The Mysterious Bell – Chapter 237
वो गली की तरफ़ भागा, और उसका बस्ता उसकी पीठ पर उछलता रहा। मैंने उसे जाते देखा और सोचा — तेरह साल का लड़का है, और आजकल तेरह साल का लड़का स्कूल की छत की चाबी के बारे में सोच रहा है, जबकि उसे पतंग और बस्ते के बारे में सोचना चाहिए।
फिर मैंने साइकिल मोड़ी और स्कूल के पीछे वाली गली की तरफ़ चल पड़ा।
शालिनी मैडम का घर स्कूल के पीछे, पीपल की दूसरी गली में था। छोटा-सा मकान, नीला दरवाज़ा, और दरवाज़े के बाहर सीमेंट का छोटा प्लेटफ़ॉर्म जिस पर हमेशा चप्पलें पड़ी रहती थीं।
उनके यहाँ बत्ती जल रही थी।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। भीतर से आवाज़ आ रही थी — किसी बच्ची के बुखार वाली धीमी सिसकी, और एक औरत की आवाज़, जो उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी, पर खुद ही काँप रही थी।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
दो बार।
भीतर की आवाज़ रुक गई। कुछ पल चुप्पी। फिर चप्पलों की आवाज़ आई। दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला — सिर्फ़ इतना कि एक आँख बाहर झाँक सके।
“कौन?”
“शालिनी मैडम,” मैंने कहा, “मैं अंकुश हूँ। साइकिल वाला। आज सुबह स्कूल में… उस कमरे में।”
दरवाज़ा और खुला।
शालिनी मैडम खड़ी थीं — आज की साड़ी नहीं, घर वाला पुराना फ्रॉक, बाल ढीले, आँखों के नीचे काले घेरे। उनके हाथ में कोई काम था, पर वो काम रुक गया था। और उनकी गोद में एक छोटी बच्ची थी, जिसका चेहरा लाल था और आँखें आधी बंद।
“मैडम,” मैंने धीरे से कहा, “बच्ची को अंदर लिटा दीजिए।”
उन्होंने मुझे देखा — वो नज़र जो एक माँ तब देती है जब कोई अजनबी मर्द रात को उसके दरवाज़े पर खड़ा हो। फिर उन्होंने बच्ची का माथा देखा, और कुछ सोचा, और अंदर चली गईं।
मैं बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा। मैंने अंदर नहीं झाँका।
कुछ पल बाद वो लौटीं। दरवाज़े पर आकर खड़ी रहीं, हाथ जोड़े हुए, जैसे गुनहगार।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, “तुम स्कूल की छत की बात करने आए हो।”
मैंने सिर हिलाया।
“मैडम,” मैंने कहा, “मैं आपको उस बात के लिए नहीं ज़िम्मेदार ठहराने आया, जो आपने दस साल पहले की। मैं उस चीज़ के लिए आया हूँ जो आपके हाथ में कल शाम तक थी।”
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“चाबी,” उन्होंने धीरे से कहा।
“चाबी।”
वो दरवाज़े के चौखट पर टिक गईं, जैसे अचानक उनके घुटनों ने जवाब दे दिया हो।
“आ जाओ,” उन्होंने कहा। “अंदर।”
उनके घर में दो कमरे थे और छोटी-सी रसोई। दीवार पर एक घड़ी थी जो दो मिनट पीछे चल रही थी। एक कोने में बच्ची की चारपाई थी, बच्ची उस पर लेटी हुई उँगली मुँह में लिए सो रही थी। और उसी चारपाई के पास एक मेज़ थी, जिस पर काग़ज़ों का ढेर था — जाँच के काग़ज़, बच्चों की कॉपियाँ, और एक पुरानी तस्वीर, जिसमें शालिनी मैडम और रमा मैडम साथ खड़ी थीं, दोनों हँस रही थीं।
उस तस्वीर पर से मेरी नज़र हटाई नहीं गई।
शालिनी मैडम ने मेरे लिए कुर्सी खींची और खुद बच्ची की चारपाई के पास बैठ गईं।
“पाँच साल पहले,” उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे, “रमा ने एक बच्चे को अपने घर पर मुफ़्त पढ़ाना शुरू किया था। नौवीं का लड़का था। गरीब घर का। रमा उसे रोज़ शाम को पढ़ाती थी, कॉपियाँ जाँचती थी, किताबें भी खरीदकर दीं।”
वो रुकीं।
“उस लड़के के पिता ने अपनी सारी ज़िंदगी किसी का एहसान नहीं लिया था। उन्हीं के जैसे हमारे घर भी थे। और मुझे…” उनका गला भर आया। “मुझे लगा कि रमा सिर्फ़ अच्छी होने का दिखावा कर रही है। कि वो बच्चों के सामने अपनी अलग छवि बना रही है। कि मैं पीछे छूट रही हूँ।”
“और उस वक़्त स्कूल में प्रमोशन की बात चल रही थी,” मैंने धीरे से कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
“तुम्हें कैसे पता?”
