The Mysterious Bell – Chapter 240
ताला आख़िर खुला। मैंने उसे उतारकर टिंकू की तरफ़ बढ़ाया। “रख ले, ये यादगार है।”
नया ताला लगाते वक़्त टिंकू ने टॉर्च थोड़ी नीचे की, और रोशनी मेरे हाथों पर पड़ी। मेरी उँगलियों में ग्रीस थी और स्कूल की छत की धूल भी।
“उस्ताद,” टिंकू ने कहा, “तीन चाबी हैं। एक प्रिंसिपल सर को, एक रमा मैडम को… और तीसरी?”
“तीसरी तेरे मोज़े में,” मैंने कहा।
“मेरे मोज़े में?”
“हाँ। क्योंकि जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी, तब उस चाबी को सबसे कम उम्मीद वाले आदमी के पास होना चाहिए। और बच्चे, तुम लोग सबसे कम उम्मीद वाले हो नहीं, पर सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ किए जाने वाले ज़रूर हो।”
टिंकू ने चाबी अपने मोज़े में डाल दी। उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसे कोई खज़ाना सौंपा गया हो।
तभी मैंने नीचे मुड़कर देखा।
आँगन के कोने में नीम के पेड़ के नीचे एक स्टूल था, और उस पर रमा मैडम बैठी थीं। उनके हाथ में लालटेन थी, जो बहुत धीमी रोशनी दे रही थी। उन्होंने कभी हमें नहीं टोका कि तुम क्या कर रहे हो। वो सिर्फ़ बैठी रहीं, जैसे स्कूल की कोई बुज़ुर्ग इमारत खुद बैठकर देख रही हो।
और गेट की तरफ़, अंधेरे में, मीरा खड़ी थी।
उसका कैमरा तिपाई पर नहीं था, हाथ में लाइट नहीं जल रही थी। वो बस खड़ी थी, और उसकी नज़र नीम के नीचे जा रही थी।
रमा मैडम की ओर।
मैं सीढ़ी से उतरा।
“मीरा,” मैंने कहा, “तू आई? सुन, मैं तुझे बताने ही वाला था कि ताला हमने…”
वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी।
“मीरा?”
“मैं… मैं बाद में आती हूँ,” उसने कहा।
“क्या हुआ? तेरा चेहरा…”
“अंकुश, बाद में।” उसने कैमरा बैग में डाला, बेल्ट खींची, और इतनी जल्दी मुड़ी कि उसका बैग सीढ़ी से टकराया। “कल सुबह आती हूँ। सात बजे? सात बजे मैं यहाँ होऊँगी।”
वो गई। गली के मोड़ पर उसने एक बार पीछे देखा — नीम के पेड़ की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ — और फिर अंधेरे में खो गई।
मैं नीम के पेड़ के पास गया।
“रमा मैडम, आप इतनी रात तक यहाँ?”
“मैं रोज़ यहाँ बैठती हूँ,” उन्होंने कहा। “बच्चे चले जाते हैं, फिर मैं बैठती हूँ। तीस साल से।” उन्होंने लालटेन थोड़ी ऊँची की। “वो लड़की आती है। महीने में दो-चार बार। गेट पर खड़ी होती है, अंदर नहीं आती, कुछ नहीं पूछती। और चली जाती है।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
“आप उसे जानती हैं?”
“मैं उसे नहीं जानती,” रमा मैडम ने कहा। “पर मैं उस लड़की की आवाज़ को जानती हूँ।” वो उठीं, लालटेन उठाई। “बत्ती बुझाना मत भूलना।”
वो चली गईं।
स्टोर वाले कमरे में रोशनी थी। बच्चे अंदर घुसे हुए थे, क्योंकि यहाँ से रास्ता छत तक जाता था और अंदर गर्मी थी। अलमारी पर पुराने रजिस्टरों का ढेर था, जो जूट की रस्सी से बँधा था। ऊपर का रजिस्टर पुराने अख़बार में लिपटा हुआ था।
वेद सर भी वहीं खड़े थे। मैंने देखा, उनकी नज़र उस रजिस्टर पर थी, बार-बार। ऐसे कोई चीज़ देखता है जिसे वो जानता है।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “वो रजिस्टर मत छेड़ो।”
“क्यों, सर?”
“क्योंकि…” उन्होंने चश्मा ठीक किया। “क्योंकि उसमें एक काग़ज़ है जो मेरा है।”
सानिया पहले ही रस्सी खोल रही थी। रजिस्टर का पन्ना खुला और बीच में से एक मोड़ा हुआ अख़बार का कतरन निकला। पुराना, पीला, किनारों से फटा, और ऊपर एक छोटी सी तस्वीर।
तस्वीर में एक लड़की थी, हाथ में माइक, सिर पर बँधा कपड़ा, आँखों में वही जल्दबाज़ी। मीरा। पाँच साल पहले की मीरा, कुछ पतली, कुछ छोटी, पर आँखें वही।
ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था — “बस्ती की आवाज़ ने उजाड़ा टीचर का घर।”
मैंने वो कतरन हाथ में उठाया। मेरे हाथ ठंडे थे।
“ये किसने रखा है?” मैंने पूछा।
वेद सर ने सामने आकर खड़े होकर कहा, “मैंने।”
“आपने?”
