The Mysterious Bell – Chapter 239
“मैंने सोच लिया,” प्रिंसिपल सर ने कहा। उनकी आवाज़ साफ़ थी। “छत कल सुबह से खाली नहीं की जाएगी।”
बबलू का हाथ लॉकेट पर रुक गया।
“सर, आपकी ज़ुबान आज कुछ ऐसी लग रही है जैसे किसी और की है।” वो स्कूटर से उतरा और उसने फ़ाइल खोली। “ये देखिए। स्कूल के पिछले हिस्से की ज़मीन, ऊपर का खाली हिस्सा, दोनों का काग़ज़।” उसने पन्ना पलटा। नीली गोल मोहर साफ़ दिख रही थी। “सिर्फ़ एक अँगूठा। और ये जगह क्या कहती है — कि छत खाली चाहिए, जल्दी। सर, जल्दी का मतलब साहब के मुँह से ऐसा निकलता है जो बाद में बदल जाता है। कल सुबह तक काग़ज़ रहा तो कहानी वही रहेगी। आज रात काग़ज़ निकल गया तो…” उसने फ़ाइल बंद की। “…तो कहानी बदल जाएगी, सर।”
“बबलू,” प्रिंसिपल सर ने कहा, “मेरी बेटी इसी स्कूल में पढ़ती है।”
“मुझे पता है, सर। सातवीं में।”
“तुम्हें ये भी पता है कि अगर छत गिरी और एक बच्चा भी घायल हुआ, तो सबसे पहला नाम किसका आएगा?”
बबलू हँसा। छोटी, सूखी हँसी, जिसमें कोई मज़ाक नहीं था।
“सर, इसीलिए तो साहब कहते हैं — छत जल्दी खाली कीजिए। छत गिरने से पहले।” वो स्कूटर पर बैठा। “दस बजे। कल। और साहब ऐसा आदमी नहीं जो तारीख़ बदले।”
वो चला गया। चला जाता है, ये तुमने अब तक समझ लिया होगा। बबलू नहीं जाता, बबलू निकलता है। फ़र्क़ यही है।
मैं बाहर आया।
“सर, अब बताइए,” मैंने कहा। “कल सुबह स्कूल में कौन होगा? सिर्फ़ आप, या आपका स्टाफ भी?”
प्रिंसिपल सर मेरी तरफ़ देखते रहे।
“वेद को बुलाओ,” उन्होंने कहा।
“अभी? रात को?”
“अभी।”
सानिया और चिंटू दौड़कर वेद सर को बुलाने गए। मैं स्कूल के आँगन में उस टूटी बेंच के पास खड़ा था जिसकी टाँग कल मैंने मज़बूत की थी। चारों तरफ़ अंधेरा था, सिर्फ़ स्टाफ वाले कमरे की बत्ती जल रही थी।
वेद सर आए, पैंतीस मिनट में। बाल गीले, चश्मे पर पानी की बूँदें, हाथ में एक फ़ाइल, जो उन्होंने पकड़ी हुई थी जैसे कोई बच्चा अपना टिफ़िन पकड़ता है।
“सर,” उन्होंने दरवाज़े पर ही कहा, “इस्तीफ़ा तैयार है। साफ़ लिखा हुआ है। और महीने का हिसाब भी मिला दीजिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
“अंदर आओ, वेद।”
“सर, मैं…”
“बैठो।” मैंने एक स्टूल खींचा। फिर दूसरा। “आप दोनों बैठिए। बात नहीं करनी है, बस दो मिनट सुन लीजिए।”
वेद सर बैठे। उन्होंने फ़ाइल घुटनों पर रखी और दोनों हाथ उस पर।
“वेद,” प्रिंसिपल सर ने कहा, “बाईस साल पहले जब तुम आए थे, तो मुझे तुम पसंद नहीं थे।”
वेद सर ने उनकी तरफ़ देखा।
“मुझे पता था, सर,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस थकान थी। “चार महीने में पता चल गया था।”
“और एक बात मुझे आज तक नहीं कहनी थी,” प्रिंसिपल सर ने आगे कहा। “तीन महीने जब मैं अपनी माँ के पास गया था, तुमने मेरी क्लास पढ़ाई। लौटकर मैंने चौकीदार से सुना कि बच्चे तुम्हें मुझसे ज़्यादा बुलाते थे। और वो एक वाक्य मेरे अंदर बाईस साल से बैठा है, और मैंने एक बार भी उसे बाहर नहीं निकाला।”
“सर…”
“आज सुबह जब तुम्हारे बैग में काग़ज़ मिले, मैंने सोचा — देखा, मैं सही था।” प्रिंसिपल सर ने काग़ज़ों के ढेर की तरफ़ देखा। “वो मेरा सबसे बड़ा झूठ था, वेद।”
वेद सर कुछ देर चुप बैठे। फिर उन्होंने फ़ाइल उठाई और मेज़ पर रख दी।
“सर,” उन्होंने कहा, “इस स्कूल में कोई मुझे पसंद नहीं करता, ये मुझे बाईस साल पहले पता चल गया था। पर मैं ये भी जानता हूँ कि स्कूल में सबसे पहले आने वाला आदमी मैं हूँ और आख़िर में जाने वाला भी।” उन्होंने चश्मा उतारकर रूमाल से पोंछा। “मैंने कभी आपकी कुर्सी को हाथ नहीं लगाया।”
“मैंने तुम्हारी मेहनत को हाथ नहीं लगाया,” प्रिंसिपल सर ने कहा। “मैंने उसे देखा ही नहीं।”
