The Mysterious Bell – Chapter 236
शाम को मैं दुकान पर लौटा। सूरज डूब रहा था और गली की दीवारें गर्म थीं।
सानिया दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में लाल कवर वाली कॉपी थी।
"उस्ताद!" उसने कहा। "मैंने दबा दिया था। माँ की मोटी किताब के बीच। अब देखिए।"
उसने कॉपी खोली। कतरन अब सपाट थी, चिकनी, जैसे किसी ने उसे इस्त्री कर दिया हो। कोना अलग हो गया था, इसलिए तस्वीर के नीचे का हिस्सा थोड़ा कटा हुआ था, पर अक्षर पढ़े जा रहे थे।
मैंने उसे उठाया और दुकान के बल्ब के नीचे लाया।
तस्वीर में एक लड़की थी। छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, हाथ में माइक, और उस माइक को पकड़ने का ढंग आज भी वैसा ही था — दोनों हाथों से, जैसे डर हो कि छूट न जाए।
मीरा। पाँच साल पहले की मीरा।
उसके ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था — "एक खबर, और एक टीचर का घर बिखरा।"
नीचे छोटे अक्षरों में पाँच-छह लाइनें थीं। मैंने पढ़ा। एक शिक्षिका पर इल्ज़ाम, एक जाँच, एक तबादला, और एक घर जो वो खबर छपने के बाद बचा ही नहीं।
मैंने काग़ज़ को पलटा।
पीछे, हल्की पेंसिल से, किसी ने कुछ लिखा था। स्याही नहीं, पेंसिल। और इतने सालों में वो घिस गई थी, पर आज भी पढ़ी जा सकती थी।
दो शब्द थे।
"शालिनी दीदी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
सानिया ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद? ये कौन है?"
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़कर सीधा किया।
"आज सुबह," मैंने धीरे से कहा, "जिस औरत ने स्कूल के पीछे वाले कमरे में माफ़ी माँगी, उसका नाम शालिनी है।"
टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने उसे रोक दिया।
मैंने घंटी जेब से निकाली और बजाई।
टन्।
"अब बता," मैंने कहा। "मीरा कल रमा मैडम को देखकर चुप क्यों हो गई?"
घंटी ने कहा — "क्योंकि जो खबर छपी थी, वो मीरा ने नहीं लिखी थी।"
मैंने कतरन को मेज़ पर रखा और उसे देर तक देखता रहा।
गली में शाम की आख़िरी आवाज़ें आ रही थीं। कोई बर्तन धो रहा था। कोई बच्चा रो रहा था। कोई बूढ़ा खाँस रहा था।
और मुझे लगा कि आज मैंने जो जोड़ा है, वो सिर्फ़ दो टीचर्स का झगड़ा नहीं था। वो एक ऐसी गाँठ खोल दी थी जिसका दूसरा सिरा अभी बाहर आया है।
मैंने घंटी फिर बजाई।
"एक बात और पूछनी है," मैंने कहा। "शालिनी मैडम को उस कतरन के पीछे क्यों लिखा गया?"
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली —
"क्योंकि उसने ही उस खबर के लिए पहला काग़ज़ दिया था।"
मैं दुकान की कुर्सी पर बैठ गया। सामने पीपल का पेड़ था और उसके नीचे चबूतरी, और चबूतरी पर कुछ बुज़ुर्ग बैठे थे जो अपनी पुरानी बातों में लगे थे।
मैंने सोचा — सुबह मैंने दो लोगों को आमने-सामने बैठाकर उनके दस साल पुराने झगड़े को जोड़ा। और शाम को पता चला कि उसी झगड़े…का बीज कहीं और बोया गया था।
मैंने कतरन को मेज़ पर सीधा रखा। स्याही की छपाई पुरानी थी, किनारे पीले पड़ गए थे, और बीच में एक तस्वीर थी — एक औरत, साड़ी में, सिर झुकाए, चेहरा आधा छिपा। तस्वीर के नीचे उसका नाम नहीं था, सिर्फ़ एक शब्द लिखा था — “आरोपी।”
पर मुझे मीरा की तस्वीर नहीं दिख रही थी। मुझे वो पेंसिल के दो शब्द दिख रहे थे जो कोई पीछे से लिख गया था।
शालिनी दीदी।
मैंने घंटी फिर बजाई। टन्। धातु की आवाज़ दुकान के अंधेरे में छोटी-सी फैली और कमरे के कोने में चली गई।
“जब शालिनी मैडम ने काग़ज़ दिया,” मैंने कहा, “तब उनके दिल में क्या था?”
