The Mysterious Bell – Chapter 232
मैंने जेब से घंटी निकाली और बहुत हल्के से बजाई, इतने हल्के से कि आवाज़ दीवार से टकराकर लौट आए।
टन्।
“बता,” मैंने कहा। “ये नया ताला किसने लगाया?”
घंटी ने कहा, “जिस दरवाज़े की चाबी सबके पास हो, वो दरवाज़ा किसी का नहीं होता।”
“और अब?”
“अब इस दरवाज़े पर अपना ताला लगा। जो काटेगा, वो पकड़ा जाएगा।”
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
मेरे औज़ारों के ट्रंक में एक पुराना ताला रखा था — वही जो पहले मेरी दुकान के शटर पर लगा था। मैं उसे सुबह से ही जेब में डालकर लाया था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि आज रात कुछ तो बदलेगा।
मैंने वो ताला नए ताले के नीचे लगाया, कुंडे में डाला और बंद कर दिया। चाबी निकालकर गले की उसी पुरानी चाबी के छल्ले में फँसा दी, जो पापा ने पंद्रह साल पहले मुझे दी थी।
अब छत के दरवाज़े पर तीन ताले थे। एक टूटा, एक बाहर वाले का, और एक मेरा।
टिंकू ने धीरे से कहा, “उस्ताद, अब कल सुबह कोई छत पर नहीं चढ़ पाएगा।”
“नहीं चढ़ पाएगा तो काटेगा,” मैंने कहा। “और काटेगा तो हमें पता चल जाएगा कि किसके हाथ में औज़ार है।”
हम लौट रहे थे कि पीछे कुछ गिरा। मैं रुका। टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। फिर आवाज़ आई — म्याऊँ — और एक पतला बिल्ली का बच्चा दीवार से कूदकर गली में भाग गया।
टिंकू ने लंबी साँस छोड़ी। “उस्ताद, मुझे लगा कोई आ गया।”
“आया होगा तो हम भी कुछ लेकर जाते,” मैंने कहा। “मेरे पास ताला है, चाबी है, और तेरे पास ज़ुबान है। काफ़ी है।”
वो हँसा, पर हँसी आधी रह गई, क्योंकि दूर मुहाने पर बल्ब के नीचे से एक सफ़ेद गाड़ी गुज़री और गली के मोड़ पर रुक गई। रोशनी बंद थी। गाड़ी वहीं खड़ी रही। कोई उतरा नहीं।
हम दोनों दीवार की छाया में चले और दुकान तक बिना आवाज़ किए पहुँचे।
सुबह सात बजे मेरी दुकान पर पाँच जोड़ी चप्पलें थीं। टिंकू, सानिया, चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़। पाँचों ऐसे बैठे थे जैसे किसी मैच से पहले टीम बैठती है — घुटने पर हाथ, आँखें मुझ पर।
शबनम आपा ने बाहर से पाँच गिलास चाय भेज दी थी, बिना पूछे। थाली पर एक पर्ची भी थी, जिस पर उनकी आड़ी-तिरछी लिखाई में लिखा था — चीनी कम है, दिमाग़ ज़्यादा लगाओ।
“सुनो,” मैंने कहा। “आज सुबह सात बजे स्कूल की छत से पतंग उड़ेगी। पर वो पतंग उड़ाने वाला बच्चा कोई बाहर का नहीं होगा। उसे अंदर से कोई भेजेगा। किसी के कहने पर कोई छत पर चढ़ेगा, और उस वक़्त किसी और के हाथ में कैमरा होगा।”
सानिया ने तुरंत कहा, “तो फिर तस्वीर स्कूल की नहीं, हमारी आएगी।”
मैंने उसे देखा। ये लड़की कभी-कभी मुझसे भी आगे निकल जाती है।
“हाँ,” मैंने कहा। “तस्वीर में ये आएगा कि टूटी छत पर बच्चे चढ़ रहे हैं और स्कूल वाले चुप हैं। फिर स्कूल बंद, फिर ज़मीन खाली, फिर साहब की इमारत।”
“तो हम क्या करें?” रफ़ीक़ ने पूछा।
“तीन काम,” मैंने कहा और उँगलियाँ गिनाईं। “एक, आज सुबह स्कूल के दोनों गेटों पर नज़र। जो आदमी सीढ़ी, बोरा या कैमरा लेकर आए, उसकी शक्ल, जूते और गाड़ी का नंबर याद रखना। दो, छत के दरवाज़े के नीचे जो भी हो, उसे छूना मत। तीन, जो भी स्कूल के अंदर से बाहर जाए, उसका चेहरा देखना।”
“और अगर कोई चढ़ ही गया छत पर?” चिंटू ने पूछा।
“नहीं चढ़ेगा,” मैंने कहा। “मैंने रात में दरवाज़े पर अपना ताला लगा दिया है।”
पाँचों ने एक साथ मुँह खोला, फिर एक साथ हँसे। गुड्डू ने कहा, “उस्ताद, आप चोर हो या मिस्त्री?”
