The Mysterious Bell220 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 220

7 min read November 5, 2026

मैंने घंटी को उँगलियों में घुमाया। सोचते वक़्त मेरी आदत है कान के पीछे पेंच पकड़कर घुमाना, पर आज पेंच नहीं था। थी तो बस एक घंटी, जो मुझे अंदर से खा रही थी।

फिर आवाज़ आई। बहुत धीमी।

“दस।”

“क्या दस?”

“टूटने से पहले की आवाज़। दस अंक।”

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। मुझे पता था ये क्या होता है। दस अंक देकर चौबीस घंटे पहले पता चल जाता है कि कौन सी चीज़ या कौन सा रिश्ता टूटने वाला है। मैंने एक बार सोचा कि नहीं, आज नहीं। फिर सोचा कि अगर कल सुबह दस बजे सभा में ये दोनों खुलकर लड़ पड़े, तो रणवीर को कहानी मुफ़्त में मिल जाएगी।

“ले ले,” मैंने कहा।

घंटी एक बार बजी। बहुत हल्की। पर उसके बाद जो आवाज़ आई, वो घंटी की नहीं थी।

वो आवाज़ अंदर से आई। जैसे कोई मेरे कान में, बहुत पास से, दो लोगों की बात सुना रहा हो।

पहले एक औरत की आवाज़, जिसमें गुस्सा ज़्यादा था और डर कम।

फिर एक आदमी की आवाज़, जो बीच में कहीं अटक गई और आगे नहीं बढ़ी।

फिर बस एक लाइन साफ़ सुनाई दी, जैसे किसी कमरे में दरवाज़ा पटककर बंद हो रहा हो।

घंटी ने कहा, “कल, शाम चार बजे।”

“कल शाम चार बजे क्या?”

“ये रिश्ता टूटेगा।”

मेरे हाथ से बेंच का किनारा छूट गया। कल शाम चार बजे। मतलब सभा सुबह दस बजे है और ये रिश्ता मरने के लिए शाम चार बजे तय है। मतलब सभा वो जगह है जहाँ इन दोनों के बीच वो बात कही जाएगी जो कभी जुड़ नहीं सकेगी।

“घंटी,” मैंने कहा, “अगर मैं आज रात इन दोनों को बैठा दूँ, तो?”

“तो तेरी मर्ज़ी। मैं तारीख़ बताती हूँ, दवा नहीं।”

“बहुत मदद की तूने।”

“तू ने पूछा था।”

घंटी चुप हो गई। बस उसकी ठंडक मेरी हथेली में बची रही।

मैं उठा। तभी गेट की तरफ़ से पैरों की आवाज़ आई — एक पैर सीधा और एक पैर खींचकर। टिंकू था, पैर अब भी पट्टी में। हाथ में एक लड्डू का पेपर था, जिसमें आधा लड्डू टूटा पड़ा था।

“उस्ताद,” उसने कहा, “आप बैठे हो। मैंने सोचा आप चले गए।”

“जा रहा था। तू आ गया।”

वो मेरे पास बैठ गया, और उसने वो आधा लड्डू मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

“कहाँ से आया?”

“शबनम आपा ने दिया। बोली, टाँग टूटी है तो मुँह भी तोड़ ले।”

मैं हँस पड़ा। बात सच थी।

फिर टिंकू ने बेंच की झूलती टाँग पर हाथ रखा और कहा, “इसे भी ठीक करोगे?”

“ये स्कूल की है।”

“तो?”

“तो कुछ नहीं। अभी नहीं। पहले इन दो बड़ों को ठीक करना है।”

“वेद सर और शालिनी मैडम को?”

“हाँ।”

“इनका क्या टूटा है उस्ताद? इनके पास तो सब है।”

“यही तो दिक्कत है, टिंकू। जिसके पास सब होता है, उसके बारे में सब मान लेते हैं कि उसका कुछ टूटा ही नहीं।”

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “तो मैं क्या करूँ?”

“तू उन दोनों को यहाँ बुला। मैडम को छत वाले कमरे से और सर को गेट से। कह देना कि अंकुश बुला रहा है, दस मिनट की बात है।”

“कह दूँ कि मास्टर जी बुला रहे हैं? वो सुनेंगे ज़्यादा।”

“नहीं। सच बोल। मेरा नाम ले।”

वो उठा और खींचते पैर चला गया। मैंने उसे जाते देखा और सोचा कि बारह साल की उम्र में सच बोलने की आदत अगर बन जाए, तो आगे के चालीस साल बहुत सस्ते पड़ जाते हैं।

मैंने जेब से फ़ोन निकाला। एक मिस्ड कॉल थी — काजल की। मैंने मिलाया।

“भैया,” उसकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे अस्पताल के गलियारे से बोल रही हो। “दवा की डिब्बी खत्म। डॉक्टर साहब ने नई लिखी है, पर फार्मेसी वाले कह रहे हैं काग़ज़ साफ़ नहीं है तो नई खेप नहीं मिलेगी।”

“कल तक?”

“कल सुबह तक चलेगी। दोपहर से बाद नहीं।”

मैंने आँखें बंद कर लीं। माँ के बेड के ऊपर वो पीली दीवार याद आई, जिस पर रणवीर का पोस्टर लगा था। नई शुरुआत, नए सपने।

“काजल, सुन। मैं आज रात आऊँगा। और सुन, जो माँ का लिफ़ाफ़ा तेरे पास है, वो किसी को नहीं।”

“किसी को नहीं।”

“मीरा को भी नहीं।”

वो एक सेकंड चुप रही। फिर बोली, “भैया, तुम मीरा दीदी पर शक कर रहे हो?”

