The Mysterious Bell – Chapter 231
वो चला, पर इस बार उसने अपने आदमियों को साथ चलने का इशारा नहीं किया। वो दोनों उसके पीछे-पीछे चले, और लाठी वाले ने जाते वक़्त गेट की जाली को इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि वो खुलकर फिर बंद हो गई।
आँगन में सन्नाटा रह गया।
प्रिंसिपल सर ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने वो पीला काग़ज़ अपनी जेब से निकाला, उसे देखा, और उसे तह करके दराज़ में रख दिया। दराज़ की चाबी उन्होंने धोती की गाँठ से निकाली थी, और चाबी भी काँप रही थी।
“सर,” मैंने कहा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मुझे शाम तक सोचने का वक़्त चाहिए।”
“सर —”
“मैंने पैंतीस साल में कभी किसी काग़ज़ पर बिना पढ़े अंगूठा नहीं लगाया,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। “आज भी नहीं लगाऊँगा। पर मेरी बेटी इसी स्कूल में पढ़ती है। मुझे शाम तक सोचने दो।”
रमा मैडम ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गईं। और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे आज तक याद रहेगा।
“सोचने का वक़्त लीजिए, सर,” उन्होंने कहा। “पर अंगूठा आपका है। वो कोई उधार नहीं दे सकता।”
बच्चे नीम के नीचे बैठ गए, जैसे किसी ने कह दिया हो कि अब छुट्टी है, पर कोई घर नहीं गया।
सानिया ने फटे काग़ज़ के टुकड़े अपनी कॉपी के बीच रख लिए। चिंटू ने पूछा, “ये क्यों रख रही है?” और सानिया ने कहा, “जोड़ूँगी।”
मीरा ने मेरा हाथ पकड़कर धीरे से कहा, “अंकुश, मुझे लगता है साहब आज नहीं आएँगे।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी खुद आता है, वो पहले अपने बंदे को नहीं भेजता दो बार।”
मैंने उसकी बात सोची। और मुझे लगा वो सही कह रही है। साहब खुद नहीं आएगा। साहब के पास और लोग हैं। और उन लोगों के पास और तरीके हैं।
मैं टिंकू के साथ गेट की तरफ़ बढ़ा।
और गेट के बाहर, उस पुराने नीम के नीचे, मुझे बबलू दिखा।
वो स्कूटर पर बैठा नहीं था। वो खड़ा था, और उसने अपना मुँह नीम के तने की तरफ़ किया था, जैसे पान थूकने जा रहा हो। पर वो थूका नहीं। उसने जेब से फ़ोन निकाला — और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि गली से आने-जाने वाला कोई भी उसे सुन नहीं सकता था।
मैं गेट के पीछे, जाली से चिपककर रुक गया।
“हाँ साहब,” बबलू ने कहा। “सुन रहा हूँ।”
कुछ पल वो सुनता रहा। फिर बोला —
“नहीं साहब, मना नहीं किया। अंगूठे से साफ़ इनकार नहीं किया। बोले, शाम तक सोचेंगे।”
फिर वो हँसा — छोटी, सूखी हँसी।
“पर साहब, इन्होंने एक काम कर दिया। बच्चों को सामने ला दिया। पूरा आँगन बच्चों से भरा था। माइक नहीं, नारा नहीं, बस बच्चे। और एक लड़की ने अपने नाम वाला काग़ज़ ऊपर उठा दिया।”
मेरी छाती में कुछ ठंडा हुआ।
“हाँ साहब,” बबलू ने कहा। “अब बच्चों वाला रास्ता लेना पड़ेगा।”
वो रुका। उसने अपना लॉकेट उँगली से घुमाया — टिक टिक।
“कल सुबह स्कूल की छत से जो पतंग उड़ेगी,” उसने धीरे से कहा, “वो साहब की नींद उड़ा देगी।”
फ़ोन कटा।
बबलू ने फ़ोन जेब में रखा, पान थूका, और स्कूटर पर बैठकर चला गया।
और मैं गेट की जाली पकड़कर खड़ा रहा।
मेरे हाथ ठंडे थे। मुझे लगा जाली का लोहा मेरी हथेली में चिपक गया है।
छत कल सुबह से बंद है। ये प्रिंसिपल ने पूरे आँगन में ऐलान कर दिया है। कल कोई बच्चा छत पर चढ़ेगा ही कैसे?
और अगर चढ़ेगा — तो किसके कहने पर?
पतंग उड़ाने के लिए छत पर चढ़ता है कौन? बच्चा।
और अगर कल सुबह स्कूल की छत से पतंग उड़ी, तो सबसे पहला सवाल क्या होगा?
सवाल ये नहीं होगा कि पतंग किसने उड़ाई।
सवाल ये होगा — कि उस टूटी छत पर बच्चे कैसे चढ़े? किसने चढ़ने दिया? कौन ज़िम्मेदार है?
