The Mysterious Bell – Chapter 223
"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये स्कूल जब बनेगा — अगर बनेगा — तो उसकी मिट्टी में एक चीज़ मिली होगी, और वो सीमेंट नहीं होगी।"
"क्या होगी?"
"आज की शाम। ये बातचीत। यही उसकी नींव होगी।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैं नाम नहीं दे पाया। कोई खुशी नहीं थी, कोई जीत नहीं थी। बस एक अजीब सी शांति।
तभी रमा मैडम ने मेरी जेब की तरफ़ देखा — जैसे उन्हें कुछ सुनाई दे रहा हो।
और मैंने भी महसूस किया।
घंटी अंदर से गरम थी। जैसे किसी ने उसे कोयले पर रख दिया हो।
मेरे कान में आवाज़ आई। बहुत धीमी, पर इस बार शब्द साफ़ थे — जैसे पहले बार किसी दरवाज़े ने अपनी आवाज़ ऊँची की हो।
"सुन रहा है?"
"हाँ," मैंने फुसफुसाया।
"अब साफ़ सुनाई देता है। जब रिश्ते जुड़ते हैं, मेरी जुबान भी साफ़ होती है।"
मैंने हाथ जेब में डालकर घंटी को छुआ। "बीस अंक?"
"बीस।" वो रुकी। "अब तुम्हारे पास एक सौ अठहत्तर हैं।"
मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने कुछ पूछना चाहा, पर घंटी पहले बोल पड़ी।
"आज तुमने जो किया, वो आसान नहीं था। उन दोनों ने आज अपनी हार किसी और को नहीं, खुद को सौंपी। यही सच्ची मरम्मत है।"
"तू क्यों बता रही है ये सब? तू तो कभी इस तरह पूरी बात नहीं कहती।"
"क्योंकि आज पहली बार मुझे लगा कि तुम जान गए हो कि मेरी असली ताक़त तुम्हारे हाथों में नहीं, तुम्हारी जुबान में है।"
मैं चुप हो गया।
और घंटी भी चुप हो गई, जैसे अपनी बात कहकर संतुष्ट हो।
…
शाम सात बजे मैं स्कूल के गेट से निकला। आसमान में धूल भरी लालिमा थी, और गली की लाइटें एक-एक करके जल रही थीं। साइकिल गली के मुँह पर चाय की गुमटी से धुआँ उठ रहा था।
मैंने साइकिल की तरफ़ नहीं देखा। सीधा चल पड़ा। मेरे सामने एक ही चीज़ थी — मीरा का चेहरा, जो रमा मैडम को देखकर सफ़ेद पड़ गया था।
वो मुझे छोड़कर चली गई थी। बिना एक शब्द कहे।
मुझे पता था वो क्यों गई।
मीरा उन सवालों से नहीं भाग रही थी जो कोई उससे पूछता था। वो उस सवाल से भाग रही थी जो वो खुद से पूछती थी, हर रात, पाँच साल से।
मैं उसके घर की तरफ़ बढ़ा। उसका घर दूसरी गली में था, स्कूल के पीछे वाली गली में, एक पुराने मकान की दूसरी मंज़िल पर। मैं एक बार गया था, उस दिन जब वो स्कूल की छत वाली खबर लेने आई थी।
उसके दरवाज़े पर पहुँचा तो सीढ़ियों की लाइट जल रही थी। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर से टीवी की आवाज़ आ रही थी — नहीं, टीवी नहीं, कुछ और। किसी पुराने वीडियो की आवाज़, जो बार-बार रिप्ले हो रही थी।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर आवाज़ बंद हो गई।
"कौन?"
"मैं, मीरा। अंकुश।"
कुछ देर चुप्पी। फिर दरवाज़ा खुला।
वो खिड़की के पास बैठी थी, लैपटॉप सामने खुला, और उसकी आँखें सूजी हुई थीं। कमरे में एक चारपाई, एक छोटी मेज़, कैमरा तिपाई पर, और दीवार पर लगे कुछ काग़ज़ — पुरानी खबरों की कतरनें।
उसने मेरी तरफ़ देखा और पहले कुछ नहीं बोली। फिर बोली, "तुम यहाँ क्यों आए?"
"तू मुझे छोड़कर चली गई थी। बिना बताए।"
"मुझे कुछ बताना नहीं था।"
"मीरा।"
"अंकुश, मैं थक गई हूँ।" उसने लैपटॉप बंद किया। "तुम जो कहने आए हो, मुझे पता है। तुम कहोगे — मीरा, वो तुमसे नाराज़ नहीं है। तुम कहोगे — मीरा, तू उससे बात कर। तुम कहोगे — मीरा, पाँच साल हो गए, अब भूल जा।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "और मैं तुमसे कहती हूँ — मैं भूल नहीं सकती।"
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मैंने चारपाई पर बैठने की जगह नहीं माँगी। मैंने कुछ नहीं कहा।
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर मैंने कहा, "मैं तुझसे ये नहीं कहने आया कि भूल जा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं ये कहने आया हूँ कि रमा मैडम तुझसे नफ़रत नहीं करतीं।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"उन्होंने खुद कहा।"
"कब?"
