The Mysterious Bell – Chapter 221
“स्टोर से उठाकर अपने बैग में? बेहतर जगह आपका बैग था?”
वो चुप हो गए।
शालिनी मैडम ने मुँह फेर लिया, जैसे कुछ ऐसा देख लिया हो जो देखना नहीं चाहती थीं।
“और मैडम,” मैंने उनकी तरफ़ देखा। “वो मोड़ा काग़ज़ आपका था?”
“मैंने कहा था, मेरी क्लास की सूची थी।”
“मैडम, मैं साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे पता होता है कि कोई चीज़ अंदर से टूटी है या बाहर से मैली हुई है। आपकी आवाज़ में जो है, वो सूची वाली आवाज़ नहीं है।”
उनकी आँखें भर आईं। पर उन्होंने आँसू नहीं गिराए। उन्होंने होंठ कसे और खिड़की की तरफ़ देखने लगीं।
वेद सर ने कहा, “मैं जानता हूँ ये क्या कर रही है। ये कहानी बना रही है।”
“कौन सी कहानी, सर?”
“कि मैं जलता हूँ। मुझे उससे जलन है।”
मैंने उनसे पूछा, “क्या है?”
“क्या?”
“जलन है?”
वो बैग से हाथ हटाकर कुर्सी के हत्थे पर रख दिया।
“पूछा तो तुमने है,” उन्होंने कहा, और आवाज़ में पहली बार कुछ असली था। “हाँ। थोड़ी बहुत है।”
शालिनी मैडम ने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था — हैरानी थी।
मैंने कहा, “मैडम, अब आप।”
“मैं क्या कहूँ?”
“जो सच है।”
उन्होंने अपनी कॉपी बंद की। हाथों को गोद में रखा। फिर बहुत धीमे से कहा, “मेरी बेटी को बुखार था।”
वेद सर ने सिर उठाया।
“उस रात उसे तेज़ बुखार था। उसे लेकर डॉक्टर के पास गई। रात भर बैठी रही। सुबह मुझे स्कूल आना था, पर मैं आ नहीं पाई। मुझे लगा, अगर मैं छुट्टी लूँगी, तो रजिस्टर में जाएगा। और मेरी उम्र है। अब मुझे कहीं और नौकरी नहीं मिलेगी।”
कमरा चुप था।
“तो मैंने वो बंडल घर ले जाने का फ़ैसला किया। किसी को नहीं बताया। किसी को नहीं दिया। न बेचा, न फेंका, न किसी को दिखाया। मैं उसे अपने बैग में बंद रखे रात भर बैठी रही, बच्ची के सिर पर हाथ रखे हुए।”
उनकी आवाज़ टूटी, पर उन्होंने फिर भी पूरा कहा।
“और उस मोड़े काग़ज़ पर मैंने उन बच्चों के नाम लिखे थे जो कमज़ोर हैं। वो जो फेल होने के करीब हैं। मैं उन्हें बचाना चाहती थी। ग़लत तरीक़े से बचाना चाहती थी, शायद। पर मैंने सोचा, अगर मेरी नौकरी चली गई, तो ये बच्चे किसके पास जाएँगे? इस स्कूल में कौन रुकेगा?”
उन्होंने वेद सर की तरफ़ देखा।
“और जब बंडल स्टोर से गायब हुआ, तो मैं सोच नहीं पाई कि कौन ले गया। मैंने सिर्फ़ एक नाम सोचा।”
“मेरा,” वेद सर ने कहा।
“तुम्हारा।”
“क्योंकि मैं इधर-उधर घूमता हूँ।”
“क्योंकि तुम मुझे देखते हो। हर दिन। हर वक़्त। और तुम्हारी आँखों में वो बात होती है जो मैं नहीं समझती।”
वेद सर के हाथ काँपने लगे। उन्होंने कुर्सी के हत्थे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
“मैंने बंडल अपने बैग में रखा,” उन्होंने कहा।
बस। इतना कहकर वो रुक गए। जैसे शब्द गले में अटक गया हो और बाहर आने के बाद फिर कभी अंदर न जाएगा।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“कोई दो कारण नहीं थे। एक ही था।”
“कहिए।”
“मैंने सोचा, अगर ये बंडल गायब हो जाए, तो शालिनी मैडम पर उँगली उठेगी। और अगर उँगली उठी, तो इस साल प्रमोशन की जो सूची बन रही है, उसमें मेरा नाम ऊपर आ जाएगा।”
शालिनी मैडम ने मुँह खोला, पर कुछ नहीं बोलीं।
“मैं पंद्रह साल से इस स्कूल में हूँ,” वेद सर ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ तब निकलती है जब आदमी थक जाए। “पंद्रह साल। और हर साल किसी न किसी को अवार्ड मिलता है। मुझे कभी नहीं। मुझे लगता है, मैं कम नहीं हूँ। पर कोई मुझे नहीं देखता।”
“तो आपने सिर्फ़ इसलिए काग़ज़ उठा लिए, सर?”