घंटी ने कहा —
“वही, जो आज वेद सर के दिल में था।”
मेरी उँगलियाँ मेज़ पर रुक गईं।
आज सुबह स्टाफ के कमरे में वेद सर चिल्ला रहे थे। उनकी आवाज़ काँप रही थी, हाथ काँप रहे थे, और उस आदमी की आँखों में डर के साथ-साथ एक और चीज़ थी, जिसे मैं उस वक़्त नाम नहीं दे पाया था।
जलन।
वो जलन जो आदमी को रात में नींद नहीं लेने देती। वो जलन जो उसके हाथ को किसी और की मेज़ तक खींच लाती है।
“मतलब,” मैंने धीरे से कहा, “शालिनी मैडम को लगा था कि रमा मैडम उनसे आगे निकल रही हैं।”
“हाँ।”
“और उसी जलन में उन्होंने किसी को काग़ज़ दे दिया। बिना सोचे, बिना जाँचे।”
घंटी चुप हो गई।
मैं पीछे की तरफ़ झुक गया और कुर्सी की एक टाँग फ़र्श पर टिकाकर उसे हिलाने लगा। यही आदत मेरे पापा को पसंद नहीं थी। वो कहते थे — जो कुर्सी हिलती है, उस पर बैठे आदमी का फ़ैसला भी हिलता है।
आज मैं हिल रहा था।
क्योंकि सुबह मैंने सोचा था कि मैंने वेद सर और शालिनी मैडम का झगड़ा जोड़ दिया, और चीज़ ख़त्म। पर चीज़ें क़तई ख़त्म नहीं हुई थीं। वो झगड़ा सिर्फ़ एक परत थी। उसके नीचे एक और परत थी, और उसके नीचे एक और। और उस सबसे नीचे वाली परत पर बैठा था वो आदमी — जो ऊपर वाले का नाम नहीं जानता था, पर उसकी उँगली में काली अंगूठी थी।
मैंने घंटी उठाई और उसे हथेली पर रख लिया।
“छत की चाबी किसके पास है?” मैंने पूछा।
घंटी ने कहा —
“पहले वो पूरा कर, जो अधूरा है।”
“क्या?”
“शालिनी का सच।”
मैंने घंटी को देर तक देखा।
फिर मैं उठा, दुकान का शटर आधा गिराया — पूरा नहीं, आधा, ताकि अगर कोई आए तो लगे कि बंद है, और अगर कोई बुलाए तो मैं सुन सकूँ — और मैं पीछे वाले कमरे से अपनी साइकिल निकाली।
साइकिल पुरानी थी, टायर में हवा कम थी, और चेन चलने पर ऐसी आवाज़ करती थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो। पर वो मेरी थी, और मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी।
उससे पहले कि मैं पैडल मारता, मैंने टिंकू को गली के मोड़ पर खड़ा देखा। वो अकेला था — चारों नहीं। उसके हाथ में एक काग़ज़ का टुकड़ा था, जो वो उँगलियों में मरोड़ रहा था।
“उस्ताद,” वो भागकर आया। “मैंने चारों को घर भेज दिया। उनकी माँ डाँट रही थीं।”
“ठीक किया।”
“पर सानिया ने कहा — वो रात को खिड़की से देखेगी। कह रही थी, स्कूल के पीछे से टेम्पो फिर आ सकता है।”
मैंने साइकिल रोक दी।
“टेम्पो?”
“हाँ। आज सुबह सानिया ने वही टेम्पो देखा था, जिसमें से सीढ़ी निकली थी। कह रही थी, टेम्पो पर धूल की मोटी परत थी, जैसे वो कहीं दूर से आया हो। और पीछे की तरफ़ एक बोरा भी था, जो उतारा नहीं गया।”
“बोरा उतारा नहीं गया, पर सीढ़ी अंदर गई,” मैंने धीरे से कहा।
“मतलब वो सीढ़ी कहीं और से लाई गई थी। स्कूल की नहीं थी।” टिंकू ने काग़ज़ का टुकड़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये सानिया ने दिया। कहा — उस्ताद को देना।”
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर सानिया की लिखाई थी — गोल, टेढ़ी-मेढ़ी, जैसे किसी ने बहुत जल्दी में लिखा हो।
“आज सुबह सात बजे, स्कूल के पीछे, टेम्पो। दो आदमी। सीढ़ी। एक आदमी के हाथ में चाबी जैसी चीज़ — पीतल जैसी रंग। बड़ी।”
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
“टिंकू,” मैंने कहा, “तू घर जा। खा-पीकर सो जा। कल सुबह छह बजे मेरे पास आ।”
“और चाबी?”
“चाबी मुझे मिल गई कहाँ है, ये पता चल गया,” मैंने कहा। “बस अब ये पता करना है कि वो किसे दे दी गई है।”
टिंकू ने साइकिल का हैंडल पकड़ लिया।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मैं भी चलूँगा।”
“नहीं।”
“पर मैं…”
“टिंकू,” मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा, “मैं जिसके पास जा रहा हूँ, वहाँ बात बड़ी है और लोग डरे हुए हैं। डरे हुए आदमी के सामने भीड़ नहीं, एक चेहरा चाहिए। समझा?”
वो चुप हो गया। फिर उसने सिर हिलाया।
“कल सुबह छह बजे,” उसने कहा। “पक्का।”
“पक्का।”
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