The Mysterious Bell – Chapter 219
वेद सर ने पूरी बात बताई। कल शाम, स्कूल बंद होने से पहले, उन्होंने काग़ज़ों का बंडल स्टोर में रखा था। ताला लगाया, चाबी अपने पास रखी। रात को उन्हें याद आया कि उनके बैग में एक काग़ज़ रह गया था जो उन्हें आज सुबह प्रिंसिपल को देना था। वो स्कूल लौटे, स्टोर खोला, तो बंडल वहीं पड़ा था। पर उन्हें कुछ अलग लगा। फिर उन्होंने बंडल उठाया, और उसे बैग में रख दिया, ताकि सुबह सीधे प्रिंसिपल के पास जाएँ।
शालिनी मैडम ने कहा, “ये झूठ है। स्टोर की चाबी मेरे पास थी।”
“आपके पास इसी साल की चाबी है। पुरानी चाबी मेरे पास है, जो पिछले साल बदली गई थी पर कोई जमा नहीं करवाई।”
“तो हम दोनों के पास चाबी है। कितना सुंदर इंतज़ाम है।”
मैंने बंडल उठाकर देखा। काग़ज़ साफ़ थे, कोई तह नहीं, कोई गिनती का निशान नहीं। मैंने बैग देखा। बैग के अंदर कुछ और भी था — एक पुराना पेन, एक माचिस की डिब्बी, और एक मोड़ा हुआ काग़ज़।
वो काग़ज़ मैंने खोला। उस पर पेंसिल से लिखा था, “तीसरी क्लास, सातवाँ, बारह से अठारह।” बस। और नीचे मिट्टी जैसा निशान।
“ये क्या है?” मैंने पूछा।
वेद सर ने देखा और उनका चेहरा पीला पड़ गया। “ये… ये मेरा नहीं है।”
“तो किसका है?”
“मुझे नहीं पता। मैंने इसे पहले नहीं देखा।”
शालिनी मैडम ने वो काग़ज़ मेरे हाथ से लिया। वो इसे देखती रहीं, फिर उनके होंठ काँपने लगे।
“ये…” उन्होंने धीरे से कहा, “ये मेरी लिखाई है।”
“मैडम?”
“बारह से अठारह।” उन्होंने काग़ज़ को मेज़ पर रख दिया। “ये रोल नंबर मेरे क्लास के हैं। पिछले हफ़्ते मैंने इन बच्चों की विशेष क्लास ली थी। मैंने यही लिखा था, ताकि मुझे याद रहे कि किसे अलग से पढ़ाना है।”
अब वेद सर उठ खड़े हुए। “तो ये मेरे बैग में कैसे आया?”
“यही तो मैं भी पूछ रही हूँ।”
और मैं बीच में खड़ा सोच रहा था — यहाँ कुछ और है। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े थे, दोनों के पास कोई-न-कोई काग़ज़ था, और दोनों एक-दूसरे को झूठा साबित करने में लगे थे। पर सवाल ये नहीं था कि कौन झूठा है। सवाल ये था कि इन दोनों के बीच ये जंग शुरू कहाँ से हुई?
दोपहर होते-होते प्रिंसिपल कमरे में आए। उन्होंने काग़ज़ देखे, दोनों की बातें सुनीं, फिर कुर्सी पर बैठ गए।
“मुझे कल तक जवाब चाहिए,” उन्होंने कहा। “अगर कल तक सच नहीं मिला, तो दोनों को निलंबित कर दिया जाएगा।”
शालिनी मैडम खड़ी हो गईं। “सर, मैं पंद्रह साल से यहाँ हूँ…”
“मुझे पता है।” प्रिंसिपल ने कहा। “और मुझे यह भी पता है कि स्कूल कल सुबह से छत की वजह से बंद हो रहा है। ऐसे में मुझे एक और तमाशा नहीं चाहिए।”
कमरे से बाहर निकलकर मैंने देखा कि रमा मैडम नीम के पेड़ के नीचे खड़ी थीं। बच्चे अब भी वहीं बैठे थे, पर कोई किताब नहीं खोल रहा था।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“वो दोनों,” रमा मैडम ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सालों की हो, “आज सिर्फ़ एक-दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हैं। सच कोई नहीं चाहता। पर स्कूल बंद होने से पहले यहाँ के रिश्ते बचाने पड़ेंगे। वरना छत नई हो जाएगी, बच्चे वही रहेंगे, और स्कूल यहीं खत्म हो जाएगा।”
मैंने बच्चों की तरफ़ देखा। सानिया अपने घुटने पर सिर रखकर बैठी थी। गुड्डू पत्थर से ज़मीन पर कुछ खींच रहा था। चिंटू का पैर अब भी पट्टी में था और वो दूर स्कूल की छत को देख रहा था, जैसे उसी से पूछ रहा हो — तूने क्यों गिराया मुझे?
