The Mysterious Bell – Chapter 245
“किस ज़मीन पर?” मैंने कहा।
“अरे, ये मरम्मत वाला भी यहीं है,” बबलू ने पान चबाते हुए कहा। “सुन ले, मिस्त्री। जिस ज़मीन पर तेरा बोर्ड टँगा है, उसका काग़ज़ भी इसी फ़ाइल में है। सातवाँ नंबर।”
मीरा ने अपना फ़ोन जेब से निकाला और सीधा कैमरा ऑन कर दिया।
“रिकॉर्ड हो रहा है,” उसने साफ़ आवाज़ में कहा। “आप कहिए, सातवाँ नंबर क्या है?”
बबलू ने एक पल मीरा को देखा, और उसके चेहरे पर वो हिसाब चला जो हर धमकाने वाले के चेहरे पर चलता है — कि कैमरा रोके या बोलता रहे।
“देख रहा हूँ,” उसने कहा, “दोनों जवान हो गए हैं। अभी स्कूल का नाम सामने है। कल के बाद नाम भी बदलेगा, और ज़मीन भी।”
प्रिंसिपल ने पीला काग़ज़ जेब से निकाला, जो उनके दराज़ में बंद था।
“इस काग़ज़ पर,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी पर रुकी नहीं, “सिर्फ़ भारद्वाज की नीली मोहर है। सरकारी लाल मोहर नहीं, कोई गवाह नहीं, कोई तारीख़ नहीं। यह काग़ज़ नहीं, यह धमकी है। और धमकी के आगे मैं दस बजे चबूतरी पर बैठूँगा।”
बबलू हँसा। पान की लाल लार उसके होंठ के कोने पर आ गई, और उसने उसे जीभ से खींच लिया।
“चबूतरी पर सब बैठेंगे,” उसने कहा। “देखते हैं कौन किसके साथ खड़ा रहता है।”
वो घूमा और जाने लगा, फिर रुका, और मेरी तरफ़ देखकर बोला।
“और सुन, घंटी जेब में रख। चबूतरी पर मत निकालना।”
वो गया, और उसके पीछे उसके दोनों आदमी भी।
मीरा ने कैमरा बंद किया और लंबी साँस ली।
“इसकी आवाज़ में हमेशा एक बात होती है,” उसने कहा। “ये डरता है।”
रमा मैडम ने पूछा, “किससे?”
“यही तो पता नहीं,” मीरा ने कहा। “अगर पता चल जाए, तो आधी लड़ाई जीत जाएँगे।”
और तभी बच्चे वापस आए। सानिया आगे, हाथ में वो कपड़े में लिपटा बंडल, और पीछे चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़, तीनों ऐसे हाँफ रहे थे जैसे गली के इस सिरे से उस सिरे तक दौड़कर आए हों।
“उस्ताद,” सानिया ने कहा, “वो लिफ़ाफ़ा। जिस पर कुछ लिखा नहीं था। हमने नहीं खोला था, याद है?”
“याद है।”
“आज सुबह हमने खोला।”
उसने बंडल मेज़ पर रखा और कपड़ा खोला।
अंदर वो लिफ़ाफ़ा था, पीला, मैला, और उस पर कुछ भी नहीं लिखा था। उसके अंदर से एक और कतरन निकली — छोटी सी, दो अँगुल चौड़ी, किसी दूसरे अख़बार की, जिसका काग़ज़ महीन और भूरा था।
“ये उसी के अंदर थी,” चिंटू बोला। “किसी ने काटकर रख दी थी।”
मैंने कतरन उठाई और मेज़ पर रखी।
उस पर वही खबर थी — टीचर का घर बिखरने की। पर यह वाली तस्वीर बड़ी छपी थी। इसमें मीरा का चेहरा साफ़ था, माइक साफ़ था, और पीछे वही स्कूल का फाटक।
और फाटक के दाएँ कोने पर…
मैंने उँगली वहाँ रख दी और मेरा हाथ रुक गया।
वहाँ आधा कटा हुआ आदमी दिख रहा था। उसका हाथ ऊपर आया हुआ था, और हाथ में वो पीली फ़ाइल।
पर इस कतरन में उसकी उँगली साफ़ छपी थी।
और उस उँगली में काली अंगूठी थी।
सीधी, मोटी, काली अंगूठी।
मुझे वो दिन याद आ गया जब रणवीर भारद्वाज मेरी दुकान पर आया था, मेज़ पर झुका था, और उसकी उसी काली अंगूठी वाली उँगली के नाखून के नीचे से फ़र्श पर तीन काली बूँदें गिरी थीं। उसने उन्हें सफ़ेद रूमाल से पोंछा था और मेज़ से चुपचाप हटा दिया था।
मेरी जेब में घंटी बजी, एक छोटी पुकार जैसी, और फिर चुप हो गई।
“उस्ताद,” टिंकू ने धीरे से कहा, “आपका चेहरा क्यों बदल गया?”
