The Mysterious Bell – Chapter 222
“एक सौ अड़तालीस में बीस जुड़े,” तंत्र ने कहा। “अब एक सौ अड़सठ।”
“तूने पहले इतना साफ़ क्यों नहीं बोला?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।
“क्योंकि पहले तुमने कभी इतना गहरा जोड़ नहीं जोड़ा।”
मैं चुप हो गया।
“और अंकुश,” तंत्र ने कहा, “ये झगड़ा तेरे कारण नहीं जुड़ा। ये इसलिए जुड़ा कि दोनों ने अपनी असली कहानी कही। तू तो बस दरवाज़ा था।”
“मैं दरवाज़ा बनकर खुश हूँ,” मैंने धीरे से कहा।
आवाज़ चली गई। घंटी ठंडी पड़ गई।
मैंने वेद सर और शालिनी मैडम की तरफ़ देखा। दोनों अब एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देख रहे थे, नीचे देख रहे थे। पर उनके बीच का वो हाथ भर का फ़ासला अब फ़ासला नहीं लग रहा था।
तभी दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई।
“अच्छा किया।”
हम सब चौंके। दरवाज़े पर रमा मैडम खड़ी थीं। नीम की छाया उनके चेहरे पर थी, और हाथ में कॉपियों का बंडल था। उनकी आँखें भीगी थीं, पर वो हँस रही थीं।
“मैं दो मिनट से खड़ी हूँ,” उन्होंने कहा। “मुझे नहीं पता था, ये दोनों इतना सँभालकर रखे हुए थे।”
शालिनी मैडम ने मुँह उठाया और फिर नीचे कर लिया।
रमा मैडम अंदर आईं, बेंच के पास बैठ गईं, और बहुत देर तक दोनों को देखती रहीं।
“इस स्कूल को,” उन्होंने धीमे से कहा, “दीवार नहीं चाहिए।”
वेद सर ने सिर उठाया।
“मैंने सोचा था, छत ठीक हो गई तो सब ठीक हो जाएगा। पर नहीं। इस स्कूल को ऐसे लोग चाहिए जो टूटे रिश्ते जोड़ सकें। ऐसे लोग जो” — उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — “एक कमरे में दो कुर्सियाँ रख सकें।”
“मैडम,” मैंने कहा, “आपकी छत भी जुड़ेगी। रोक नहीं सकते, पर देर हो सकती है।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी कॉपियों को सीने से लगाया।
फिर मैंने अपनी जेब से पेचकस निकाला और उस टूटी बेंच के पास गया। मैंने नीचे झुककर उसकी ढीली टाँग देखी। चार पेच में से दो मुड़े हुए थे और एक बोल्ट ही गायब था।
मैंने अपने ट्रंक से एक पुराना बोल्ट निकाला, जो हमेशा जेब में रखता हूँ। फिर दोनों पेच सीधे किए।
“ये तुम यहाँ क्यों कर रहे हो?” शालिनी मैडम ने पूछा।
“क्योंकि ये बेंच हमने खुद तोड़ी है, मैडम। छत साहब गिरा रहा है।”
मैंने आख़िरी पेच कसा और बेंच ज़मीन पर सीधी रखी। मैंने उसे हथेली से दबाया। वो नहीं हिली।
“देखा?” मैंने कहा। “सिर्फ़ एक बोल्ट। बस एक।”
वेद सर ने देखा। उनके चेहरे पर कुछ बदला।
तभी बाहर से जूतों की आवाज़ आई। तेज़, जल्दबाज़, जानी-पहचानी।
मैं खिड़की के पास गया।
स्कूल के गेट पर मीरा खड़ी थी। कंधे तक कटे बाल, फटा बैग, हाथ में तिपाई पर लगा उसका कैमरा। उसने कैमरा ठीक किया और कमरे की तरफ़ मोड़ा।
उसकी नज़र रमा मैडम पर पड़ी।
मैंने मीरा को देखा और मुझे लगा मेरी आँखें धोखा खा रही हैं।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। एकदम सफ़ेद, जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून खींच लिया हो।
उसने कैमरा नीचे किया। उसके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली।
“मीरा?” मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसकी नज़र रमा मैडम पर जमी रही। और रमा मैडम भी उसकी तरफ़ देख रही थीं — बिना गुस्से, बिना नफ़रत, बस जैसे कोई पुराना काग़ज़ अचानक खुल गया हो।
दो सेकंड। तीन सेकंड। बस इतना ही।
फिर मीरा पलटी। बिना एक शब्द कहे। न मेरी तरफ़ देखा, न कुछ पूछा। अपना कैमरा उठाया और तेज़ क़दमों से गली की तरफ़ चली गई, जैसे उसके पीछे कुछ जल रहा हो।
मैं खिड़की से चिपक गया।
“मीरा!”
