The Mysterious Bell – Chapter 241
मेरे हाथ में कतरन थी और टिंकू मेरे घुटने पर सिर रखकर सो रहा था। स्कूल का आँगन सुनसान था। गेट पर लगा बल्ब जल रहा था, उसकी पीली रोशनी में पत्थर के फ़र्श
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रात के तीन बजे स्कूल का आँगन ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूरी इमारत के कानों में रुई ठूँस दी हो। नाली में पानी की एक बूँद गिरती है, टप, और वो आवाज़ दीवार से टकराकर लौट आती है। गेट का बल्ब जल रहा है और उसकी पीली रोशनी में पत्थर का फ़र्श ऐसा दिख रहा है जैसे किसी ने उस पर पुराना तेल फैला दिया हो।
टिंकू मेरे घुटने पर सिर रखकर सो रहा है। मुँह खुला हुआ, साँस में हल्की सी सीटी, और दोनों हाथ पेट पर जुड़े हुए, जैसे सोते-सोते भी किसी चीज़ को पकड़े हुए हो।
मैंने धीरे से उसका मोज़ा छुआ। चाबी अंदर थी। छोटी ठंडी धातु, जो मेरी उँगली के नीचे मोज़े के धागे से सटकर महसूस हुई। मैंने हाथ खींच लिया।
तुम सोच रहे होगे कि एक आदमी रात भर स्कूल के आँगन में बैठकर क्या करता है। सच कहूँ तो मैं सो नहीं रहा था, बस बैठा था, और अपने ही सवाल को उलट-पलट कर देख रहा था।
सवाल वो नहीं था जो मीरा के काग़ज़ में लिखा था। सवाल ये था कि जो लड़की पाँच साल से इस गेट पर खड़ी होती है और अंदर नहीं आती, वो आज दस बजे के बाद अपनी आवाज़ कहाँ से लाएगी।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो बजी नहीं। बस गरम थी, जैसे किसी ने अभी अभी उसे हाथ में पकड़कर रखा हो और चला गया हो।
सुबह पाँच बजे चौकीदार बाबा की खाँसी सुनाई दी। वो अपनी चारपाई से उठकर गेट की कुंडी खोलने लगे, तो लोहे की आवाज़ ऐसी आई जैसे कोई बूढ़ा आदमी ज़ोर से जम्हाई ले रहा हो।
मैंने टिंकू के कंधे को हिलाया।
“उठ, सूरज की तरह नहीं, इंसान की तरह उठ।”
“उस्ताद, पाँच मिनट,” उसने आँखें बंद रखे हुए ही कहा।
“पाँच मिनट में मीरा दीदी आ जाएँगी, और फिर तेरी वो पाँच मिनट किसी काम की नहीं रहेंगी।”
वो उठ बैठा, बाल उलझे हुए, आँखें सूजी हुईं। उसने पहले अपना मोज़ा टटोला, फिर चाबी निकालकर हथेली पर रखी और देखकर मुस्कुरा दिया, जैसे सुबह की पहली जीत मिल गई हो।
सवा छह बजे सानिया आई। उसके हाथ में उसकी लाल कवर वाली कॉपी थी, जिसे वो सीने से लगाए हुए थी, जैसे कोई स्कूल का बस्ता नहीं, कोई खज़ाना हो।
“उस्ताद, मैंने रात भर सोचा,” उसने कहा। “टेम्पो काला था, पर उसके ऊपर का काग़ज़ पीला था। और उसमें से बोरा नहीं उतारा गया। दो आदमी सीढ़ी लेकर अंदर गए। एक के हाथ में पीतल जैसी बड़ी चाबी थी।”
“कितने बजे?”
“अंधेरा था, उस्ताद। पौने पाँच जैसा। पर मैं जगी थी, क्योंकि माँ को खाँसी आ रही थी।”
रफ़ीक़ दौड़ता हुआ आया, हाँफते हुए।
“सफ़ेद गाड़ी नहीं है। मैंने मोड़ से लेकर दवाखाने तक देखा, कहीं नहीं है।”
“अच्छा है,” मैंने कहा। “आज वो सीधे नहीं आएगी। वो चुपचाप आएगी, बिना गाड़ी, बिना जूतों की चमक। देखना।”
गुड्डू ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, “उस्ताद, आपको सब पहले कैसे पता चल जाता है?”
“इसलिए कि मैं रात भर जागता हूँ,” मैंने कहा, “और तुम लोग टॉफ़ी चबाकर सो जाते हो।”
चिंटू ने अपनी जेब से एक चपटा किया हुआ काग़ज़ निकाला।
“उस्ताद, ये मैंने कल रजिस्टर के बंडल से निकाला था, पर फटे टुकड़ों में था। सानिया ने इसे पहचान लिया और इसीलिए हम तीनों ने मिलकर इसे… उस्ताद, ये हम लोग आपको दस बजे देने वाले थे। पर अब दे दें?”
“दस बजे क्यों?”
