The Mysterious Bell – Chapter 227
वो हँसी। एक छोटी सी हँसी, जिसमें मज़ाक नहीं था, सिर्फ़ थकान।
"तू हर बात को मरम्मत में बदल देता है।"
"मेरा काम ही वही है।"
"नहीं," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। "कुछ चीज़ें तेरी मरम्मत के बाहर हैं। हर टूटी चीज़ के पीछे तेरा हाथ नहीं होता। और हर टूटी चीज़ को तेरे हाथ की ज़रूरत भी नहीं होती।"
ये सुनकर मेरे अंदर कुछ हिला।
क्योंकि यही बात मैं खुद से डरकर छिपाता हूँ। जबसे मुझे ये घंटी मिली है, मुझे लगने लगा है कि हर टूटी चीज़ मेरी दुकान पर आनी चाहिए। हर दरार मेरे हाथ से जुड़नी चाहिए। मैंने अब तक सोलह रिश्ते जोड़े हैं। सोलह। और हर बार मुझे लगा कि मैंने एक पहाड़ उठा लिया। पर सच ये है कि हर बार एक और पहाड़ दिख गया। तेरे सामने भी ऐसा है न? तुम सोचते होगे कि सोलह जोड़े, अब तो कोई कमाल हो जाना चाहिए। भाई, कमाल नहीं होता। काम बढ़ता है। बस इतना होता है कि हाथ मज़बूत होते जाते हैं।
"मैं ये नहीं कह रहा कि सब कुछ मेरा काम है," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि जब कोई आदमी अपने ही शहर में, अपने ही स्कूल में, उस औरत से भागता है जिसका घर उसने बिखेरा था — तो वो भागना नहीं है, मीरा। वो बस उसी दरवाज़े तक पहुँचने की कोशिश है, जो पाँच साल से बंद है।"
उसकी आँखें भर आईं।
पर वो रोई नहीं।
"मैं उसके घर पहुँच गई थी," उसने कहा। "दो बार।"
"मुझे पता है।"
"दरवाज़ा नहीं खुला।"
"मुझे पता है।"
"और आज जब मैंने उन्हें देखा —" उसने रुककर साँस ली — "तो मैं कुछ कह ही नहीं पाई। मेरी ज़ुबान, जो बबलू के सामने चलती है, जो रणवीर के सामने चलती है, वो रमा मैडम के सामने बंद हो गई। मुझे नहीं पता क्यों।"
"क्योंकि बबलू और रणवीर तुमसे डरते हैं," मैंने कहा। "रमा मैडम तुमसे नहीं डरतीं। और जिससे कोई नहीं डरता, उसके सामने अपनी बात कहना सबसे मुश्किल होता है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर।
"तू ये सब कहाँ से लाता है?"
"गली से," मैंने कंधे उचकाए। "यहाँ लोग रोज़ एक-दूसरे से ऐसी बातें कहते हैं जो किताबों में नहीं लिखी होतीं। मैं बस सुन लेता हूँ।"
वो पुल के किनारे बैठ गई। पत्थर गरम था, उसने साड़ी का पल्लू नीचे बिछा लिया। मैं भी बैठ गया, थोड़ी दूर।
तभी जेब में घंटी हिली।
न हल्की, न धीमी। बस इतनी कि मुझे पता चल जाए कि वो जाग रही है।
मैंने जेब पर हाथ रखा। वो चुप हो गई।
"अब सुन," मैंने कहा। "मैं तुझे मजबूर नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि मरम्मत के लिए सच ज़रूरी होता है। बिना सच के जोड़ लगाओ, तो वो टिकता नहीं। मैंने ऐसे जोड़ देखे हैं। ऊपर से ठीक, अंदर से खोखले। छह महीने में फिर टूट जाते हैं, और तब दोगुना नुकसान होता है।"
मीरा ने घुटनों पर हाथ रखे।
"और कुछ सच ऐसे होते हैं," उसने धीरे से कहा, "जो खोदने से और टूटते हैं। तू उस दिन वहाँ नहीं था, अंकुश। जिस दिन वो खबर छपी थी। मैंने एक लाइन लिखी थी — एक लाइन — और उस लाइन में सच का आधा हिस्सा था। आधा। मुझे लगा था, आधा सच भी सच होता है। अब पता चला कि आधा सच सबसे बड़ा झूठ होता है। क्योंकि उसमें इतना सच रहता है कि लोग उसे मान लें, और इतना कम कि वो किसी को बचा न सके।"
गली में कोई साइकिल गुज़री। घंटी नहीं बजी। बस टायर की हवा की आवाज़।
"मैंने उनके घर की तस्वीर नहीं खींची थी," उसने कहा। "पर मैंने उनका नाम लिया। और नाम लेने का मतलब होता है — तुमने किसी को नंगा कर दिया, बिना छुआ।"
मैं कुछ देर चुप बैठा।
मैंने कहना चाहा — पर तूने सच कहा था न। सच कहने में गलती नहीं होती। पर मैं चुप रहा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि ये बात सच है और ये बात बेकार भी है। जब कोई रो रहा हो, तो उसे ये नहीं बताते कि उसका आँसू गणित में सही है। तुम समझ रहे हो न मैं क्या कह रहा हूँ? इंसान के दर्द का हिसाब किताब से नहीं होता। हिसाब सिर्फ़ दुकान में होता है, और वहाँ भी माँ कभी-कभी गलती कर देती हैं।
"मैं तुझे माफ़ी माँगने को नहीं कह रहा," मैंने आख़िर में कहा। "मैं तुझे सच बोलने को कह रहा हूँ। माफ़ी तो वो चीज़ है जो सामने वाला देता है। सच वो चीज़ है जो तू खुद अपने अंदर से निकालता है। बाकी सब बाद में।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तूने कभी किसी से माफ़ी माँगी है?"