“मैं किसी पर शक नहीं कर रहा। मैं बस आज किसी को कुछ नहीं दे रहा।”

फ़ोन कट गया।

मैंने घंटी को जेब में वापस रखा और खाली कमरे की तरफ़ देखा। उस कमरे में सिर्फ़ एक लकड़ी की मेज़ थी, चार कुर्सियाँ, और एक ऐसा बल्ब जो गुनगुनाता था, जैसे बूढ़ा आदमी सोते-सोते कोई पुरानी गिनती गिन रहा हो।

मैंने मेज़ को बीच से हटाया। दो कुर्सियाँ आमने-सामने रखीं। बीच में एक हाथ का फ़ासला छोड़ा। इतना कि कोई एक-दूसरे की आँख देख सके, और इतना कि कोई हाथ बढ़ाकर चुप न कर सके।

फिर मैंने कमरे की खिड़की खोल दी। बाहर से हवा आई, जिसमें चबूतरी की धूल और शबनम आपा की चाय की खुशबू दोनों थीं।

पहले वेद सर आए।

लंबे, दुबले, काले फटे बैग का पट्टा कंधे पर, और शर्ट की कॉलर पर पसीने का निशान। वो दरवाज़े पर रुके और अंदर देखा, जैसे किसी चीज़ की उम्मीद कर रहे हों।

“कौन है?” उन्होंने पूछा।

“मैं हूँ, सर। अंकुश। साइकिल वाला।”

“मुझे पता है तुम कौन हो। मैं पूछ रहा हूँ, अंदर कौन है।”

“कोई नहीं। बस दो कुर्सियाँ हैं।”

वो अंदर आए और खड़े रहे। उन्होंने कुर्सी नहीं देखी, मुझे देखा।

“तुमने मुझे बुलाया?”

“हाँ, सर।”

“किस हक़ से?”

“किसी हक़ से नहीं। बुलाने के लिए हक़ नहीं चाहिए, सर। आपने आना चाहा, इसलिए आए।”

उनका जबड़ा कसा। फिर वो बैठ गए।

दो मिनट बाद शालिनी मैडम आईं। साड़ी का पल्लू कंधे पर, हाथ में उनकी उपस्थिति वाली कॉपी, और आँखों में वो थकान जो सिर्फ़ उन औरतों की होती है जो घर और नौकरी दोनों में अकेले खड़ी रहती हैं।

उन्होंने अंदर आते ही वेद सर को देखा और रुक गईं।

“ये क्या है?”

“मैडम, बैठिए।”

“मैं नहीं बैठूँगी। ये आदमी यहाँ क्यों है?”

“क्योंकि आप दोनों को यहाँ होना चाहिए।”

वो मेरी तरफ़ घूमीं। उनकी आँखें छोटी हो गईं।

“तुम कौन हो तुम? तुमने मेरे बारे में प्रिंसिपल से बात क्यों की? तुम्हारा इस स्कूल से क्या लेना? किसी ने भेजा है तुम्हें?”

मैं कुछ सेकंड चुप रहा।

यही तो तंत्र की सबसे सख़्त शर्त थी। मरम्मत के वक़्त मैं झूठ नहीं बोल सकता। चुप रह सकता हूँ, बात छुपा सकता हूँ, पर झूठ नहीं।

“मैडम,” मैंने कहा, “इसका जवाब मैं नहीं दूँगा।”

“मतलब हाँ, किसी ने भेजा है।”

“मतलब — इसका जवाब मैं नहीं दूँगा, क्योंकि आज मैं झूठ नहीं बोल सकता। और सच पूरा बोल नहीं सकता। इसलिए मैं चुप रहूँगा। आप जो समझें, समझ लें।”

वो मुझे देखती रहीं। उनका गुस्सा थोड़ा ढीला पड़ा, जैसे किसी ने उसकी गाँठ खोल दी हो।

फिर वो बैठ गईं।

मैं उनके बीच में खड़ा रहा, न कुर्सी पर, न बेंच पर। मैंने दोनों को देखा।

“आज यहाँ कोई काग़ज़ नहीं है,” मैंने कहा।

वेद सर ने बैग कसकर पकड़ लिया।

“कोई फ़ाइल नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई अंगूठा नहीं। मैंने आप दोनों को यहाँ इसलिए बुलाया है कि आज सिर्फ़ एक चीज़ बोलेगी।”

“कौन सी चीज़?” शालिनी मैडम ने पूछा।

“सच्ची बात।”

कमरे में चुप्पी आ गई। इतनी चुप्पी कि बल्ब की गुनगुनाहट सुनाई देने लगी।

“मुझे कुछ नहीं पता,” वेद सर ने कहा। “मैंने कुछ नहीं किया।”

“सर, मैंने आपसे ये नहीं पूछा कि आपने क्या किया।”

“तो तुम क्या पूछ रहे हो?”

“मैं पूछ रहा हूँ कि आपने वो बंडल बैग में क्यों रखा।”

वो एक पल के लिए हिल गए। बहुत थोड़ा। पर मैंने देख लिया।

“किसने कहा मैंने रखा?”

“आपके बैग से निकला, सर। मैंने अपनी आँखों से देखा।”

“मैंने उसे स्टोर में रखा था, बेहतर जगह।”

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