“मैडम,” मैंने कहा, “मैं गली का साइकिल वाला हूँ। कोई भी बात यहाँ चार दिन में नहीं, चार घंटे में पहुँच जाती है। और प्रमोशन की बात दो दिन चली थी। आदमी अपनी बात किसी को बोलता है — ज़रूरी नहीं सच हो, पर बोलता है।”
उन्होंने सिर हिलाया।
“उस वक़्त मुझे लगा कि अगर रमा पर कोई शक उठ जाए, तो प्रमोशन मेरा हो जाएगा।” उन्होंने हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। “उस वक़्त मेरी माँ बीमार थी। अस्पताल का खर्चा था। और मैंने सोचा — बस एक छोटी-सी खबर है। अगर सच निकली तो अच्छा, अगर झूठी निकली तो किसी को क्या फ़र्क़ पड़ेगा।”
मैं चुप रहा।
“खबर छपी,” उन्होंने कहा। “और सच्ची नहीं थी। और उस खबर ने रमा का घर तोड़ दिया। उसका पति चला गया। उसकी बेटी ने स्कूल बदल दिया। और मुझे…” उनका गला फिर भर आया। “मुझे प्रमोशन मिला।”
कमरे में चुप्पी फैल गई।
बच्ची ने नींद में करवट बदली। बाहर गली में कोई साइकिल बजा कर निकल गया।
“और पाँच साल बाद,” मैंने धीरे से कहा, “आपकी बेटी बीमार है, और किसी ने आपसे एक काग़ज़ पर अंगूठा माँगा।”
शालिनी मैडम ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहली बार कुछ और आया — बस, सिर्फ़ डर नहीं, बल्कि थोड़ी राहत भी, कि कोई पूछ रहा है।
“साहब का आदमी आया था,” उन्होंने कहा। “दो दिन पहले। सफ़ेद कुर्ते में। मेरे लिए नहीं, बच्ची के लिए आया था। कहा कि बच्ची के इलाज का पूरा खर्चा वो उठाएगा। किसी अच्छे अस्पताल में दाख़िला करा देगा। बस एक छोटा-सा काम करना है।”
“छत की चाबी,” मैंने कहा।
“उसने कहा कि सिर्फ़ एक रात के लिए। कोई चोरी नहीं, कोई तोड़फोड़ नहीं। कहा कि साहब स्कूल की मरम्मत कराना चाहते हैं, पर बिना नाप-जोख के कुछ नहीं कर सकते। और स्कूल के दफ़्तर में काग़ज़ अटके हुए हैं।”
“और आपने दे दी।”
उन्होंने सिर नीचे कर लिया।
“मैंने दे दी।”
मैं कुर्सी पर पीछे झुक गया और छत की तरफ़ देखा। छत पर पुरानी पंखे की रॉड लटक रही थी, और उस पर धूल जमी थी। मुझे लगा जैसे वो धूल मेरे ऊपर गिर रही है।
“मैडम,” मैंने कहा, “आपने वो चाबी आज शाम किसको दी?”
“उसी आदमी को।”
“कब?”
“आज शाम। छह बजे के करीब। स्कूल के पीछे, टेम्पो के पास।” उन्होंने काँपते हाथों से उठकर मेज़ से एक पर्ची उठाई। “उसने ये दिया था। कहा कि जब स्कूल की मरम्मत हो जाएगी, तो मुझे इसी नंबर पर फोन करके उसके दफ़्तर आना होगा। और मैंने उसकी बात मान ली।”
मैंने पर्ची देखी। उस पर एक फोन नंबर था, और नीचे एक नाम — नाम नहीं, सिर्फ़ शुरुआत — “भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।”
“मैडम,” मैंने धीरे से कहा, “कल सुबह सात बजे, उस छत पर एक बच्चा चढ़ेगा। कोई पतंग उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि किसी को तस्वीर चाहिए। और उस तस्वीर के बाद ये स्कूल सिर्फ़ काग़ज़ पर रहेगा।”
शालिनी मैडम की आँखें फैल गईं।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “नहीं, उसने कहा था कि सिर्फ़ नाप…”
“उस आदमी ने आपसे झूठ बोला, मैडम।” मैंने पर्ची मोड़कर अपनी जेब में रखी। “और मुझे लगता है कि आपको ये भी पता था, इसीलिए ये पर्ची रखी। अगर पूरा भरोसा होता, तो इसे फाड़ देतीं।”
वो चुप रहीं।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, “मैं डरी हुई थी। मैं आज सुबह वेद से लड़कर प्रिंसिपल के पास जाने को तैयार थी। पर शाम को जब वो आदमी टेम्पो से उतरा और उसने मुझे पर्ची दी, तो मुझे लगा कि अगर मैं मुकर गई, तो बच्ची का इलाज रुक जाएगा। और वो मुझे डरा भी रहा था — बोला कि अगर मैंने किसी को बताया, तो स्कूल के काग़ज़ से ज़्यादा मेरी नौकरी का काग़ज़ जल्दी जलेगा।”
“मैडम,” मैंने कहा, “आप मेरे साथ चलिए। अभी।”
“कहाँ?”
“प्रिंसिपल के पास।”
वो सहम गईं।
“अभी? रात को?”
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