The Mysterious Bell – Chapter 238
“अभी।” मैंने बच्ची की तरफ़ देखा। “बच्ची को किसी पड़ोसी के यहाँ छोड़ दीजिए। एक घंटा। बस एक घंटा। मैडम, अगर हम सुबह तक रुके, तो सुबह सात बजे वो बच्चा उस छत पर होगा। और फिर देखिए, उसके बाद कोई भी काग़ज़, कोई भी अंगूठा, कोई भी माफ़ी — कुछ नहीं बचेगा।”
वो बच्ची की तरफ़ देखने लगीं, फिर मेरी तरफ़।
“तुम कल सुबह वहाँ रहोगे?”
“मैं वहाँ रहूँ या न रहूँ,” मैंने कहा, “छत की चाबी अब साहब के आदमी के पास है। और अगर चाबी उसके पास है, तो कल सुबह सात बजे कुछ न कुछ होगा। मेरा काम सिर्फ़ इतना है कि जब वो कुछ करे, तब मैं वहाँ खड़ा मिलूँ।”
शालिनी मैडम ने मेरी आँखों में देखा।
फिर उन्होंने बच्ची को गोद में उठाया, एक झोला उठाया, और बोलीं, “चलो।”
रास्ते में हम दोनों चुप थे।
उन्होंने बच्ची को पड़ोस की एक आंटी के यहाँ छोड़ दिया। आंटी ने कोई सवाल नहीं पूछा, बस बच्ची को गोद में ले लिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। गली में ऐसा ही होता है — आधी रात को भी कोई आदमी बच्ची लेकर आए, तो आंटियाँ सवाल नहीं पूछतीं, बस दूध गरम कर देती हैं।
प्रिंसिपल का घर स्कूल के ठीक सामने था, स्कूल की दीवार से सटा हुआ। छोटा-सा मकान, और दरवाज़े पर एक बल्ब जो पीला-पीला जल रहा था।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
देर हुई। फिर अंदर से आवाज़ आई — “कौन?”
“सर, मैं अंकुश हूँ। साइकिल वाला।”
“इतनी रात को?”
“सर,” मैंने कहा, “आपका छात्र चिंटू आज छत से गिरते-गिरते बचा था। मुझे लगता है आपको कुछ देखना चाहिए।”
दरवाज़ा खुला।
प्रिंसिपल सर खड़े थे — चश्मा नहीं, बाल बिखरे, पजामा-कुर्ता। उनके हाथ में एक काग़ज़ था जो वो पढ़ रहे थे, या शायद पढ़ने का नाटक कर रहे थे। उनके पीछे उनकी बीवी खड़ी थीं, और उनकी बेटी — जो उसी स्कूल में सातवीं में पढ़ती थी — दरवाज़े के पीछे से झाँक रही थी।
“अंकुश,” प्रिंसिपल सर ने कहा, “तुम ठीक हो?”
“मैं ठीक हूँ। ये शालिनी मैडम हैं।”
शालिनी मैडम सामने आईं। प्रिंसिपल सर ने उन्हें देखा — और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो उन्होंने आज सुबह स्टाफ के कमरे में रखा था, जब वेद सर चिल्ला रहे थे।
“शालिनी?” उन्होंने कहा। “तुम?”
“सर,” शालिनी मैडम ने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, “मैंने छत की चाबी उस आदमी को दे दी है।”
कुछ पल कुछ नहीं हुआ।
फिर प्रिंसिपल सर ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
“अंदर आओ,” उन्होंने कहा।
प्रिंसिपल सर के घर में एक बड़ी मेज़ थी जिस पर स्कूल के काग़ज़ फैले थे। उनकी बीवी ने चाय बनाई और हम तीनों बैठ गए। उनकी बेटी दरवाज़े के पीछे से झाँकती रही, फिर उन्होंने उसे अंदर जाने को कहा।
शालिनी मैडम ने सब कुछ कह दिया — टेम्पो, सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, पर्ची, बच्ची का इलाज, और पाँच साल पुराना अपना गुनाह।
प्रिंसिपल सर ने सब सुना।
फिर उन्होंने पानी पिया, चश्मा पहना, और कहा, “शालिनी, पाँच साल पहले तुमने जो किया, वो ग़लत था। पर आज तुमने जो किया, वो और भी ग़लत था।”
“जानती हूँ, सर।”
“तुम्हें प्रिंसिपल के पास आना चाहिए था।”
“मैं डरी हुई थी।”
“डर सबको होता है, शालिनी।” प्रिंसिपल सर ने काग़ज़ों के ढेर में से एक हाथ ज़ोर से रखा। “मैं भी डरा हुआ हूँ। आज सुबह से। तुम्हें पता है क्यों? क्योंकि मेरी बेटी इसी स्कूल में पढ़ती है, और अगर स्कूल बंद हो गया, तो सबसे पहले वो कहेगी — पापा, आप प्रिंसिपल थे, फिर भी स्कूल नहीं बचा पाए।”
कमरे में चुप्पी फैल गई।
फिर मैंने कहा, “सर, मुझे एक बात पूछनी है।”
“पूछो।”
“आज सुबह जब वेद सर पर काग़ज़ों का इल्ज़ाम आया, तो आपने बिना सोचे उन्हें दोषी मान लिया। क्यों?”
