The Mysterious Bell – Chapter 242
“मैं अंगूठा नहीं लगाऊँगा।”
“किसने कहा अंगूठा लगाइए? आप अंगूठा मत लगाइए, सर। बस छत खाली कर दीजिए। वैसे भी आपकी बेटी सातवीं में है न? नया स्कूल बनेगा तो उसका दाख़िला वहीं हो जाएगा। पहले बैच में। सोचिए।”
मैं बीच में आ गया।
“बबलू भाई, अभी सुबह के आठ बजे हैं। आप इतनी जल्दी बड़े-बड़े सपने दिखाना शुरू कर देते हैं, तो दोपहर तक क्या बचेगा?”
वो मेरी तरफ़ घूमा। उसकी सोने की चेन हिली और उसमें लटकता चौकोर लॉकेट टिक-टिक कर बोला।
“अंकुश यादव। तुम्हारा दस बजे का न्योता है। साहब खुद चबूतरी पर बैठेंगे। वहीं तय होगा।”
“मुझे पता है। मैंने चाय का सामान भी सोच लिया है।”
“चाय?” वो हँसा। “तुम समझते हो ये चाय-वाय का मामला है?”
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं समझता हूँ कि ये वो मामला है जिसमें आपको किसी और को आगे करके बोलना पड़ता है। आप खुद कभी सामने नहीं आते, बबलू भाई। कभी किसी का शटर गिरवाते हो, कभी किसी के बच्चे की नौकरी का लालच देते हो। आप हो क्या, भाई? आप एक काम करने वाले आदमी हो या मशीन जो दूसरों से काम करवाती है?”
उसके चेहरे पर वो हँसी रुक गई। उसने पान का गोला ज़ोर से चबाया, फिर फ़ाइल बंद की और प्रिंसिपल से बोला।
“सर, दस बजे। चबूतरी पर। साहब आपका भी इंतज़ार करेंगे।”
“मैं आऊँगा,” प्रिंसिपल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो डर से नहीं, ठान लेने से आता है।
बबलू जाने लगा, फिर रुका और मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश, एक बात। वो घंटी कहीं दिखाना मत आज। साहब को बुरा लगता है।”
“आप शुक्र कीजिए, बबलू भाई,” मैंने कहा, “घंटी आपकी ज़ुबान नहीं है, वरना दिन में दस बार बजती।”
वो चला गया।
प्रिंसिपल बरामदे की टूटी बेंच पर बैठ गए। उनके हाथ अभी भी काँप रहे थे। मैंने उनके आगे बैठकर कहा, “सर, एक काम है। वेद सर और शालिनी मैडम को उस पुराने नक़्शों वाले कमरे में बैठना है। आप भी साथ बैठिए।”
“अंकुश, उन दोनों में जो है, वो मेरे बस का नहीं है।”
“बस का नहीं, इसीलिए तो कह रहा हूँ। अकेले का नहीं है, साथ का है।”
पुराने नक़्शों वाले कमरे में दो कुर्सियाँ रखकर मैंने वेद सर और शालिनी मैडम को बैठाया। प्रिंसिपल एक कोने में खड़े रहे। रमा मैडम दरवाज़े पर खड़ी रहीं, चुप।
“अब सुनो,” मैंने कहा। “काग़ज़ों का झगड़ा कल खत्म हो गया। आज झगड़ा उसका है जो इन काग़ज़ों से पहले शुरू हुआ था। और जब तक वो नहीं खुलेगा, काग़ज़ कुछ नहीं कहेंगे।”
वेद सर ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, साफ़ किया और वापस पहना।
“मैडम,” उन्होंने कहा। “दस साल पहले रजिस्टर में कुछ पन्ने गायब हुए थे। आपको याद है?”
“हाँ।”
“वो मैंने निकाले थे।”
कमरे में हवा रुक गई।
“आपने क्यों निकाले?”
