The Mysterious Bell – Chapter 226
मैंने दोनों की तरफ़ देखा। वो अब भी बैठे थे। और अब उनके बीच मेज़ पर वो काग़ज़ नहीं था — क्योंकि कोई काग़ज़ था ही नहीं। सिर्फ़ एक बंद कमरा, दो कुर्सियाँ, और दो आदमी जो अब एक-दूसरे से आँख मिला सकते थे।
मैंने दरवाज़ा खोला।
दरवाज़े के बाहर, दीवार से टिककर, रमा मैडम खड़ी थीं।
मुझे देखकर उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनका चेहरा पढ़ना मुश्किल था — आदत से ज़्यादा थकान थी उस पर।
"मैडम," मैंने धीरे से कहा। "आप सुन रही थीं?"
"हाँ," उन्होंने कहा। कोई शर्म नहीं थी उनकी आवाज़ में।
"अंदर आ जाइए।"
वो अंदर आईं। दोनों उठ खड़े हुए — वेद सर अचानक से, कुर्सी पीछे खिसक गई।
"बैठो," रमा मैडम ने कहा। "मैं कुछ कहने नहीं आई।"
वो खड़ी रहीं और कमरे को देखा।
"मैं बस ये कहने आई हूँ कि इस स्कूल को दीवार नहीं चाहिए।"
दोनों ने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरे पास छत है," उन्होंने कहा। "टूटी हुई है, पर है। और अगर छत नहीं रहेगी, तो भी मैं बाहर नीम के नीचे बैठा दूँगी, क्योंकि बच्चे पढ़ेंगे।" उनकी आवाज़ धीमी थी और साफ़। "पर इस स्कूल को जो चाहिए, वो ऐसे लोग हैं जो टूटे रिश्ते जोड़ सकें। क्योंकि बच्चे किताब से ज़्यादा इसी चीज़ से सीखते हैं।"
उन्होंने दोनों की तरफ़ देखा।
"तुम दोनों ने आज वो किया जो मैं पच्चीस साल में नहीं कर पाई," उन्होंने कहा। "मुझे तुम दोनों पर शर्म आ रही है।"
वेद सर हँसे — एक छोटी सी हँसी, जो गले में अटक गई।
तभी बाहर से आवाज़ आई। साइकिल की घंटी नहीं — किसी और की आवाज़। गेट के पास।
मैं खिड़की तक गया।
स्कूल के गेट पर मीरा खड़ी थी। एक हाथ में कैमरा, दूसरे में उसका फटा बैग। तिपाई उसके कंधे पर टँगी थी। उसने सुबह की धूप में आँखें सिकोड़ रखी थीं, और वो स्कूल के आँगन में झाँक रही थी — जैसे किसी को ढूँढ रही हो।
उसने रमा मैडम को देखा।
मैंने खिड़की से देखा कि उसका चेहरा कैसे बदला। रंग उतर गया। जैसे किसी ने उस पर पानी डाल दिया। उसका हाथ कैमरे पर कस गया, फिर ढीला पड़ गया।
वो रमा मैडम को देखे जा रही थी, और रमा मैडम उसे।
दो सेकंड। तीन। पाँच।
और फिर मीरा पलटी।
बिना एक शब्द कहे। बिना इशारे किए। वो बिना कुछ कहे पलट गई और तेज़ कदमों से चली गई — इतनी तेज़ी से कि उसका बैग उसके कूल्हे से टकराकर हिल रहा था। कैमरा उसके हाथ में उलटा हो गया, टाँग खुल गई, पर उसने रोका नहीं। वो सीधी गली की तरफ़ बढ़ गई और स्कूल की दीवार के पीछे गायब हो गई।
रमा मैडम कुछ नहीं बोलीं।
उन्होंने बस अपना हाथ दरवाज़े के फ़्रेम पर रखा, और उनकी उँगलियाँ वहाँ कुछ देर टिकी रहीं।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, बिना किसी से खास तौर पर कहे, "वो लड़की पाँच साल से मेरे दरवाज़े के बाहर खड़ी है।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "और वो जानती है। बस हम दोनों में से कोई दरवाज़ा खोलने वाला नहीं है।"
मैं खिड़की से हटा।
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी।
मैंने उसे बाहर निकाला और हथेली पर रखा। वो चुप थी।
"कुछ नहीं कहना?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर आवाज़ आई, हल्की, जैसे किसी ने साँस लेकर छोड़ी हो।
"तूने आज एक रिश्ता जोड़ा।"
"हाँ।"
"अब अगला।"
"कौन सा?"
