The Mysterious Bell246 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 246

7 min read November 5, 2026

और आज दस बजे वो उसी चबूतरी पर बैठेगा, जहाँ बैठकर उसने पच्चीस साल पहले मेरे दादा का काग़ज़ काटा था।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को उँगलियों में दबाया, ठंडी, चुप।

“सुन,” मैंने मन ही मन कहा, “आज कुछ मत खरीदना। आज सिर्फ़ सच गिनना।”

घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया। बस एक बहुत छोटी सी आवाज़ आई, जैसे कोई दूर से किसी गली में अपनी साइकिल का हैंडल घुमाकर जा रहा हो।

॥

डोर का वो हिस्सा हवा में लहराकर सीधे स्कूल की छत पर गिरा, और गुड्डू ने ऐसी चीख मारी जैसे उसका पूरा घर गिर गया हो।

मैंने उसका कंधा पकड़ा।

अरे भाई, पतंग कटी है। तेरा मकान नहीं गिरा। चार आने की पतंग के लिए पूरे मोहल्ले को रोना नहीं चाहिए।

गुड्डू ने मुँह बनाया। वो मेरी पतंग थी। ऊपर से काली वाली। मैंने दो हफ़्ते की जेब खर्च से बनाई थी।

तो कल सुबह छत खुलेगी, तब उतार लेंगे। मैंने उसके बाल बिगाड़ दिए। और अभी ज़रा मेरे साथ आ।

चारों बच्चे मेरे पीछे-पीछे आँगन के बीच उस पुरानी पत्थर की मेज़ तक आए, जिस पर पाँच साल पुराना अख़बार का पन्ना अभी भी खुला पड़ा था। सूरज थोड़ा ऊपर चढ़ आया था और पन्ने पर पड़ी छाया छोटी हो रही थी, जैसे कोई बात पीछे हट रही हो, छुप रही हो।

मैंने घुटने के बल बैठकर मेज़ के नीचे झाँका।

धूल, सूखी मिट्टी, मकड़ी का एक पुराना जाला, और एक लोहे की कील, जो मेज़ की टाँग के अंदर से बाहर निकली हुई थी। कील पर कुछ बँधा था। कोई धागा नहीं, कोई रस्सी नहीं। पतला, मैला, टूटा हुआ धागा, जो कील के सिरे से दो उँगली नीचे लटक रहा था, ऐसा जैसे कोई चीज़ सालों तक वहाँ बँधी रही हो और एक दिन किसी ने खींचकर ले जाई हो।

टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।

उस्ताद, कुछ मिला?

धागा मिला।

धागे में क्या रखा है।

जो रखा था, वो नहीं है। मैंने धागा उँगली से खोला। सिर्फ़ छत से गिरी धूल आई। यही तो आदमी की आदत है। जो चला गया, उसका पूरा हिसाब नहीं छोड़ता। सिर्फ़ धागा छोड़ता है।

प्रिंसिपल साहब उस वक़्त सीढ़ी से उतर रहे थे, हाथ में काग़ज़ों का एक मुड़ा हुआ बंडल और चश्मे के पीछे वो थकी हुई आँखें, जो रात भर न सोने की गवाही दे रही थीं।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बोले, अंकुश भाई, ये मेज़ बहुत पुरानी है।

मैंने कहा, मैडम बता रहीं थीं।

वो हमारे पिता जी के ज़माने की है। असल में ये मेज़ ही नहीं, ये जगह ही हमारे स्कूल का सबसे पुराना हिस्सा है। बाबा कहते थे कि पहले इस मेज़ के ऊपर ही स्कूल का रजिस्टर रहता था, हाज़िरी की कॉपी रहती थी। साठ-सत्तर साल पहले मास्टर लोग यहीं बैठकर हिसाब लिखते थे। फिर रजिस्टर स्टोर में चला गया, मेज़ यहीं पड़ी रह गई।

मैंने मेज़ पर हाथ रखा।

पत्थर ठंडा था, पर पपड़ी उखड़ी हुई थी। उँगली फिसल रही थी। मैंने हथेली पूरी चौड़ी करके मेज़ की सतह पर बाईं तरफ़ से दाईं तरफ़ घुमाई, और मेरी उँगलियों के नीचे कुछ धँसा महसूस हुआ। कोई निशान। बार-बार चलाने से भर गया, पर खत्म नहीं हुआ। मैंने हथेली से धूल पोंछी।

पत्थर पर चाक से कुछ लिखा गया था, काफ़ी पुराना। अब सिर्फ़ कुछ टूटी लकीरें बची थीं और एक चौकोर, जिसके अंदर एक तिरछी लकीर खींची गई थी।

टिंकू ने कहा, उस्ताद, ये क्या है?