“उस हफ़्ते मैंने ये काटा था,” वेद सर ने कहा। “क्योंकि इस खबर में हमारे स्कूल का नाम भी था। मैंने सोचा था कि मैं इसे प्रिंसिपल सर को दिखाऊँगा, कहूँगा — सर, देखिए, स्कूल का नाम कहाँ-कहाँ जा रहा है। पर…” उन्होंने हाथ फैलाए। “…पर उस दिन सर का मिज़ाज अच्छा था। मुझे लगा आज नहीं, कल कहूँगा। और वो कल पाँच साल ले गया।”
मैंने कतरन खोलकर पढ़ा।
तीन लाइनें थीं। बस तीन।
“रमा सिंह, सरकारी स्कूल की शिक्षिका, के परिवार पर आरोप। पति ने घर छोड़ा। बेटी का स्कूल बदला। स्कूल प्रशासन ने मामले से दूरी बनाई।”
और नीचे, मीरा की तस्वीर के नीचे, छोटे अक्षरों में एक लाइन थी जो मैंने आख़िर में पढ़ी, क्योंकि वो सबसे छोटी थी और सबसे भारी थी।
“आरोप अब तक साबित नहीं।”
मैंने कतरन मेज़ पर रख दिया।
तुम सोच रहे होगे कि इसमें क्या बड़ी बात है। पाँच साल पुरानी खबर है, मीरा ने खुद कबूल कर लिया है, रमा मैडम जानती हैं, सब जानते हैं।
पर एक बात है जो मैं उस वक़्त समझ गया और जो तुम्हें अभी समझनी है।
वो लाइन — “आरोप अब तक साबित नहीं” — सबसे नीचे छपी थी। सबसे छोटी थी। तीन लाइन के ऊपर एक बड़ा शीर्षक था, जिसमें कहा गया था कि एक टीचर का घर टूट गया।
और घर उस शीर्षक से टूटता है, उस छोटी लाइन से नहीं।
मैंने कतरन हाथ में लेकर वेद सर की तरफ़ देखा।
“सर, अगर ये खबर साबित नहीं थी, तो रमा मैडम के पति घर क्यों छोड़ गए?”
वेद सर चुप रहे।
“क्योंकि जब आधी बात पूरी गली में फैल जाए,” उन्होंने धीरे से कहा, “तो सच बाद में आता है, और सच को कोई नहीं सुनता।”
मैंने सानिया की तरफ़ देखा।
“ये कतरन तुमने निकाला?”
“ना, उस्ताद,” सानिया ने कहा। “चिंटू ने। वो रजिस्टर हिला रहा था।”
“मैं सिर्फ़ देख रहा था कि इतना मोटा रजिस्टर है, इतना मोटा,” चिंटू ने कहा। “और अंदर से काग़ज़ निकला।”
मैंने उसका सिर रगड़ दिया।
“ठीक किया। तुम चारों ने आज वो ढूँढा जो मैं पाँच दिन में नहीं ढूँढ पाया।”
गुड्डू ने टॉफ़ी चबाते हुए कहा, “तो अब मीरा दीदी जेल जाएँगी?”
“नहीं, गुड्डू,” मैंने कहा। “पर ये ज़रूर है कि मीरा दीदी ने आज रात मुझे जो बताया था — ‘आधा सच’ — वो आधा सच नहीं था। वो पूरा निशान था।”
और मुझे वो पल याद आया — रमा मैडम उस रात कह रही थीं कि वो लड़की गेट पर खड़ी होती है, अंदर नहीं आती। पाँच साल से।
पाँच साल से मीरा उस गेट पर खड़ी है।
उस रात मैं स्कूल में बैठा रहा। टिंकू मेरे पास सो गया, सिर मेरे घुटने पर। ऊपर नई छत का दरवाज़ा बंद था, नया ताला लगा हुआ था, और उसकी एक चाबी एक तेरह साल के लड़के के मोज़े में थी।
बाहर गली में हवा चल रही थी, और दूर कहीं, बहुत दूर, जैसे किसी स्कूटर का हॉर्न बजा हो — छोटा, तेज़, अपने ही आने की खबर देने वाला।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को हल्का दबाया। वो बजी नहीं। बस गरम थी, जैसे किसी ने उसे अभी छोड़ा हो।
मैंने कतरन को दोबारा खोला और उस छोटी लाइन को उँगली से छुआ — “आरोप अब तक साबित नहीं।”
कल सुबह सात बजे स्कूल के आँगन में सब होंगे — टिंकू, सानिया, चिंटू, गुड्डू, रफ़ीक़, मीरा, और वो आदमी जो छत पर चढ़ने आएगा।
और अब मेरे पास एक नया सवाल था, जिसका जवाब मुझे किसी काग़ज़ से नहीं, किसी इंसान से चाहिए था।
सवाल ये नहीं था कि मीरा ने पाँच साल पहले क्या लिखा।
सवाल ये था — जो लड़की पाँच साल से उस गेट पर खड़ी है और अंदर नहीं आती, वो आज सभा में सच बोलने की हिम्मत कहाँ से लाएगी?सवाल ये था — जो लड़की पाँच साल से उस गेट पर खड़ी है और अंदर नहीं आती, वो आज सभा में सच बोलने की हिम्मत कहाँ से लाएगी?
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