और फिर वो हुआ जो मैं चार साल में कभी नहीं देख पाया था। प्रिंसिपल सर उठे, वेद सर के सामने खड़े हुए और उन्होंने अपनी जेब से रूमाल निकाला। पर वो पोंछने के लिए नहीं था। वो बस हाथ में था, इसीलिए कि हाथों को कुछ पकड़ना था।
“वेद, सच ये है कि इस स्कूल का सबसे अच्छा मास्टर तुम हो। और मुझे ये बाईस साल में सबसे पहले आज कहने में शर्म आ रही है। माफ़ कर दे।”
वेद सर ने अपनी फ़ाइल को दोनों हाथों से मज़बूत पकड़ लिया। फिर उन्होंने बहुत धीरे कहा, “सर, सच ये है कि मैं आज इस्तीफ़ा लेकर आया हूँ, पर मैं इस स्कूल से जाना नहीं चाहता। कभी नहीं चाहता था। मेरा कोई और ठिकाना नहीं है।”
कमरे में कुछ नहीं बोला। बस शालिनी मैडम ने मुँह फेर लिया।
और मेरी जेब में घंटी बजी।
टन्।
मैंने दोनों हाथ जेब पर रखे, पर घंटी अपने आप बज रही थी — वो उनके बीच की चीज़ थी, मेरे हाथ की नहीं।
और इस बार आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी हमेशा होती थी। हमेशा वो टुकड़ों में बोलती थी। आज उसने पूरा वाक्य कहा।
“बीस। और अब सुनाई दे रहा है।”
मैं खड़ा रह गया।
“कितना?” मैंने धीरे से पूछा।
“एक सौ अड़सठ।”
और सच कहूँ तो उस वक़्त मुझे अंक नहीं गिने। मुझे बस ये सुनाई दिया — “अब सुनाई दे रहा है।” जैसे रेडियो पर कोई स्टेशन ढूँढते-ढूँढते अचानक साफ़ हो जाता है। पहले एक शब्द आता था, फिर शोर, फिर शब्द। आज पूरी बात आई। और मुझे लगा कि ये तंत्र बड़े रिश्तों के पास ज़्यादा साफ़ बोलता है। छोटी सुलह में वो बस काम बता देता था। बाईस साल की चुप्पी जुड़ी, तो उसकी आवाज़ खुल गई।
फिर शालिनी मैडम उठीं।
“सर,” उन्होंने कहा, और उनका गला सूखा था, “एक बात मैंने अभी तक नहीं कही।”
“कहो।”
“छत की चाबी।” उन्होंने हाथ जोड़ लिए। “सुबह वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी मेरे घर के बाहर आया। उसने कहा — बच्ची का इलाज, सब साहब उठाएँगे। और बदले में सिर्फ़ एक चीज़। छत की चाबी।” वो रुकीं। “मैंने दे दी।”
प्रिंसिपल सर की कुर्सी पीछे खिसकी।
“तुमने क्या किया?”
“मैंने दे दी, सर।” शालिनी मैडम की आवाज़ टूट रही थी। “और मुझे पता है मैंने क्या किया। मुझे बस ये बताइए कि अब क्या होगा।”
“अब क्या होगा?” प्रिंसिपल सर खड़े हो गए। “अंकुश, अब क्या होगा? वो लोग कल सुबह छत पर…”
“सर, बैठिए।” मैंने कहा। “चाबी उनके पास है। ताला हमारे पास है।”
रात नौ बजे मैं अपनी दुकान से औज़ारों का ट्रंक उठाकर स्कूल लाया। साथ में एक नया ताला और तीन चाबियाँ। पुराना ताला जो मैंने अपने ट्रंक पर लगाया था, वो गली के उस बूढ़े कबाड़ी से लिया था — जिसकी चाबी में ज़ंग लगी थी और ताला नया।
स्कूल के आँगन में लोहे की सीढ़ी। टिंकू ने टॉर्च पकड़ी, सानिया ने नीचे खड़े होकर ऊपर देखा, चिंटू ने सीढ़ी का पाया थामा, और गुड्डू ने बीच में एक बार कहा कि उसे भूख लगी है, तो सानिया ने उसे अपनी जेब से टॉफ़ी दे दी — वही टॉफ़ी जो बबलू ने बाँटी थी।
“इसे मत खा, गुड्डू,” मैंने कहा। “किसी के दिए से पेट भरता है तो पेट का क्या, दिल का क्या?”
“तो फेंक दूँ?”
“खा ले। पर याद रखना, टॉफ़ी का दाम आज नहीं, कल लिया जाता है।”
सीढ़ी के ऊपर छत का दरवाज़ा था। लोहे का, ज़ंग लगा। पुराना ताला अंदर से फँसा हुआ था। मैंने उसमें तेल डाला, दो बार पेचकस से हिलाया, फिर हथौड़ी से हल्का उछाला।
“उस्ताद, ताले में क्या जान है?” टिंकू ने पूछा। “जो चाबी मिली थी, वो नहीं चला?”
“कुंजी किसी और की, ताला किसी और का, और दरवाज़ा हमारा,” मैंने कहा। “अब ताला भी हमारा होगा।”
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