और उस सवाल का जवाब किसी और का नहीं, उस स्कूल का होगा जिसने बच्चों को खतरनाक छत पर जाने दिया। और फिर उस स्कूल को बंद करने के लिए किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं रहेगी। एक तस्वीर काफ़ी होगी।
मैंने घंटी जेब से निकाली और बजाई।
टन्।
“बता,” मैंने कहा। “पतंग किसकी है?”
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली।
“धागा किसके हाथ में है, वो देख।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
टिंकू गेट के अंदर खड़ा था, बस्ता कंधे पर, आँखें मुझ पर। और उसके पीछे सानिया, चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़ — चारों, जैसे किसी ने उन्हें एक ही धागे से बाँध दिया हो।
और मुझे तब एहसास हुआ कि साहब ने जो कहा — वो गलत नहीं था। साहब सच में बच्चों वाला रास्ता ले रहा था।
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि उस रास्ते पर चलने वाले बच्चे वो नहीं थे जो आज आँगन में खड़े थे।
उस रास्ते पर किसी और को भेजा जाएगा। किसी ऐसे को जो कल सुबह सात बजे उस छत पर चढ़ जाएगा, पतंग हाथ में लेकर — और उस पल कैमरा किसी और के हाथ में होगा।
“उस्ताद,” टिंकू ने कहा। “क्या हुआ? आपका चेहरा ऐसा क्यों है?”
मैंने घंटी मुट्ठी में बंद कर ली।
“टिंकू,” मैंने कहा। “कल सुबह सात बजे तक तुझे उन चारों को लेकर मेरी दुकान पर होना है। और उससे पहले — आज रात, हमें ये पता करना है कि स्कूल की छत की चाबी किसके पास है।”
टिंकू ने बस्ता कसकर पकड़ा।
“और अगर चाबी किसी के पास नहीं है?”
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। शाम होने में देर थी, पर मुझे लगा जैसे सूरज जल्दी बूढ़ा हो गया है।
“तो फिर हमें वो पतंग ज़मीन पर ही रोकनी पड़ेगी,” मैंने कहा। “उड़ने से पहले।”
॥
रात के ग्यारह बज चुके थे और स्कूल की गली में सिर्फ़ एक बल्ब जल रहा था। दूर, मुहाने पर, जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठकर आँखें मल रहा हो।
मैं और टिंकू स्कूल की पीछे वाली दीवार से चिपके खड़े थे। दीवार पर पुरानी घास उगी थी और उस घास में नमी थी, जैसे दीवार खुद पसीना पोंछ रही हो।
लोहे की सीढ़ी वहीं टिकी थी। उसकी ऊपर की सीढ़ियाँ ज़ंग खाकर पतली हो गई थीं, और नीचे की चौथी सीढ़ी के पास वो ताज़ा गड्ढा अब भी खुला पड़ा था। मैंने उसमें पैर रखा तो मिट्टी नरम थी। इतनी नरम कि लगा किसी ने अभी-अभी उसे उलट-पुलट कर छोड़ा है।
टिंकू ने फुसफुसाया, “उस्ताद, अगर पकड़े गए तो?”
“तो कहेंगे कि छत का हाल देखने आए थे,” मैंने कहा। “जो चीज़ टूट रही हो, उसे देखने वाला चोर नहीं होता, टिंकू। गवाह होता है।”
उसने गर्दन हिलाई। अंधेरे में उसकी आँखें दो छोटे बल्बों जैसी चमक रही थीं।
मैंने सीढ़ी पकड़ी और दो कदम चढ़ा। सीढ़ी बोली — कड़क — और मैं ठिठक गया। फिर मैंने ऊपर देखा।
छत के लोहे के दरवाज़े पर दो ताले लगे थे।
एक पुराना, जो नीचे लटक रहा था। उसका कुंडा बीच से कटा हुआ था और टूटी कलाई की तरह झूल रहा था। और ठीक उसके ऊपर एक नया ताला — चमकदार, काला, बिना ज़ंग, जैसे किसी ने अभी दुकान से निकालकर लगाया हो।
मैंने उँगली नए ताले पर रखी। तेल की महक आई। वो महक जो नई चीज़ों के साथ आती है और पुराने काम छिपा देती है।
“देखा?” मैंने कहा।
टिंकू ने ऊपर देखा और उसका मुँह खुला रह गया।
“उस्ताद, पुराना ताला कटा है और नया लगा है। मतलब?”
“मतलब ये कि बाहर वाला छत का ताला अपने आप नहीं बदल सकता,” मैंने कहा। “ताला वही बदलता है जिसके पास चाबी हो। या जिसे अंदर से कोई चाबी दे दे।”
“तो किसी ने अंदर से चाबी दी होगी?”
मैंने पीछे मुड़कर पूरा स्कूल देखा। खाली कमरे, बंद खिड़कियाँ, आँगन में पड़ी टूटी बेंच, और नीम का पेड़, जो रात में इतना बड़ा लग रहा था कि लगा स्कूल को अपनी छाया में छिपा रहा हो।
“या किसी ने चाबी किसी और के हाथ में देखी और चुप रह गया,” मैंने धीरे से कहा।
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