मैंने कहा, ये किसी का आदमी लिखकर छोड़ा हुआ निशान है। ज़्यादातर लोग जब कुछ छुपाते हैं, तो काग़ज़ पर लिखते हैं। स्कूल वाले पत्थर पर लिख गए। खैर, इस वक़्त सिर दुखाने वाली बात ये नहीं।

फिर सानिया ने मेरी कमीज़ खींची और कहा, भैया, स्कूल की घंटी बज गई। बच्चे क्लास में जा रहे हैं।

और तभी मुझे लगा कि मैंने सुबह-सुबह स्कूल का पूरा शरीर देख लिया है, उसकी छत, उसका आँगन, उसकी मेज़। अब बारी थी अंदर जाने की।

एक आदमी की उम्र में स्कूल की खुशबू कभी नहीं बदलती। चाक की धूल, गीले फर्श पर चलने की आवाज़, बेंच की चरचर, और खिड़कियों से आती उस गली की हवा, जिसमें सुबह किसी ने पूरी और किसी ने प्याज़ तली होती है।

मैं जैसे ही गलियारे में घुसा, मेरे सामने छोटी-छोटी पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़ी, जिनके बीच के जोड़ सालों में घिसकर गोल हो गए थे। दीवारें पीली, नीचे तक हरी, और अधूरे नक्शे जिन पर राज्यों के नाम पेंसिल से दोबारा लिखे गए थे। एक क्लासरूम की खिड़की से टाट पट्टी लटक रही थी। दूसरे कमरे में एक उस्ताद ब्लैकबोर्ड पर हाथ से आकृति बना रहे थे और हाथ की उँगली पर चाक की सफ़ेदी जमी थी।

मैं रुका और सोचने लगा, यार, यही न। यही जगह है जिस पर बबलू ने कहा कि पुरानी इमारत नहीं, तो स्कूल का नाम भी नहीं।

ये देखो, तुम सोच रहे होगे कि एक इमारत में क्या रखा है। पक्की छत, टूटे ताले और टेढ़ी बेंच में क्या रखा है। तो सुन लो, इमारत में नहीं, इन बेंचों पर बैठी आदत में रखा है। जो आदमी यहाँ पढ़ा, वो ज़िंदगी भर बेंच की चरचर सुनकर ही किसी की बात मानता है। और यही आदत किसी के बेचने से नहीं बिकती।

टिंकू मेरे पीछे मरोड़ा सा चेहरा बनाए आ रहा था।

वो पीछे वाले कमरे में झाँका और फुसफुसाया, उस्ताद, यहाँ दो कुर्सियाँ अलग रखी हैं। वही कुर्सियाँ, जिन पर कल वेद सर और शालिनी मैडम बैठे थे।

मैंने कहा, हाँ, वही हैं।

उसने कहा, तो कल हमने काम कर दिया न। फिर आज इतनी सुबह क्यों बुलाया?

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। बेटा, कल हमने दो लोगों को बैठा दिया। आज हमें यह देखना है कि जिस कुर्सी पर कोई बैठ गया, वो बैठी रहती है या उठकर फिर अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है। क्योंकि हमारे यहाँ तो यही होता है। एक दिन की सुलह, दूसरे दिन वही झगड़ा।

और तभी गलियारे के दूसरे सिरे से दौड़ती हुई शालिनी मैडम आईं। हाथ में काग़ज़ों का बंडल था, जिस पर मोटी रस्सी के निशान अभी भी बने हुए थे, और चेहरा ऐसा सफ़ेद जैसे कोई बात मुँह में अटक गई हो।

वो सीधी मेरे पास आईं।

अंकुश, तुम आ गए। भगवान का शुक्र है।

मैंने कहा, मैडम, भगवान को बीच में मत लाइए। पहले बताइए, क्या हुआ।

उन्होंने वो बंडल मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

ये आज सुबह का निकला है। ये हमारे हाफ़ईयर की परीक्षा के काग़ज़ हैं, अंकुश। सील बंद थी।

मैंने रस्सी पकड़कर बंडल खोला।

ऊपर के दस-बारह पन्ने असली सवालों के थे, जिन पर स्कूल की मोहर लगी थी। और उनके नीचे, बीच में, अचानक काग़ज़ बदल गया। पुराना पीला, महीन और ऐसा लिखा हुआ जैसे कोई स्याही से नहीं, उम्र से लिखा हो। मैंने पलटा।

ये परीक्षा के काग़ज़ नहीं थे। ये स्कूल का पुराना रजिस्टर था। ज़मीन का हिसाब, पुरानी तारीख़ें, नाप-जोख के नंबर, और बीच में गली की शक्ल का एक हाथ से बना नक़्शा।

मेरा हाथ वहीं रुक गया।

टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ी और धीरे से कहा, उस्ताद, ये तो वही काग़ज़ है।

हाँ बेटा। वही है। वो रजिस्टर, जिसे स्टोर में बंडल में बंद मिला था, उसके पन्ने आज परीक्षा के काग़ज़ों के बीच से निकलकर आए हैं। और इसका मतलब साफ़ है। किसी ने रात में या सुबह तड़के ये बंडल खोला, बीच में ये पन्ने रखे, और सील को ऐसे बंद किया कि देखने में लगे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

शालिनी मैडम की आवाज़ काँप रही थी।

मैंने तो बस सुबह बंडल उठाया। मैंने कुछ नहीं किया।

और तभी पीछे से वेद सर आए, कंधे झुके, हाथ में वही काला फटा बैग, जिससे कल काग़ज़ निकले थे। उन्होंने शालिनी मैडम को देखा और उनका मुँह तुरंत कस गया।

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