“क्योंकि रफ़ीक़ ने कहा कि अगर ये बड़ी चीज़ है, तो सबके सामने देंगे।”
इतने में सात बज गए। मैंने गेट पर नज़र डाली।
मीरा खड़ी थी।
स्कूल के फाटक के बाहर, ठीक उसी जगह जहाँ पाँच साल से लोग उसे खड़ा होते देखते आए थे। तिपाई पर लगा कैमरा नहीं था, बैग नहीं था, सिर्फ़ एक कपड़े का थैला हाथ में था और सफ़ेद कुर्ता, नीली जीन्स। बाल बँधे हुए, पर कुछ लटें खुली हुईं, जैसे उसने जल्दी में बाँधे और फिर भूल गई।
मैं गेट तक गया।
“अंदर क्यों नहीं आ रही?”
“आ जाऊँगी,” उसने कहा, पर पैर नहीं हिले।
“मीरा, तू पाँच साल से यहाँ इसी जगह खड़ी है। आज अंदर आ।”
उसने मेरी तरफ़ देखा और वो नज़र ऐसी थी जैसे कोई नाव बीच नदी में रुक गई हो।
“अंकुश, मुझे लगता है मैं आज बोल नहीं पाऊँगी।”
“तो नहीं बोलेगी। पर आज तू अंदर आ, गेट पर मत खड़ी रह। बस इतना।”
वो हँसी, पर हँसी फटी हुई थी।
“तू आसान कर देता है सब,” उसने कहा। “इतना आसान नहीं है। मैंने पाँच साल पहले उस औरत के घर तोड़ा, और आज मैं उसी के सामने खड़ी होकर कहूँगी कि मुझे माफ़ कर दो।”
“सच बोलना माफ़ी माँगना नहीं होता, मीरा। सच बोलना सिर्फ़ सच बोलना होता है।”
उसने थैले को कसकर पकड़ लिया।
“अंदर एक लिफ़ाफ़ा है,” उसने धीरे से कहा। “मैंने आज से पाँच साल पहले लिखा था। रमा मैडम के लिए। कभी डाक में नहीं डाला। हर साल निकालती हूँ, हर साल वापस रख देती हूँ।”
“आज दे देगी।”
“पता नहीं।”
“दे देगी,” मैंने कहा। “क्योंकि आज तू वो लड़की नहीं है जो पाँच साल पहले थी। आज तेरे पास एक बात है जो उस वक़्त नहीं थी।”
“क्या?”
“आज तेरे पास वो लोग हैं जो तेरे साथ खड़े हैं।”
वो अंदर आई। उसके जूते पत्थर पर ऐसे बजे जैसे कोई बहुत देर बाद अपने ही घर की सीढ़ी पर चढ़ रहा हो।
और फिर रमा मैडम गेट से आती दिखीं। उनके हाथ में चाक का डिब्बा था और एक पुराना रजिस्टर, और वो जैसे ही आँगन में घुसीं, मीरा की पीठ सीधी हो गई, फिर ऐसे झुक गई जैसे किसी ने उसके कंधों पर बोझ रख दिया हो।
“मैडम, एक मिनट,” मीरा ने कहा, “मुझे कुछ काम याद आ गया।”
और वो मुड़कर चल दी। तेज़ कदम, थैला सीने से चिपका हुआ, गेट पार किया, और बाईं तरफ़ गली में मुड़ गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
रमा मैडम ने देखा, फिर मुझसे पूछा, “वो लड़की थी न? जो रोज़ गेट पर खड़ी होती है?”
“हाँ, मैडम। आज अंदर भी आई थी। दो मिनट के लिए।”
रमा मैडम ने कुछ नहीं कहा, बस चाक का डिब्बा कसकर पकड़ लिया और अंदर चली गईं।
मेरी जेब में घंटी हिली, बिना बजे।
“बोल,” मैंने मन ही मन कहा।
आवाज़ आई, साफ़, पर छोटी।
“जो माफ़ी देने से डरता है, वो हिम्मत से नहीं, अपनी ही नज़र से डरता है।”
“ये पहेली मत बुझा। सीधा बोल।”
“उसके सामने खड़ी हो, तो उसकी नज़र उतरेगी। पहले उतरने दे।”
और फिर चुप।
मैं आँगन में वापस आया। पौने आठ बजे स्कूल के गेट पर स्कूटर की आवाज़ आई और बबलू पांडे अपने दो आदमियों के साथ अंदर घुसा। एक के हाथ में मोटी लाठी थी, दूसरे के हाथ में काला बैग। बबलू के हाथ में वो मोटी पीली फ़ाइल थी जिसे मैंने पहले भी देखा था, जिसके ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली गोल मोहर थी।
वो सीधा प्रिंसिपल के पास गया, जो बरामदे में खड़े थे।
“सर, नमस्ते,” बबलू ने कहा, और उसके मुँह से पान की लाल लार उसकी ज़ुबान पर चमकी। “मैं आपका वक़्त नहीं लूँगा। बस एक बात। छत कल सुबह से बंद। मशीन आ रही है।”
“कौन सी मशीन?” प्रिंसिपल ने पूछा।
“वही जो पुरानी चीज़ें हटाती है, सर।”
“पहले काग़ज़ दिखाओ।”
बबलू ने फ़ाइल खोली और पन्ना सामने रख दिया। प्रिंसिपल ने पढ़ा और उनका चेहरा बदल गया।
“इसमें सिर्फ़ ज़मीन लिखी है। मरम्मत का ज़िक्र नहीं।”
“मरम्मत का ज़िक्र क्यों होगा, सर? जो इमारत गिरनी है, उसकी मरम्मत कौन करता है?”
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