उसने पीछे नहीं देखा। उसकी आकृति गली के मोड़ पर पीली दीवार के साथ घुल गई।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
रमा मैडम वहीं बैठी थीं। बेंच पकड़े हुए। उनकी कॉपियाँ गोद में थीं और उनका एक हाथ काँप रहा था।
“मैडम,” मैंने धीरे से कहा। “वो मीरा है। बस्ती की आवाज़ चलाती है।”
“मैं जानती हूँ,” उन्होंने कहा।
“आप जानती हैं?”
“मैं पाँच साल से जानती हूँ।”
उन्होंने कॉपियों को सीने से लगाया, जैसे ठंड लग रही हो।
“उसने एक खबर छापी थी,” रमा मैडम ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ भी नहीं था — न गुस्सा, न शिकायत, सिर्फ़ थकान। “आधी खबर। मेरे बारे में।”
मेरे पैर जैसे ज़मीन पर जम गए।
“आधी खबर,” मैंने दोहराया।
“उस वक़्त वो नई थी। मुझे लगता है, उसने लिखा तो ठीक ही होगा, ये मान लिया। पर वो जो लिखा था, वो पूरा नहीं था। और घर टूटने के लिए आधा सच काफ़ी होता है।”
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। वो जेब में चुप पड़ी थी।
“मैडम,” मैंने कहा, “आज रात मैं उससे बात करूँगा।”
“करना,” उन्होंने कहा, और उठ गईं।
फिर वो दरवाज़े तक गईं, और दरवाज़े पर रुककर बिना पलटे बोलीं, “अंकुश, तुमने आज इन दोनों की बात जोड़ी। बहुत अच्छा किया। पर जल्दी करो। क्योंकि जो सच पाँच साल पुराना हो और दबा हुआ हो, वो अपने आप नहीं खुलता। उसे कोई खोलता है।”
वो चली गईं।
वेद सर उठे। उन्होंने अपना काले फटे बैग उठाया और शालिनी मैडम की तरफ़ देखा।
“काग़ज़ मैं कल सुबह प्रिंसिपल को सौंप दूँगा,” उन्होंने कहा। “और ये भी कहूँगा कि मैंने क्यों उठाए थे।”
“मैं भी चलूँगी,” शालिनी मैडम ने कहा। “साथ।”
“साथ?”
“साथ। अब और"साथ। अब और छिपाने को कुछ बचा ही नहीं।"
वेद सर ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर नहीं था जो सुबह था। अब बस थकान थी, और उस थकान में एक अजीब सी राहत, जैसे कोई बोझ बहुत दिनों से कंधों पर था, और आज उतर गया।
"कल सुबह नौ बजे," वेद सर ने कहा। "प्रिंसिपल के कमरे के बाहर।"
"मैं आ जाऊँगी," शालिनी मैडम ने कहा। "पहले। तुमसे पहले।"
वेद सर हँसे। पहली बार। छोटी सी हँसी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट। "पहले क्यों?"
"क्योंकि मैंने तुम पर इल्ज़ाम लगाया। मुझे पहले जाना चाहिए।"
"और मैंने काग़ज़ उठाए। मुझे भी।"
"तो फिर साथ चलेंगे," शालिनी मैडम ने कहा। "एक ही बार में। दोनों।"
वेद सर ने सिर हिलाया। उन्होंने अपना काला बैग कंधे पर टाँगा और शालिनी मैडम ने अपनी कॉपियाँ सीने से लगाईं। दोनों दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
दरवाज़े पर वेद सर रुके। मेरी तरफ़ पलटे।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और आवाज़ थोड़ी भारी थी, "मैं सुबह से सोच रहा हूँ कि ये जो तुमने किया… ये क्या कहलाता है? कोई नाम है इसका?"
मैंने कंधे उचकाए। "कुछ नाम नहीं, सर। बस दो आदमी आमने-सामने बैठे थे और उन्होंने वो कह दिया जो उन्होंने कभी एक-दूसरे से नहीं कहा था।"
"बस इतना?"
"बस इतना।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया। उनकी हथेली में मेरी हथेली रखी। उनकी पकड़ कसी थी, और उसमें एक अजीब सी गर्मी थी।
"तुम्हारे पिता शंकर भाई हैं ना?" उन्होंने पूछा।
मैं रुक गया। "हाँ। आप उन्हें जानते हैं?"
"मैं उनके बारे में सुनता रहा हूँ," वेद सर ने कहा। "बहुत सुनता रहा हूँ।" और फिर वो हाथ छोड़कर चले गए।
शालिनी मैडम मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई। "तुम्हारी बातों में जादू है, अंकुश।"
"जादू नहीं, मैडम। बस मैं चुप नहीं बैठ पाता।"
वो हँसीं और चली गईं। दोनों स्कूल के आँगन से बाहर निकले, आमने-सामने नहीं, बगल में, और उनके कदम एक ही लय में थे।
दरवाज़े पर रमा मैडम खड़ी थीं। वो सब सुन रही थीं। मुझे पता नहीं था कब से। उन्होंने अपने हाथ से कॉपियाँ छाती से चिपकाई हुई थीं, और उनकी आँखें भीगी थीं।
वो मेरे पास आईं और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
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