प्रिंसिपल सर ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ काँपा।
“क्योंकि…” उन्होंने शुरू किया, फिर रुक गए।
“क्योंकि वेद सर आपकी नज़र में कभी भरोसे के लायक नहीं रहे,” मैंने धीरे से कहा। “सर, मैं गली का लड़का हूँ। मुझे काग़ज़ोंमुझे काग़ज़ों से कोई मतलब नहीं, सर। मैं साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे ये पता होता है कि इस गाड़ी का कौन सा पुर्ज़ा घिस गया है, कौन सी चेन ढीली है, कहाँ की आवाज़ आ रही है। और आपकी बात सुनकर मुझे लग रहा है कि वेद सर आपके स्कूल का वो पुर्ज़ा हैं जो बाईस साल से घिस रहा है, और हर बार शक का पेचकस उन्हीं पर लगता है। ऐसा क्यों, सर?
प्रिंसिपल सर ने चाय का कप उठाया, आधा पिया, और रख दिया। उनकी बीवी दरवाज़े के पास खड़ी थीं, हाथ में थाली। उन्होंने थाली मेज़ पर रखी और चुपचाप अंदर चली गईं।
“तुम गली के लड़के हो,” प्रिंसिपल सर ने कहा। “फिर भी तुमने वो देख लिया जो मेरे स्टाफ ने बाईस साल में नहीं देखा।”
“मुझे कुछ नहीं दिखा, सर। मैंने बस एक सवाल पूछा।”
“वही तो।” उन्होंने चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। बिना चश्मे के उनका चेहरा अचानक छोटा लगने लगा, जैसे चश्मा ही उनका आधा चेहरा था। “बाईस साल पहले वेद इस स्कूल में आया था। पतला, लंबा, गाँव से आया हुआ, जेब में सिर्फ़ एक चीज़ थी — उसकी माँ की दी हुई। बात करने में वो उस वक़्त भी ऐसा ही था, कड़वा। मुझे वो पसंद नहीं आया। पर नौकरी मेरे हाथ में नहीं थी।”
उन्होंने रुककर खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर शाम गहरी हो रही थी और गली के नल की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई बर्तन धो रहा हो।
“फिर मेरी माँ बीमार पड़ी। तीन महीने मैं स्कूल नहीं आया। उन तीन महीनों में वेद ने मेरी क्लास भी पढ़ाई, अपनी भी, और स्कूल का हिसाब भी संभाला। जब मैं लौटा, तो चौकीदार ने हँसकर कहा — सर, उन तीन महीने में बच्चे वेद सर को आपसे ज़्यादा बुलाते थे।”
कमरा चुप हो गया।
“बच्चे अच्छा पढ़ाने वाले को नाम से बुलाते हैं, सर,” मैंने कहा।
“मुझे तब ये समझ नहीं आया।” प्रिंसिपल सर ने मेरी तरफ़ देखा। “तुम जानते हो, अंकुश, सबसे ज़्यादा डर किसे लगता है? उस आदमी को जो सोचता है कि वो सबसे ऊपर है। मुझे बाईस साल से यही डर लगता रहा — कि कहीं कोई मुझसे ज़्यादा अच्छा न हो जाए। और मैं इसे कभी किसी को नहीं कह पाया। अपनी बीवी को भी नहीं।”
ये बात उन्होंने बहुत धीरे कही। ऐसे, जैसे छत का कोई टुकड़ा गिरे बिना आवाज़ के गिर गया हो।
“इसीलिए आज सुबह,” मैंने कहा, “जब वेद सर के बैग में काग़ज़ मिले, तो आपने एक पल भी नहीं सोचा।”
“एक पल नहीं।” उन्होंने हामी भरी। “सच कहूँ तो अंदर कहीं एक छोटी सी खुशी भी हुई थी — कि देखा, मैं सही था।” उन्होंने हाथ मेज़ पर रखे। “बाईस साल में एक बार मैं सही निकला। और वो एक बार भी सच नहीं था।”
उस वक़्त शालिनी मैडम ने पहली बार अपनी तरफ़ देखा। वो इस कमरे में बैठी थीं, पर लग रही थीं जैसे किसी और के घर में बैठी हों।
तभी बाहर गेट पर किसी ने हॉर्न दिया। स्कूटर का हॉर्न — छोटा, तेज़, और अपने ही आने की खबर देने वाला।
प्रिंसिपल सर के चेहरे पर जो रंग आया, वो मैं चार दिन में तीसरी बार देख रहा था।
“जाने दो, सर,” मैंने कहा।
“नहीं जा सकता,” उन्होंने कहा और उठ गए।
बाहर गली में बबलू खड़ा था। स्कूटर पर बैठा, हाथ में मोटी फ़ाइल, गले की चेन में लटकता लॉकेट उँगली से घूम रहा था। टिक टिक। मैं दरवाज़े की आड़ में खड़ा रहा, पूरा बाहर नहीं आया।
“सर, देर हो रही है,” बबलू ने मुस्कुराकर कहा। पान का दाग़ उसके होंठ के कोने पर था। “साहब ने कहा था, शाम तक सोचेंगे। सोच लिया?”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno