The Mysterious Bell – Chapter 233
“बैठिए,” मैंने कहा। “और एक शर्त। आज यहाँ जो बोलेगा, वो काग़ज़ बचाने के लिए नहीं बोलेगा। अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए भी नहीं बोलेगा। सिर्फ़ सच बोलेगा।”
प्रिंसिपल बैठ गए। रमा मैडम भी।
पहले कुछ देर चुप्पी रही।
फिर प्रिंसिपल ने कहा, “रमा, तुम सही हो। स्टोर में मैं था।”
रमा मैडम का हाथ कुर्सी के हत्थे पर कस गया।
“दो महीने पहले,” प्रिंसिपल ने कहा, “छत की मरम्मत का अंदाज़ा आया था। एक लाख अस्सी हज़ार। स्कूल के पास इतना नहीं था, और मैंने सोचा कि किसी से मदद माँगूँ। मैं भारद्वाज भवन गया था।”
मैंने पूछा, “किससे मिलने?”
“साहब से नहीं,” उन्होंने कहा। “उसके दफ़्तर में एक मुनीम था। मैंने उसे स्कूल का पूरा ब्यौरा दिया। ज़मीन का नक़्शा, इमारत का ब्यौरा, छत का अंदाज़ा। मैंने सोचा कि अगर कोई मदद कर सकता है तो वही करेगा। और मैंने वो फ़ाइल वहीं छोड़ दी।”
“छोड़ दी?” रमा मैडम ने कहा। “आपने अपने स्कूल के काग़ज़ उनके दफ़्तर में छोड़ दिए?”
“छोड़ दिए,” उन्होंने कहा। “मैं लौटा तो लगा कि कुछ छूट गया है। पर मैं वापस नहीं गया, रमा। क्योंकि वो फ़ाइल माँगने का मतलब था ये कबूल करना कि मैंने अपने स्कूल का हाल किसी बाहर वाले को बता दिया।”
कमरे में हवा भारी हो गई।
“इसीलिए,” रमा मैडम ने धीरे से कहा, “उनके पास हमारे स्कूल का नक़्शा है। इसीलिए उन्हें पता है कि छत कहाँ से कमज़ोर है। और मैं तुम पर शक कर रही थी।”
प्रिंसिपल ने अपना चश्मा उतारा और माथा रगड़ा।
“और मैंने स्टोर में वो नोटिस रखे,” उन्होंने कहा। “क्योंकि मुझे लगा कि अगर सबको पता चल जाए कि स्कूल बंद होने वाला है, तो शायद लोग जागेंगे। मैंने सोचा, जब स्टोर खुलेगा और मास्टर लोग काग़ज़ निकालेंगे, तो नोटिस मिलेगा और बात आगे बढ़ेगी। मैं डर गया था, रमा। डर के मारे मैंने ये किया।”
अब रमा मैडम की बारी थी।
वो चुप बैठी रहीं। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ बच्चे नीम के नीचे बैठे थे और एक लड़का स्लेट को बार-बार उठा-उठाकर देख रहा था।
“मुझे माफ़ करो,” उन्होंने कहा। “दो महीने पहले, जब साहब का आदमी पहली बार स्कूल आया था, मैंने तुमसे कहा था कि अंगूठा लगा दो। मैंने कहा था, इमारत बचेगी तो नाम भी बचेगा।”
मैंने देखा, प्रिंसिपल की आँखें भर आईं।
“तुमने कहा था,” उन्होंने कहा।
“मैंने कहा था,” रमा मैडम ने कहा। “क्योंकि मेरा अपना घर टूट चुका था। मुझे लगा कि लड़ने से सिर्फ़ नुकसान होता है। मुझे लगा कि जो टूट रहा है, उसे बचाने के लिए झुक जाना चाहिए। और फिर जब बच्चों ने आँगन में नाम वाला काग़ज़ उठाया, तो मैंने सबसे ऊँची आवाज़ में कहा कि अंगूठा उधार नहीं होता।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“देखा, मिस्त्री जी? जो आदमी सबसे तेज़ बोलता है, वो कभी-कभी सबसे देर से टूटा होता है।”
मेरे हाथ में घंटी थी। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया, बिना बजाए। और तभी वो अपने आप बजी।
टन्।
मैंने कहा, “मैडम, सर। दोनों ने सच बोला है। अब एक काम कीजिए। एक-दूसरे से वो बात कहिए जो अब तक सिर्फ़ अंदर रखी थी। पैंतीस साल की बात।”
प्रिंसिपल ने हाथ बढ़ाया। “रमा, तुम मुझ पर शक कर रही थीं तो इसलिए नहीं कि तुम ग़लत थीं, बल्कि इसलिए कि मैंने तुम्हें सच बताने लायक़ नहीं समझा। यही मेरी ग़लती थी। माफ़ करो।”
रमा मैडम ने उनका हाथ थामा। “और मैंने तुम्हारी रीढ़ की जगह काग़ज़ देखा। माफ़ करो।”
घंटी फिर बजी — टन्।
और मेरे कान में आवाज़ आई। इस बार पहले से ज़्यादा साफ़, जैसे किसी ने आवाज़ के सामने से कोई कपड़ा हटा दिया हो।
“बीस। अब एक सौ अड़सठ।”
मैंने होंठ अंदर से काटे। मैंने पहली बार महसूस किया कि जब बड़ा रिश्ता जुड़ता है, तो आवाज़ सिर्फ़ बड़ी नहीं होती, साफ़ भी होती है। जैसे कोई रेडियो स्टेशन धीरे-धीरे पकड़ में आता हो।
और इस बार घंटी ने खुद एक बात जोड़ी, जो उसने पहले कभी नहीं कही थी।
“मैं अकेला नहीं था।”
मैंने जल्दी से पूछा, “क्या कहा?”