मैंने कतरन उठाई।
“क्योंकि,” मैंने कहा, और अपनी आवाज़ मुझे बहुत दूर से आती लगी, “पाँच साल पहले उस स्कूल के फाटक के पीछे खड़ा आदमी यह काग़ज़ उठाए था। और ये वो आदमी है जो कल दस बजे चबूतरी पर आने वाला है।”
रमा मैडम ने कतरन मेरे हाथ से ली और देखी।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैं सुनना नहीं चाहता था।
“जिस दिन ये खबर छपी,” उन्होंने धीरे से कहा, “उस दिन ये आदमी स्कूल के फाटक पर खड़ा था। मतलब ये खबर उसे पता थी, छपने से पहले।”
मीरा सफ़ेद पड़ गई।
“नहीं,” उसने कहा। “नहीं, मैंने किसी को नहीं बताया था। सिर्फ़ एडिटर को, सिर्फ़ स्टाफ को…”
वो रुकी, और उसके होंठ खुले रह गए।
क्योंकि दोनों को पता था — स्टाफ में एक आदमी था जो उस वक़्त स्कूलों की खबरें बाहर के लोगों को पहुँचाने का काम करता था।
और मैंने पहली बार कतरन को उल्टा किया।
उसकी पीठ पर, बहुत छोटे, सिले हुए अक्षरों में कुछ लिखा था।
जो लोग पुराने अख़बार सँभालकर रखते हैं, उन्हें यह बात पता होती है कि कभी-कभी लिखा हुआ अंदर से बाहर निकल आता है, और सबसे ज़रूरी बात कभी सुर्ख़ी में नहीं होती, किनारे या पीछे होती है।
मैंने हरफ़ पढ़ा।
और पढ़कर सिर उठाया।
“मीरा,” मैंने कहा, “यह कतरन उस रजिस्टर के बंडल में क्यों थी?”
“मुझे नहीं पता।”
“तो सुन।” मैंने उसे कतरन दी। “ये पीछे का लिखा हुआ पढ़। यहाँ लिखा है — इस खबर का पूरा सच मेज़ के नीचे है।”
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा।
“कौन सी मेज़?”
और मैंने, जो चारों तरफ़ सिर्फ़ मेज़ें देख रहा था, आँगन के बीच उस पुरानी पत्थर की मेज़ की तरफ़ इशारा किया, जिस पर वो पन्ना अभी भी खुला पड़ा था।
“वो।”
सानिया ने आगे झाँका। चिंटू ने गुड्डू की कमर पकड़ी। रफ़ीक़ ने कहा कि वो मेज़ तो बहुत पुरानी है, हिलती भी है।
“तो मिलकर हिलाएँगे,” मैंने कहा। “क्योंकि अब मुझे लग रहा है कि पाँच साल पहले जो अंगूठा लगा, वो इस मेज़ पर नहीं, उस मेज़ पर लगा, जिसके बारे में पापा बोल रहे थे। और जो मेज़ चंद्रेश के दफ़्तर में थी, उसका रास्ता आज शाम चार बजे हमें भारद्वाज भवन ले जाएगा।”
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
“मैडम, आज दस बजे चबूतरी पर आपको बोलना है। और मैं आपसे एक बात कहूँगा — जो आपने पाँच साल चुप रहकर सहा है, वो आज सभा में अगर नहीं निकलेगा, तो गली की आवाज़ आधी निकलेगी।”
रमा मैडम ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
“मैं बोलूँगी,” उन्होंने कहा। “पूरा। और मैं वो भी बोलूँगी जो इस पन्ने में नहीं छपा — कि मुझे पाँच साल यह भी लगा रहा कि मेरा घर सिर्फ़ एक खबर से टूटा। सच यह है कि एक खबर किसी का घर नहीं तोड़ती, अगर घर के अंदर के लोग उसे जोड़ने को तैयार हों। मैंने तबाही का सारा दोष बाहर की और धकेल दिया, क्योंकि अंदर की तरफ़ देखना ज़्यादा दर्द देता था।”
मीरा ने उनकी तरफ़ देखा, और मैंने महसूस किया कि अभी-अभी इस स्कूल के आँगन में एक ऐसी चीज़ जुड़ी है जो पाँच साल से एक काग़ज़ के टुकड़े में बंद थी।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद,” उसने फुसफुसाकर कहा, “अगर दस बजे चबूतरी पर सारे लोग सच बोलेंगे, तो उस आदमी का क्या होगा जो सबसे बड़ा झूठ बोलता है?”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“उसे,” मैंने कहा, “अकेले बोलना पड़ेगा। और जो आदमी सारी ज़िंदगी भीड़ में सच छिपाता रहा हो, वो अकेले बोल नहीं पाता।”
ऊपर आसमान में किसी की पतंग कट गई और डोर का एक हिस्सा हवा में लहराकर स्कूल की छत पर गिरा।
गुड्डू ने ऊपर देखा और कहा, “वो मेरी थी।”
चारों बच्चे हँसे। और मैं भी हँसा, क्योंकि दस बजे से पहले हँसना भी ज़रूरी था, वरना डर सबको खा जाता।
पर मेरे मन में एक बात कुलबुला रही थी, और वो बात वो काली अंगूठी थी।
पाँच साल पहले जो आदमी स्कूल के फाटक पर खड़ा था, वो आज भी गली में आता है, मुस्कुराता है, कंबल बाँटता है, और चाय पीकर कहता है कि यह मोहल्ला उसका है।
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