“मैंने उन्हें लिया, पर मैंने किसी को दिया नहीं। न बेचा, न दिखाया। मैं उन्हें अपने बैग में लेकर घर गया और रात भर बैठा रहा। सुबह लौटा देना था। और सुबह — सुबह मैं लौटा नहीं पाया।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं लौटा देता, तो पता चल जाता कि काग़ज़ मेरे पास थे। और मुझे लगा, मैं अपना पूरा पंद्रह साल एक झटके में खो दूँगा।”
कमरे में सिर्फ़ बल्ब बोल रहा था।
मैंने दोनों की तरफ़ देखा। दोनों की आँखें नीचे थीं। और मुझे लगा कि ये वो लम्हा है जब तंत्र काम करता है — जब आदमी अपनी बात कह देता है और उसके बाद कमरा हल्का हो जाता है।
पर यही काफ़ी नहीं था।
मैंने कहा, “सर, मैडम — अब एक-एक सच्ची बात। एक-दूसरे से।”
“हमने तो कह दिया,” वेद सर ने कहा।
“नहीं, सर। आपने मुझसे कहा। अभी आपने सबके सामने कहा। ये कम नहीं है। पर तंत्र को ये नहीं चाहिए। तंत्र को ये चाहिए कि आप दोनों में से एक, दूसरे से कहे। सीधा। बिना बहाना।”
शालिनी मैडम ने कहा, “मैं क्या कहूँ? मुझे माफ़ी माँगनी है?”
“जो सच है, वो कहिए।”
वो कुछ देर बैठी रहीं। फिर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ सँभाल रही हों।
“वेद,” उन्होंने कहा।
वो चौंके। शायद उन्होंने उन्हें पहली बार नाम से पुकारा था, या बहुत सालों बाद पुकारा था।
“मुझे तुमसे जलन थी।”
वेद सर ने सिर उठाया।
“जब तुम्हें पिछले साल शिक्षक दिवस पर सम्मान मिला, तो मेरे अंदर से कुछ निकल गया। मैं ताली बजा रही थी, और मेरे हाथ रुक गए थे। मुझे शर्म आई। मगर सच यही है। मुझे जलन थी।”
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
“और मैं ये भी कहूँगी। जब मैंने तुम्हारे बैग में काग़ज़ देखे, तो मैं राहत में थी। खुश नहीं, राहत में। मुझे लगा, अच्छा हुआ, अब मेरी गर्दन नहीं कटेगी। और ये सोचकर मुझे अपनी ही नज़र में कितना बुरा लगा, ये मैं बता नहीं सकती।”
वो चुप हो गईं।
अब वेद सर की बारी थी। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, आँखों को रगड़ा, फिर दोबारा लगाया। हाथ काँप रहे थे।
“शालिनी,” उन्होंने कहा।
वो शब्द बहुत अजीब लगा — जैसे किसी पुरानी किताब से निकला हो।
“मैं जलता था। ये तो मैंने कह दिया। पर ये बात मैंने कभी किसी को नहीं कही — मैं तुमसे पूछने से डरता था।”
“पूछने से?”
“तुमसे कि मेरी क्या ग़लती है। तुमसे कि मुझे कैसे सुधारूँ। मैं पंद्रह साल से यही सोचता रहा कि मुझे मदद चाहिए। और पंद्रह साल तक मैंने कभी किसी से मदद नहीं माँगी। न तुमसे, न प्रिंसिपल से, न किसी से। क्योंकि माँगने में मुँह छोटा लगता है।”
वो रुक गए। फिर बहुत धीमे से बोले, “और मेरी मदद माँगने की हिम्मत नहीं हुई। यही मेरी असली हार थी।”
शालिनी मैडम कुछ देर उन्हें देखती रहीं।
फिर उन्होंने कहा, “मुझे माफ़ कर दो, वेद। मैंने तुम्हें ग़लत समझा। और तुम्हारे बारे में जो सोचा, वो मैंने किसी को नहीं कहा — पर सोचा ज़रूर। और सोचना भी एक चोट होता है।”
वेद सर ने कहा, “मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हारी चीज़ उठाई और तुम्हारे ऊपर शक की उँगली आने दी। मैं उस रात घर जाकर सो भी नहीं पाया।”
“मैं भी नहीं सोई थी।”
“जानता हूँ।”
कमरे में एक अजीब-सी हल्की हवा चली, जैसे खिड़की से नहीं, किसी और जगह से आई हो।
मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। दो बार। पहले से थोड़ा ज़्यादा साफ़।
फिर तंत्र की आवाज़ आई। और आज पहली बार, वो इतनी साफ़ थी कि मैं महसूस कर सकता था कि वो कोई मशीन नहीं है। वो किसी और चीज़ की आवाज़ है।
“बीस।”
मेरे अंदर कुछ भर गया। बीस अंक। यानी ये जोड़ गहरा है। इन दोनों के बीच पंद्रह साल की चुप्पी, जलन और शक टूटा है, और इसके लिए तंत्र ने मुझे पूरे बीस दिए।
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