“क्योंकि उन पन्नों पर आपकी लिखाई थी और मेरी नहीं,” वेद सर ने कहा, और उनकी आवाज़ रुई जैसी थी। “और उसी हफ़्ते प्रिंसिपल सर ने कहा था कि उस साल की सबसे अच्छी रजिस्टर रखने वाली मैडम आप हैं। मुझे लगा कि अगर वो पन्ने आपके हाथ में रहेंगे, तो आप फिर सबसे आगे निकल जाएँगी।”
शालिनी मैडम ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा आया, फिर गुस्सा ढीला पड़ा, फिर कुछ और आया।
“मैंने भी कुछ किया था,” उन्होंने कहा। “पाँच साल पहले, उस खबर के काग़ज़, मैंने वेद सर के रजिस्टर में से नहीं निकाले थे। मैंने वो काग़ज़ अपने हाथ से लिखकर एक लड़की को दिए थे, जो उस वक़्त अख़बार में नई थी और जो अपने पहले महीने में कुछ बड़ा करना चाहती थी। मुझे लगा कि रमा मैडम को नीचा दिखाकर मेरा नाम ऊपर आएगा। वो मेरे प्रमोशन का सबसे बड़ा कारण बना। और मैं पाँच साल से उसी प्रमोशन के कमरे में बैठकर खुद से नफ़रत करती हूँ।”
रमा मैडम दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस एक बार गहरी साँस ली और अंदर आ गईं।
“मैडम, मैं माफ़ी माँगती हूँ,” शालिनी मैडम ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार टूटी।
“मुझे माफ़ी मत माँगो,” रमा मैडम ने कहा। “मुझे ये बताओ कि अब आगे क्या करोगी। क्योंकि माफ़ी की कीमत आगे के काम से चुकाई जाती है, पीछे के रोने से नहीं।”
शालिनी मैडम ने सिर उठाया और कहा, “आज दस बजे मैं चबूतरी पर खुद खड़ी होकर ये सब बोलूँगी। अपने हाथ से लिखा हुआ काग़ज़ भी दिखाऊँगी। जो मेरी वजह से टूटा, मैं उसका हिसाब दूँगी।”
वेद सर ने उनकी तरफ़ देखा और कहा, “और मैं वो पन्ने आज शाम तक ढूँढकर रजिस्टर में वापस लगाऊँगा। दस साल पुराने भी।”
फिर दोनों एक साथ हँसे। वो हँसी अजीब थी — जैसे दो लोग एक ही पुराने मज़ाक को बीस साल बाद याद कर रहे हों।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी बजी।
अंदर से आवाज़ आई, और मैं चौंक गया।
क्योंकि इस बार की आवाज़ पहले जैसी फुसफुसाती नहीं थी। वो साफ़ थी। इतनी साफ़ जैसे कोई बहुत दूर से नहीं, मेरे ठीक पीछे खड़े होकर बोल रहा हो।
“बीस अंक। जुड़ा।”
“बस?” मैंने मन ही मन कहा।
“बस नहीं। सुन। तेरी आवाज़ अब और साफ़ सुनाई देगी। जितना बड़ा जुड़ाव, उतनी साफ़ आवाज़। जो रिश्ता सालों का टूटा हो, वो जुड़े तो आवाज़ की परत भी उतरती है।”
“मतलब तू पहले आधा बोल रहा था?”
“पहले मैं तुझे आधा सुनाता था। अब तू सुनने लायक हो गया है।”
मैं हँस पड़ा। ऐसे हँसा कि वेद सर ने मेरी तरफ़ देखा और पूछा, “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं सर,” मैंने कहा। “मुझे लगा किसी ने मेरे कान के अंदर बत्ती जला दी।”
“कुल अंक एक सौ अड़सठ से एक सौ अड़ासी हो गए,” घंटी ने कहा, और ये आँकड़ा भी पहली बार इतने साफ़ बोला, जैसे कोई हिसाब की कॉपी पढ़ रहा हो।
फिर उसने वो बात कही जिसने मेरा दिन बदल दिया।
“सौ अंक की शक्ति है तेरे पास। सच्ची ज़ुबान। पर आज मत खरीदना।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो अपनी ज़ुबान से सच बोलेगा, वो गिना जाएगा। जो मेरी ज़ुबान से बोलेगा, वो किराये का सच होगा। किराये का सच माफ़ी नहीं बनता।”
मैंने जेब में हाथ डालकर घंटी दबा दी। सच कहूँ तो उस वक़्त मेरे मन में यही आया था — मीरा को एक मिनट के लिए सच बोलने पर लगा दूँ, बात खत्म। पर घंटी ने पहले ही जवाब दे दिया, और मुझे अच्छा लगा कि उसने मना किया। वरना मैं वही कर बैठता जो सबसे आसान था, और आसान कभी सही नहीं होता।
मैं बाहर आया तो प्रिंसिपल बरामदे में खड़े थे, हाथ में एक पीला काग़ज़। उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया, फिर वापस खींच लिया, फिर गहरी साँस लेकर बढ़ा दिया।
“ये वही नोटिस है,” उन्होंने कहा। “मैंने इसे दराज़ में बंद कर दिया था। चाबी धोती की गाँठ में बाँध ली थी, जैसे कोई डर बाँधकर रखा जाता है।”
“अब क्यों निकाला?”
“क्योंकि मैंने दो महीने पहले सोचा था कि चुप रहकर मैं अपनी नौकरी बचा लूँगा। आज सुबह देखा कि मैंने नौकरी नहीं बचाई, मैंने चुप्पी बचाई। और चुप्पी को बचाने का कोई मुआवज़ा नहीं मिलता।”
“दस बजे?”
“दस बजे,” उन्होंने कहा। “और अंकुश, एक बात। बबलू जो काग़ज़ दिखा रहा है, उस पर सिर्फ़ नीली मोहर है। सरकारी लाल मोहर नहीं है। और नीचे तारीख़ के आगे कोई गवाह नहीं है। मैं इस काग़ज़ के साथ तीस साल की उम्र लेकर जाऊँगा, पर जाऊँगा।”
मैंने उनका हाथ पकड़ा, फिर छोड़ दिया, क्योंकि मेरे हाथों में ग्रीस थी और उनके हाथ में उम्मीद।
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