“कुछ नहीं।”
“अरे, तू आधा वाक्य बोलकर चुप क्यों हो जाता है?”
“क्योंकि तेरे पास अभी उस वाक्य को सुनने के कान नहीं हैं,” घंटी ने कहा और चुप हो गई।
मैं कमरे से बाहर निकला तो सामने आँगन में मीरा खड़ी थी।
कैमरा उसके हाथ में था, बैग कंधे पर, और वो स्कूल के गेट से अंदर तीन कदम आई थी। मैंने उसे देखा और मुझे लगा कि वो किसी से मिलने आई थी।
फिर उसकी नज़र नीम के नीचे गई, जहाँ रमा मैडम बच्चों के बीच खड़ी थीं, चॉक हाथ में, साड़ी का पल्लू कंधे पर।
मीरा वहीं रुक गई।
मैंने उसे आवाज़ दी, “मीरा।”
वो मुड़ी भी नहीं।
उसका चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने अंदर से कोई बत्ती बंद कर दी हो। वो तीन कदम पीछे हटी, फिर सीधी मुड़कर गेट से बाहर चली गई। कैमरा उसके हाथ में झूल रहा था और मुझे लगा कि वो उसे गिरा देगी।
मैं उसके पीछे भागा।
स्कूल की गली में वो तेज़ चल रही थी, जैसे कोई उसके पीछे आ रहा हो।
“मीरा, रुक!”
वो एक दीवार के पास रुकी। साँस ले रही थी, पर लग रहा था कि साँस बाहर जा रही है और अंदर कुछ नहीं आ रहा।
“उसने मुझे पहचाना नहीं,” उसने कहा।
“क्या?”
“रमा मैडम ने मुझे देखा और पहचाना नहीं,” उसने कहा। “मैं पाँच साल से उस औरत के बारे में सोच-सोचकर जल रही हूँ। मैंने सुना था उसका घर टूट गया, उसका आदमी चला गया, उसकी बेटी ने स्कूल बदल लिया। और आज वो मेरे सामने से ऐसे गुज़र गईं जैसे मैं हवा हूँ।”
वो दीवार पर हाथ रखकर झुक गई।
“मतलब मैंने जिस चीज़ की सज़ा पाँच साल झेली, वो शायद मैंने ही अपने अंदर बनाई थी।”
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।
“मीरा,” मैंने धीरे से कहा। “अगर उन्होंने तुझे पहचाना नहीं, तो उनका घर किसने तोड़ा?”
वो उठी। उसकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ साफ़।
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा। “मुझे लगता था कि मैं जानती हूँ। अब लगता है कि मैंने अपनी खबर की सिर्फ़ तस्वीर देखी थी, उसका नीचे वाला हिस्सा कभी पढ़ा ही नहीं।”
मैंने उसे वहीं छोड़ा और स्कूल लौटा, क्योंकि सामने स्कूटर की आवाज़ आई थी।
बबलू पांडे आँगन में आया। उसके पीछे दो आदमी थे और उसके हाथ में एक मोटा मुड़ा हुआ काग़ज़। उसने बच्चों को देखकर पहले मुस्कुराया और फिर सीधा प्रिंसिपल की तरफ़ बढ़ा।
“सर,” उसने कहा, “आपने शाम तक सोचने को कहा था। साहब ने सोच लिया।”
उसने काग़ज़ खोला। “ये ज़मीन का काग़ज़ है। इसमें साफ़ लिखा है कि स्कूल की पिछली ज़मीन पर नई इमारत आएगी। छत को खाली करने की तारीख़ आ गई है। दो दिन बाद सुबह सात बजे मशीन आएगी। उससे पहले स्कूल की छत खाली होनी चाहिए।”
रमा मैडम आगे आईं। “मशीन क्या गिराएगी?”
“जो टूटा है, वो,” बबलू ने कहा। “और जो बचेगा, उसे मशीन ही बता देगी कि टूटा हुआ था।”
फिर उसने ऊपर देखा। छत के दरवाज़े की तरफ़।
“सर, छत का ताला किसने बदल दिया?”
मैं आगे आया। “मैंने।”
बबलू ने मुझे देखा। उसने काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रखा।
“अंकुश, तुम्हारा ताला स्कूल के दरवाज़े पर क्यों है?”
“क्योंकि दरवाज़े पर लगा ताला किसी का नहीं था,” मैंने कहा। “तुम्हारे आदमी ने पुराना ताला काटकर नया लगाया, और किसी से नहीं पूछा। मैंने भी नया लगाया, और सबसे पूछ लिया। तुम्हारे पास चाबी है? दिखाओ, मैं खोल दूँगा।”
बबलू का जबड़ा कसा। उसने मेरे गले में चाबी देखी।
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