उस गली से गुज़रते थे।
हर रोज़। पच्चीस साल से।
अब मुझे समझ आ रहा था कि पापा चुप क्यों हैं। वो मजबूत आदमी नहीं, वो टूटा हुआ आदमी है, जो हर रोज़ उस गली से गुज़रता है जहाँ उसका पापा की साइकिल रखी है, और जहाँ उसका गुनाह इसका इंतज़ार कर रहा है।
उसका गुनाह। उसका कोई गुनाह है। मैंने सोचा। पापा ने कुछ किया है जो मुझे नहीं पता।
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