“दोनों,” मैंने कहा। “मिस्त्री इसलिए कि टूटा जोड़ता हूँ, और चोर इसलिए कि कभी-कभी जोड़ने के लिए चुपके से जाना पड़ता है।”
साढ़े आठ बजे मैं स्कूल पहुँचा।
सुबह का स्कूल मेरे लिए हमेशा अजीब जगह रहा है। मैं यहाँ आठवीं तक पढ़ा था और दो बार गणित में फेल भी हुआ था। तब मुझे लगता था कि स्कूल वो जगह है जहाँ सवाल पूछे जाते हैं और जवाब गलत होते हैं। अब लगता है कि स्कूल वो जगह है जहाँ इंसान पहली बार सीखता है कि झूठ बोलकर भी पास हो सकते हैं।
आँगन के कोने में, नीम के नीचे, रमा मैडम बच्चों को पढ़ा रही थीं। उनके हाथ में चॉक थी और ज़मीन पर एक पुराना स्लेट रखा था, जिस पर उन्होंने बड़े अक्षरों में एक वाक्य लिखा था — जो बोले, वो सुने।
“ये किसने लिखा?” उन्होंने पूछा।
“मैडम, आपने,” एक बच्ची ने कहा।
“हाँ। पर इसका मतलब क्या है?”
कोई नहीं बोला।
रमा मैडम ने स्लेट उठाया और दिखाया। “मतलब ये कि जो आदमी बोलता है, उसे सुनने की हिम्मत भी रखनी पड़ती है। बोलकर भाग जाना आसान होता है। बोलकर खड़े रहना मुश्किल।”
मैं दरवाज़े पर खड़ा सुन रहा था और मुझे लगा कि ये लाइन आज मेरे लिए ही लिखी गई है।
रमा मैडम ने मुझे देखा और मुस्कुराईं।
“आ जाओ, मिस्त्री जी। तुम्हारी घंटी की आवाज़ सुबह-सुबह आँगन तक आती है। मुझे लगता है तुम हमारे स्कूल को बिना फ़ीस दिए सुबह की घंटी दे रहे हो।”
“मैडम, मेरी घंटी बजती नहीं, बोलती है,” मैंने कहा। “और बोलने वालों से आप ही निपट सकती हैं।”
वो हँसीं। उनकी हँसी में वो थकान थी जो सालों से जमा है, पर उसमें गर्मी भी थी।
तभी प्रिंसिपल आँगन में आए। उनके हाथ में एक फ़ाइल थी और फ़ाइल के ऊपर कुछ काग़ज़। उनका चेहरा सुबह से ही बुझा हुआ था।
“रमा,” उन्होंने कहा। “ज़रा स्टोर खोलिए। कल रात किसी ने स्टोर की खिड़की का काँच खटखटाया है।”
हम सब स्टोर की तरफ़ चले। रमा मैडम ने उन्हें रोका।
“रुकिए,” उन्होंने कहा। “पहले ये बताइए — कल रात स्टोर में कौन था?”
प्रिंसिपल रुक गए। “मतलब?”
“मतलब ये कि स्टोर की चाबी आपके पास है, मेरे पास नहीं। और स्टोर में परीक्षा के काग़ज़ों के बीच कल ये क्या था?”
उन्होंने फ़ाइल से तीन काग़ज़ निकाले और सामने रख दिए। तीन पीले काग़ज़ — वही स्कूल बंद करने वाला नोटिस। एक नहीं, तीन।
“ये काग़ज़ परीक्षा के बंडल के अंदर से निकले हैं,” रमा मैडम ने कहा। “तीन नक़लें। एक दरवाज़े के नीचे मिला था, और तीन स्टोर में। किसी ने इन्हें जानबूझकर परीक्षा काग़ज़ों के साथ रखा। ताकि जो भी बंडल खोले, वो पहले ये पढ़े।”
आँगन में सन्नाटा हो गया। बच्चों ने मुँह बंद कर लिए।
प्रिंसिपल ने काग़ज़ देखे और उनका चेहरा बदल गया।
“तुम मुझ पर शक कर रही हो?” उन्होंने धीरे से कहा।
“मैं सवाल कर रही हूँ।”
“पैंतीस साल, रमा। पैंतीस साल से मैं इस स्कूल में हूँ। छत से प्लास्टर मेरे सिर पर गिरा है, बेंच मेरे पैरों के नीचे टूटी है, और तुम मुझसे पूछ रही हो कि स्टोर में कौन था?”
“मैं वही पूछ रही हूँ जो कल पूरे आँगन ने पूछा था,” रमा मैडम ने कहा। “कि स्कूल बंद करने का काग़ज़ किसके पास से निकला?”
मैंने बीच में कदम रखा। मुझे नहीं पता कि मुझे हक़ था या नहीं, पर मैंने कहा, “मैडम, और सर — ज़रा पीछे वाले कमरे में चलिए। यहाँ बच्चे सुन रहे हैं और सुनने वाले बच्चे कल अपने घर में बताएँगे। जो बात स्कूल में रह सकती है, उसे गली में मत भेजिए।”
प्रिंसिपल ने मुझे देखा। पहली बार उन्होंने मुझे वैसे देखा जैसे कोई चीज़ माँग रहे हों। फिर वो मुड़े और पीछे वाले कमरे की तरफ़ चल दिए।
वो कमरा पुराने नक़्शों वाला था। दीवार पर टँगे काग़ज़ पीले पड़ चुके थे, बोर्ड पर एक बड़ा-सा नक़्शा टँगा था जिसमें स्कूल की इमारत, आँगन और पीछे की ज़मीन बनी थी। मैंने दो कुर्सियाँ खींचकर आमने-सामने रखीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno