The Mysterious Bell – Chapter 24
"आज घूमकर बोले।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, जो अब गली के मोड़ पर पहुँच चुके थे और उनका सिर सिर्फ़ एक छोटे से अंधेरे टुकड़े जितना दिख रहा था।
"जा," उन्होंने कहा। "पीछे मत जा। पर दोपहर तक जाकर बैठ जाना उनकी दुकान पर। चुपचाप। कुछ मत पूछना। बस बैठ जाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी पचास साल से किसी बात को अकेले ढो रहा है," शबनम आपा ने कहा, "उसको बोलने के लिए सिर्फ़ सवाल काफ़ी नहीं होता। उसको आदमी चाहिए जो चुप बैठ सके।"
मैंने सिर हिलाया।
उस रात मैं ठीक से सोया भी नहीं, और सोया तो सपने में उस्ताद की मशीन की आवाज़ आती रही। टिक, टिक, टिक। और फिर अचानक चुप।
सुबह मैंने दुकान खोली तो हाथ काँप रहे थे। मैंने खुद को डाँटा — अंकुश, ये कोई जंग नहीं है, ये सिर्फ़ एक दुकान है, एक टायर है, एक पंचर है। पर हाथ नहीं माने।
पहला ग्राहक उसी बूढ़े अंकल थे जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाने के लिए साइकिल लाते हैं। उनकी साइकिल की सीट बहुत पुरानी है, और उस पर बैठने की जगह सिर्फ़ एक ही है। वो बैठते हैं, औरत पीछे की रॉड पर। सालों से यही चल रहा है।
"अंकुश भाई," उन्होंने कहा, "पिछला पहिया ज़रा देख लेना। हिलता है।"
"हाँ," मैंने कहा। "हाँ।"
मैंने पहिया उठाया। फिर वापस रख दिया। फिर उठाया।
"अंकुश भाई?"
"हाँ।"
"तुमने सुना?"
"सुना। पहिया।"
"पर तुमने देखा नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहे थे, पर उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बुज़ुर्ग लोगों की आँखों में तब आती है जब वो किसी जवान को देखकर अपना कोई पुराना चेहरा याद कर लेते हैं।
"कहाँ खोए हो?" उन्होंने पूछा।
"कहीं नहीं।"
"बेटा, मैं पचहत्तर साल का हूँ। मैं जानता हूँ कि 'कहीं नहीं' का मतलब क्या होता है।"
मैं हँसा। पर हँसी आधी निकली।
"अंकल, आपको कभी ऐसा लगा है कि आपके हाथ में कुछ है, पर आपको पता नहीं कि वो क्या है?"
वो रुके। फिर बोले, "एक बार।"
"क्या?"
"मेरी औरत की पहली रिपोर्ट। डॉक्टर ने काग़ज़ थमा दिया, मैंने पकड़ लिया। पर मुझे पढ़ना नहीं आता था। पढ़ना आता था, पर उस भाषा में नहीं। मैं उस काग़ज़ को तीन दिन जेब में रखे घूमता रहा। खाना खाया, काम किया, हँसा, झगड़ा किया — और जेब में वो काग़ज़ था, जो मेरे पूरे जीवन का फ़ैसला था, और मैं उसे पढ़ नहीं सकता था।"
"फिर?"
"फिर एक चपरासी ने पढ़कर सुनाया।" उन्होंने कहा। "दस मिनट में सब खत्म। दस मिनट। और मैंने उसके लिए तीन दिन जेब में आग रखी थी।"
उन्होंने साइकिल की तरफ़ इशारा किया।
"जो चीज़ तेरे हाथ में है," उन्होंने कहा, "उसका चपरासी भी कोई होगा। ढूँढ उसे। खुद मत पढ़ने की ज़िद कर। कुछ काग़ज़ ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पढ़ना जान को खतरे में डाल देता है।"
मैंने सिर हिलाया। पहिया ठीक किया। उन्होंने पैसे दिए, दो रुपये ऊपर रख दिए, और चले गए।
दो रुपये मैंने उसी वक़्त गुमटी की कटोरी में डाल दिए, जहाँ गली के लोग चाय के पैसे छोड़ते हैं।
दोपहर में मैं उस्ताद की दुकान पर गया। बैठ गया, जैसा शबनम आपा ने कहा था। दरवाज़े के पास, चौकी पर। कुछ नहीं बोला।
उस्ताद बैठे थे, मशीन के सामने, और उनके हाथ में एक पुरानी कुर्ता था, जिसे वो पचास बार देख चुके थे, दोबारा देख रहे थे।
आधा घंटा ऐसे ही बीता।
फिर उस्ताद ने सुई बदली। टिक-टिक शुरू हुई। और मुझे लगा कि दुकान में फिर हवा भर गई है।
"तू अभी भी यहाँ है?" यह उन्होंने पूछा, जैसे अभी देखा हो।
"बैठा हूँ।"
"कुछ पूछना है?"
"आपने हाथ उठाया था कल।"
"याद है मुझे।" उन्होंने सुई रोकी। "अब भी नहीं पूछना।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरी बात सुनकर तुझे कुछ नहीं मिलेगा।" उन्होंने कुर्ता मोड़ा। "पचास साल पुरानी बात सुनकर तू क्या करेगा? रोएगा? दुखी होगा? मेरे भाई को लौटा लाएगा?"
मैं चुप हो गया।
"पहले ये देख," उन्होंने कहा। "घंटी क्या माँगती है। ये जो तेरी जेब में है, ये भूखी है। और भूखी चीज़ें माँगती हैं। जब तक तू इसे समझ नहीं लेता, मेरी बातें तेरे काम की नहीं।"
"आप मुझे बता दीजिए।"
"नहीं।" उन्होंने साफ़ कहा। "क्योंकि जो बात आदमी खुद नहीं खोजता, वो उसके काम नहीं आती। मैंने पचास साल पहले किसी से पूछ लिया था — 'ये कैसे चलता है?' और वो आदमी मुझे बता भी दिया। इसीलिए मैंने भाई खोया।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा सिलाई मशीन की तरह शांत था। पर हाथ नहीं थे। हाथ रुक-रुक कर कुर्ते को मोड़ रहे थे, जैसे उँगलियाँ बात करना चाहती थीं और आवाज़ नहीं थी।
"उस्ताद —"
"जा।" उन्होंने कहा। "शाम को आना। और अगर न आ सको तो महीने बाद आना। मैं भाग नहीं रहा। मैं इसी दुकान पर हूँ, जहाँ तेरे पापा ने साइकिल खड़ी की थी।"
मैं उठ गया।
दरवाज़े पर पहुँचकर मुड़ा। "उस्ताद, एक दिन मैं वापस आऊँगा और उस दिन आपको बोलना पड़ेगा।"
"उस दिन तो बोलूँगा शायद।" उन्होंने कहा। "पर उस दिन तेरे पास मेरे जवाब से ज़्यादा ज़रूरी सवाल होंगे, बेटा। और सवाल ही तो जवाब से बड़े होते हैं।"
वो मुस्कुराए। पचास साल में पहली बार ऐसे मुस्कुराए जैसे मुस्कुराहट उनके चेहरे पर मेहमान बनकर आई हो, रहने के लिए नहीं आई हो।
मैं बाहर निकला।
पूरा दिन मैं बेचैन घूमता रहा। दुकान पर बैठा, एक साइकिल की चेन तेल से साफ़ की, फिर वही चेन तीन बार साफ़ की। टिंकू सवाल पूछता रहा और मैं आधे जवाब देता रहा।
"उस्ताद, ये बोल्ट कहाँ लगेगा?"
"वहाँ।"
"कौन वहाँ?"
"वही वहाँ।"
"उस्ताद, आप आज भी वही वहाँ-वहाँ कर रहे हैं।"
"तो तू वही वहाँ-वहाँ खुद कर ले।"
टिंकू ने मुँह बिगाड़ा और चला गया। फिर लौटा और बोला, "उस्ताद, फीस का काग़ज़ अभी भी नहीं आया।"
"कल देखेंगे।"
"कल आप यही बोलेंगे।"
"फिर परसों देखेंगे।"
"उस्ताद, कहीं आप स्कूल मत बंद करवा देना मेरा।"
मैं रुक गया। उसकी तरफ़ देखा। वो तेरह साल का है, पर उसकी आँखों में वो डर था जो पचास साल के आदमी की आँखों में भी नहीं आता। वो डर नहीं था कि स्कूल में क्या होगा। वो डर था कि कहीं ये दुकान भी न छिन जाए।
"टिंकू," मैंने कहा, "सुन।"
"हाँ?"
"आज तेरी फीस भूल जा। आज कुछ और होने वाला है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या, पर होने वाला है। और उसके बाद मैं तेरी फीस का भी कुछ करूँगा।"
वो मुझे देखता रहा। "क्या होने वाला है?"
"पता नहीं।"
"तो आपको कैसे पता कि होने वाला है?"
"क्योंकि मेरी जेब में जो है," मैंने कहा, "वो मुझे अंदर से खींच रही है। जैसे किसी घर का दरवाज़ा खुला रह गया हो और हवा आ रही हो।"
टिंकू ने कुछ सोचा। फिर बोला, "उस्ताद, किसी दिन आप मुझे ये सब खोलकर बताओगे?"
"खोलकर नहीं," मैंने कहा। "खोलने पर तो मेरा ही सिर फट रहा है। पर जब कुछ समझ आएगा, पहले तुझे बताऊँगा।"
वो खुश हो गया, जितना तेरह साल का लड़का फीस के डर के साथ खुश हो सकता है।
शाम को हम सब शबनम आपा की गुमटी पर बैठे थे। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — चारों अपने-अपने गिलास पर झुके हुए थे। शबनम आपा ने सबको गरमा-गरम चाय दी थी, और कहा था कि पैसे महीने के आख़िर में देंगे।
"आपको पता है," मैंने कहा, "आज कुछ अजीब होने वाला है।"
"कैसे पता?" सानिया ने पूछा।
"पता ही नहीं है।"
"तो काहे बोल रहे हो?" चिंटू ने कहा, जो सबसे छोटा था और सबसे ईमानदार।
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