शाम पाँच बजे तक हम कमरे में बैठे रहे। मैंने वेद सर से अलग बात की। वो बोले कि उनकी नज़र में शालिनी मैडम का हिसाब हमेशा गड़बड़ रहता है, और ये बात उन्होंने कभी किसी से नहीं कही।
“क्यों नहीं कही?” मैंने पूछा।
“क्योंकि बात बढ़ जाती।”
“और आज बात बढ़ी कैसे?”
वो चुप हो गए।
फिर मैंने शालिनी मैडम से अलग बात की। उन्होंने कहा कि वेद सर पिछले साल से उनसे जलते हैं, क्योंकि उन्हें एक अवार्ड मिला था।
“क्या वो जलते हैं?” मैंने पूछा।
“तुम्हें क्या लगता है?”
“मैडम, मैं साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे ये तो पता चल जाता है कि पहिया घूमता क्यों नहीं। पर ये तो मैं नहीं बता सकता कि आदमी के अंदर कौन सी तील मुड़ी है।”
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने कहा, “वो इंसान बुरा नहीं है। बस उसके अंदर एक बात है, जो वो कभी नहीं कहता।”
“कौन सी बात?”
“वो खुद बताएगा तो बताएगा। मैं कैसे बताऊँ?”
सूरज ढलने लगा। स्कूल के आँगन में बच्चों की छाया लंबी होने लगी। मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। मैंने उसे उँगलियों से छुआ, तो वो धीमे से काँपी।
फिर आवाज़ आई। बहुत धीमी, जैसे किसी पुराने ताले के अंदर से निकल रही हो।
“झगड़ा सुबह के काग़ज़ों में नहीं है।”
मैं रुक गया।
“तो कहाँ है?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।
“दोनों की पुरानी हार में।”
बस। इतना कहकर घंटी चुप हो गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।
पुरानी हार। दोनों की। मतलब किसी एक की नहीं, दोनों की। मतलब ये लड़ाई आज के परीक्षा काग़ज़ों से नहीं, किसी पुराने दिन से चल रही है। किसी ऐसे दिन से, जब इन दोनों ने कुछ खोया था। और उस खोने की बात किसी ने किसी से कही ही नहीं।
तुम सोच रहे होगे कि अब क्या करूँ? भाई, अभी तो बस इतना पता है कि दरवाज़ा कहाँ है। खोलना बाकी है।
मैंने स्कूल के गेट से बाहर देखा। गली की तरफ़ बबलू का आदमी नहीं दिख रहा था। रमा मैडम बच्चों को कॉपी बाँट रही थीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर बच्चों का हँसना आज बोलने वालों से ज़्यादा था — और वो हँसी भी ऐसी थी, जैसे डर को ढक रही हो।
मैंने काग़ज़ों का बंडल मेज़ पर वापस रखा, और घंटी को जेब में कसकर दबा लिया।
कल सुबह दस बजे पीपल के नीचे वो सभा है। आज रात इन दोनों की पुरानी हार ढूँढनी है — वरना कल जब साहब चबूतरी पर बैठेगा, तो उसके पास एक और कहानी तैयार होगी। “देखा, इनके अपने स्कूल में ही लोग एक-दूसरे को नोच रहे हैं।”
और मुझे पता है, वो कहानी इस बार काम कर सकती है। क्योंकि इस बार उसे कोई नहीं बना रहा। ये हम खुद बना रहे हैं, अपने हाथों से।
मैंने स्कूल की उस टूटी बेंच पर हाथ रखा, जिसकी टाँग हिल रही थी। और मैंने सोचा — छत से शुरू करेंगे, तो बेंच से क्यों नहीं?
क्योंकि छत तो साहब गिरा रहा है। बेंच हम खुद तोड़ रहे हैं। और बेंच तोड़ने की आदत जाती नहीं, तो छत बनकर भी क्या होगा, भाई?
॥
शाम के पाँच बज चुके थे और स्कूल का आँगन खाली हो रहा था। मैंने टूटी बेंच की टाँग पर हाथ रखा और ज़ोर से दबाया। बेंच एक तरफ़ झुकी, फिर वापस उठ आई। ठीक वैसे ही, जैसे कोई पुराना आदमी सहारा लेकर बैठता है और सहारा छिनते ही झटका खा जाता है।
मैं वहीं बैठ गया।
सामने ब्लैकबोर्ड था, जिस पर आधी मिटी तारीख़ पड़ी थी। ऊपर छत पर वो जगह साफ़ दिख रही थी, जहाँ से कल प्लास्टर गिरा था। नीचे सीमेंट चमक रहा था, जैसे किसी ने मुँह खोलकर दाँत दिखा दिए हों।
मैंने जेब से घंटी निकाली। ठंडी थी। मैंने उसे हथेली में रखकर हल्का दबाया।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा। “मुझे पता है तू बोलती है तो छोटा बोलती है। पर आज मुझे सीधा जवाब चाहिए।”
घंटी चुप रही।
“वेद सर और शालिनी मैडम। इन दोनों की पुरानी हार क्या है?”
कोई आवाज़ नहीं आई। बस दूर किसी कमरे में कुर्सी घिसटने जैसी आवाज़ आई और फिर सन्नाटा।
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