घंटी ने कहा, "वो जो अभी गली में भाग रहा है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और देखा — रमा मैडम अब भी दरवाज़े के फ़्रेम पर हाथ रखे खड़ी थीं, और बाहर नीम के नीचे बच्चों की कॉपियाँ खुली पड़ी थीं, और हवा उनके पन्ने उलट रही थी।
शाम चार बजे की सभा अभी दूर थी।
पर मीरा गली की तरफ़ भाग रही थी, और मुझे पता था कि वो भागकर कहीं नहीं जा रही — वो बस उसी पुराने दरवाज़े तक जा रही है जो पाँच साल से बंद है।
और इस बार मुझे उसके पीछे नहीं, उसके आगे जाना था।
क्योंकि घंटी ने कहा था — अब अगला।
मैं दरवाज़े से बाहर निकला। सीढ़ियों से उतरते वक़्त मुझे अपनी कलाई में वो चोट फिर महसूस हुई जो छत का प्लास्टर गिरने वाले दिन लगी थी। अब भी हरी थी। मैंने उसे सहलाया और सोचा — आज एक और चीज़ टूटने वाली थी, शाम चार बजे। वो टल गई।
पर हर चीज़ नहीं टलती।
पीछे से वेद सर की आवाज़ आई — वो शालिनी मैडम से कह रहे थे कि चलो, बच्चों को बताते हैं कि आज से दोनों की क्लास एक साथ होगी।
मैं मुस्कुराया।
और स्कूल के गेट से बाहर निकलकर गली की तरफ़ चल दिया — मीरा को ढूँढने।
॥
मैं स्कूल के गेट से निकला और सीधा गली की तरफ़ भागा।
दोपहर होने को आई थी। धूप सीधी सिर पर थी और गली की नाली से भाप उठ रही थी, जैसे ज़मीन खुद पसीना पोंछ रही हो। पीपल की छाया दोपहर में छोटी हो जाती है, बस उतनी ही जितनी एक आदमी के बैठने को काफ़ी हो। चबूतरी खाली थी। बुज़ुर्ग दोपहर में घरों में चले जाते हैं, सिर्फ़ एक कोना बचा रह जाता है जहाँ हवा थोड़ी ठंडी रहती है।
मीरा गली के मोड़ पर, पत्थर के पुल के पास रुकी थी।
पुल कहना बड़ी बात है। नाली पर पुराने पत्थर की दो पट्टियाँ पड़ी हैं, बस इतना ही। उसी पर वो खड़ी थी, एक हाथ पत्थर की छत पर, और सामने पड़ी उसकी तिपाई ज़मीन पर औंधी पड़ी थी, जैसे गिर गई हो। कैमरा उसके हाथ में था, और वो उसे ऐसे पकड़े थी जैसे कोई बच्चा खोई हुई चीज़ पकड़ता है — न छोड़ पा रही थी, न सँभाल पा रही थी।
मैं पास गया।
"मीरा।"
वो नहीं हिली।
"मीरा।"
"क्या?"
उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे गले से नहीं, किसी पुराने डिब्बे के ढक्कन से निकली हो।
"तुम वहाँ से ऐसे भागी," मैंने कहा, "जैसे रमा मैडम नहीं, कोई पुराना भूत देख लिया हो। जो लोग भूत देखकर भागते हैं, वो पीछे मुड़कर नहीं देखते। तुमने तीन बार मुड़कर देखा।"
वो पत्थर पर से हाथ उठाकर अपनी कलाई देखने लगी। वहाँ कुछ नहीं था। फिर भी वो देखती रही।
"मैं नहीं भागी," उसने कहा। "मेरा काम था। मुझे… मुझे दूसरी खबर पर जाना था।"
"कौन सी खबर?"
"वो… वो जो मैं लेने जा रही थी।"
"इस वक़्त गली में कोई खबर चल रही है क्या? सब दोपहर की रोटी पर हैं।"
वो चुप हो गई।
मैंने उसकी तिपाई उठाई, टाँगें खोलीं, और पुल के किनारे टिका दी। फिर अपनी जेब से रूमाल निकाला। वो फटा था, पर साफ़ था। माँ कहती है कि आदमी के पास दो चीज़ें हमेशा साफ़ रहनी चाहिए — रूमाल और ज़ुबान। मेरी ज़ुबान तो भई, कभी-कभी धूल खा जाती है। पर रूमाल मैं ठीक रखता हूँ।
मैंने वो रूमाल उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने नहीं लिया।
"मुझे रोना नहीं है," उसने कहा।
"मैंने रोने को नहीं कहा। कैमरा पोंछ लो। उस पर धूल है।"
उसने कैमरा देखा। फिर रूमाल लिया, और बहुत धीरे, बहुत सँभालकर उसकी लेंस पोंछी। उसके हाथ काँप रहे थे। काँपते हाथ से लेंस पोंछना — मुझे मालूम है, वो कितना मुश्किल है। जब मैं गुस्से में होता हूँ न, तो छोटी सी चीज़ भी ठीक नहीं कर पाता। हाथ काम नहीं करते। हाथ सिर्फ़ उस वक़्त काम करते हैं जब दिल थोड़ा ठंडा हो।
"तुमने उन्हें देखा," मैंने कहा। "और तुमने कुछ नहीं कहा।"
"मैंने कहना चाहा।"
"तो क्यों नहीं कहा?"
उसने कैमरा बैग में रखा। ज़िप खींची। फिर ज़िप फिर खोली, फिर बंद की। ये आदत उसे कब पड़ी, मुझे नहीं पता। पर जब भी वो कुछ छिपाना चाहती है, वो अपने बैग की ज़िप से खेलने लगती है।
"अंकुश," उसने कहा। "तू मुझे कुछ ज़्यादा ही आसान समझता है।"
"मैं तुझे आसान नहीं समझता। मैं तुझे तेज़ समझता हूँ। और तेज़ लोग ही सबसे ज़्यादा भागते हैं जब उनके अंदर कुछ टूटता है।"
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