"मैंने अपने पापा से नहीं माँगी," मैंने कहा। "पाँच साल तक नहीं माँगी। और जिस दिन माँगी, उस दिन पता चला कि माफ़ी माँगने में जो डर लगता है, वो असल में अपनी ही हार का डर होता है। सामने वाले का नहीं।"
वो कुछ देर चुप रही।
फिर उसने अपना बैग उठाया।
"मुझे शाम तक तैयार होना है," उसने कहा। "सभा में बोलना है।"
"तू बोलेगी?"
"बोलूँगी," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो काँप नहीं था। "पर एक बात पहले साफ़ कर ले — मैं रमा मैडम के बारे में जो बोलूँगी, वो सच होगा। सिर्फ़ सच। एक लाइन भी ज़्यादा नहीं। मैं फिर से किसी की ज़िंदगी का आधा हिस्सा नहीं छापूँगी।"
"यही तो चाहिए," मैंने कहा।
वो उठी। फिर रुकी।
"और अंकुश —"
"हाँ?"
"तू ये मत समझना कि तेरी घंटी सब जोड़ सकती है। मैं तुझे बुरा नहीं कह रही। पर डर लगता है कभी-कभी। तू सब ठीक करने निकलता है, और अगर कभी कोई चीज़ ठीक न हुई, तो तू उसे अपनी हार मान लेगा। और तब तू खुद टूट जाएगा।"
मुझे क्या कहना था, पता नहीं। मैंने मज़ाक किया।
"मैं तो पहले से टूटा हुआ हूँ, मीरा। मैं तो उसी हाल में ठीक हूँ।"
वो नहीं हँसी।
वो चली गई, और मैं पुल पर अकेला बैठा रह गया, और दोपहर की धूप मेरे सिर पर पत्थर की तरह बैठी रही।
जेब में घंटी ठंडी थी।
मैंने उसे निकाला। हथेली पर रखा। वो चुप थी।
"कुछ कहना है?" मैंने पूछा।
कुछ देर बाद आवाज़ आई। धीमी।
"अभी नहीं।"
"कब?"
"जब वो खुद दरवाज़ा खोलेगी।"
"मतलब मैं कुछ नहीं करूँ?"
घंटी ने कहा, "तू साथ खड़ा रह।"
बस इतना। फिर चुप।
मैंने उसे वापस जेब में रखा और सोचा — साथ खड़ा रहना। ये सबसे आसान काम लगता है, और सबसे मुश्किल होता है। क्योंकि साथ खड़े रहने में तुम्हारे हाथ खाली रहते हैं, और खाली हाथ खड़ा आदमी हर वक़्त सोचता है कि काश वो कुछ कर पाता।
मैं दुकान लौटा।
दोपहर में दुकान पर कोई नहीं आता। मैंने पंचर वाले टब में हाथ धोए, और पीछे वाले कमरे में चारपाई पर बैठ गया। काजल का मैसेज आया था — माँ की दवा कल दोपहर के बाद नहीं चलेगी, और फार्मेसी वाले ने साफ़ कह दिया है कि जब तक काग़ज़ पर मुहर नहीं लगती, नई खेप नहीं आएगी।
मैंने काजल को लिखा — माँ को पानी वक़्त पर पिलाना, और खुद कुछ खा लेना। तूने आज सुबह से कुछ नहीं खाया।
उसने जवाब दिया — तू भी।
मैं हँसा। हम दोनों भाई-बहन एक ही जगह अटके हैं। हम एक-दूसरे को खाने को कहते हैं, और दोनों भूखे रह जाते हैं।
मैंने चारपाई पर लेटकर आँखें बंद कीं।
तभी बाहर से पैरों की आवाज़ आई। चार जोड़ी पैर। इनकी चाल मुझे पहचानी हुई है — एक जोड़ी तेज़, एक लंगड़ी, एक भारी, और एक जो हर वक़्त किसी और से आगे निकलना चाहती है।
मैं उठ बैठा।
"उस्ताद!"
चिंटू पहले घुसा। उसके माथे पर पसीना था और घुटने पर बँधी पट्टी ढीली हो रही थी। उसके पीछे सानिया, फिर गुड्डू, और आख़िर में रफ़ीक़ — जो हाँफ रहा था, जैसे उसे भी पता न हो कि वो क्यों भागा।
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