"आज। जब तू चली गई। वो दरवाज़े पर खड़ी थीं, और उन्होंने मुझसे कहा — मैं पाँच साल से जानती हूँ कि वो कौन है।"
मीरा का चेहरा फिर सफ़ेद पड़ गया।
"और उन्होंने ये भी कहा," मैंने कहा, "कि उनकी नाराज़गी तुझसे नहीं, उस आधे सच से है जो तेरी खबर में था।"
मीरा ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। उसके कंधे हिलने लगे। मैंने उसे रोते देखा था, पर इस तरह नहीं। ये रोना नहीं था, ये कुछ और था — जैसे कोई बाँध टूट रहा हो, और उसके पीछे पानी नहीं, पाँच साल का दबा हुआ धुआँ निकल रहा हो।
मैं चुप खड़ा रहा। मैंने उसके कंधे पर हाथ नहीं रखा। कभी-कभी हाथ रखना भी ग़लत होता है। कभी-कभी बस साथ खड़ा रहना काफ़ी होता है।
कुछ मिनट बाद उसने हाथ नीचे किए। आँखें लाल थीं, और नाक बह रही थी। उसने अपनी आस्तीन से पोंछा।
"मैं उस दिन घर से निकली थी," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी, धीमी, जैसे बहुत अंदर से आ रही हो। "मेरे पास सिर्फ़ एक काग़ज़ था। एक टीचर का काग़ज़, जिस पर कुछ लिखा था। मैंने उसे पढ़ा, और मुझे लगा कि ये खबर है। मैंने उसे छाप दिया।" वो रुकी। "उस काग़ज़ पर ये नहीं लिखा था कि वो टीचर क्यों… वो रकम किसके लिए थी। वो रकम उसकी बेटी के इलाज के लिए थी। और मैंने उसे… मैंने उसे…" उसकी आवाज़ गले में अटक गई।
"चोरी लिख दिया," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ।" उसने आँखें बंद कर लीं। "मैंने चोरी लिख दिया। पूरा सच जाने बग़ैर।"
"और फिर?"
"और फिर रमा मै"और फिर रमा मैडम ने…" मीरा की आवाज़ फिर अटकी। उसने गला साफ़ किया। "उन्होंने फोन किया। मेरे एडिटर से। मुझसे नहीं। मुझसे इसलिए नहीं कि उन्हें लगा मैं वो आदमी नहीं हूँ जो सुनेगा।"
उसने घुटनों पर हाथ रखे, जैसे बैठे-बैठे कोई बोझ उतार रही हो।
"मैंने अगले दिन सुधार छापने की कोशिश की। एक हफ़्ते तक लड़ी। फिर एक दिन मेरी मेज़ पर एक लिफ़ाफ़ा आया। बिना नाम, बिना मोहर। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर रणवीर भारद्वाज के दो कामों की तारीख़ें लिखी थीं। उस वक़्त मैं बाईस साल की थी और मुझे लगा कि मेरे हाथ बड़ी खबर लगी है।"
"फिर?"
"फिर मैं उस लिफ़ाफ़े वाले रास्ते पर चली गई। दो दिन तक पीछे गई। और जो देखा…" वो रुकी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "मैंने देखा कि उस आदमी के पास कितने लोग हैं। कितने फ़ोन। कितने नंबर। और सबसे ऊपर एक आदमी जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं था।"
"तो तुम रुक गईं।"
"मैं रुक गई।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और उस रात मैंने अपनी खबर मिटा दी। मैंने अपना ईमेल खाली किया, अपना चैनल बंद किया, और तीन महीने किसी से नहीं बोली। मेरी माँ समझी कि मुझे कुछ हो गया है।"
"और रमा मैडम?"
"रमा मैडम का घर उसी हफ़्ते बिखर गया। उनके पति ने कहा कि वो ऐसे घर में नहीं रहेंगे जहाँ मोहल्ला उँगली उठाए। उनकी बेटी ने स्कूल बदल लिया। और मैं…" उसने हाथ फैलाए, फिर गिरा दिए। "मैं उनके दरवाज़े तक गई, दो बार। दोनों बार दरवाज़ा बंद था। तीसरी बार मैंने सोचा, अब नहीं जाऊँगी। और ये सोचकर पाँच साल निकल गए।"
वो चुप हो गई।
मैं कुछ देर बैठा रहा। कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर गली में कहीं कोई बर्तन गिरा, और कोई हँसा।
"तुमने उनसे माफ़ी माँगी?" मैंने पूछा।
"माँगी। उस दिन दरवाज़े पर खड़े होकर, दो बार।" उसने कहा। "पर उस वक़्त मैं माफ़ी नहीं माँग रही थी। मैं बस अपना बोझ हल्का कर रही थी। फ़र्क़ है दोनों में।"
मैंने सिर हिलाया।
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