The Mysterious Bell – Chapter 218
वो कुछ देर चुप चला। फिर बोला, “कि जिस छत पर हम पतंग उड़ाते थे, उसे तोड़ने के बाद साहब का चेहरा कैसा लगेगा।”
मैं हँस पड़ा। यही तो फ़र्क़ है ना — बड़े सवाल पूछते हैं और जवाब सालों तक नहीं मिलता। ये छोटे बच्चे सीधा सवाल पूछते हैं, और जवाब में उनकी आँखें ही मिल जाती हैं।
स्कूल का गेट पुराना लोहे का, एक तरफ़ का कब्ज़ा टूटा हुआ, खुलने पर “गड़ड़” करके ऐसी आवाज़ निकलता है जैसे कोई बूढ़ा खाँस रहा हो। अंदर घुसते ही पीली दीवारें सामने आ जाती हैं। एक जगह प्लास्टर उखड़ा हुआ, नीचे से लाल ईंटें दिखती हैं। कुछ दीवारों पर बच्चों की पेंसिल से बनी तस्वीरें हैं — सूरज, चिड़िया, और एक लंबा-सा आदमी जिसके हाथ में झंडा है। किसी ने नीचे लिख दिया है — “हमारा स्कूल”।
और बेंचें। यार, वो बेंचें देखकर मेरा दिल बैठ गया। किसी की टाँग टूटी, किसी का पटरा तिरछा, किसी में से कील ऐसी निकली है जैसे किसी बच्चे का दाँत। कोई बेंच तो ऐसी है कि उस पर तीन बच्चे बैठते हैं और चार नंबर का कमरा खाली रहता है। उसी पर बच्चे पढ़ते हैं, हँसते हैं, लड़ते हैं और फिर मिल भी जाते हैं।
और ऊपर छत। वही छत। जहाँ से कल सुबह से कोई पतंग नहीं उड़ेगी।
तभी मुझे आवाज़ आई। रमा मैडम की आवाज़। पीपल जैसा नहीं, स्कूल के आँगन के कोने में जो नीम का पुराना पेड़ है, उसके नीचे बच्चों की टोली बैठी थी। रमा मैडम सामने खड़ी थीं, हाथ में चॉक और एक पुराना बोर्ड जो पेड़ से टिका हुआ था।
“देखो,” वो कह रही थीं, “अगर कल छत बंद है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पढ़ाई भी बंद है। हम पेड़ के नीचे बैठेंगे, ज़मीन पर बैठेंगे, पर बैठेंगे ज़रूर।”
एक बच्ची ने हाथ उठाया। “मैडम, छत टूटी है क्या?”
रमा मैडम ने चॉक हाथ में घुमाया। फिर वो बोलीं, “स्कूल सिर्फ़ इमारत नहीं होता। ये इमारत गिर भी जाए, तो स्कूल नहीं गिरता। स्कूल वो होता है जो इन बच्चों के सिर में बैठता है। और ये बच्चे मेरे लिए सिर्फ़ बच्चे नहीं हैं। ये मेरा दूसरा घर हैं। जिस घर के आँगन में मैंने इन्हें चलना सिखाया, जिस आँगन में इन्होंने मेरी चप्पल चुराकर छिपाई, उस घर को कोई तोड़ेगा तो मैं चुप नहीं बैठूँगी।”
बच्चे हँसे। मैं दूर खड़ा सुन रहा था और मुझे अचानक अपनी माँ की याद आ गई। वो भी ऐसे ही बोलती हैं — “मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता।” बात अलग, मिज़ाज एक।
मैं आगे बढ़ा ही था कि स्टाफ वाले कमरे से आवाज़ आई। पहले धीमी, फिर तेज़। फिर ऐसी कि पेड़ के नीचे बैठे बच्चों ने भी गर्दन घुमा ली।
“ये क्या है, वेद जी? ये क्या है?”
“शालिनी जी, आप मेरी तरफ़ इशारा मत कीजिए।”
“मैं इशारा नहीं कर रही। मैं पूछ रही हूँ कि ये काग़ज़ आपके बैग में कैसे आए?”
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रहा था।
हम दोनों चुपचाप उस कमरे की खिड़की के पास पहुँचे। खिड़की पर लोहे की जाली है, और जाली के अंदर से सब साफ़ दिख रहा था। मेज़ पर काग़ज़ों का मोटा बंडल पड़ा था। गत्ते का मोटा कवर, ऊपर लाल मार्कर से कुछ लिखा। पास में एक खुला बैग रखा था — काला, फटा, और उसमें से वही काग़ज़ निकले थे।
शालिनी मैडम खड़ी थीं। उम्र पैंतालीस के आसपास, साड़ी का पल्लू कंधे पर, हाथ में चश्मा पकड़े हुए, जैसे चश्मा ही उनका सबूत हो। सामने वेद सर खड़े थे। दुबले, लंबे, कमीज़ की बाँह चढ़ी हुई, माथे पर पसीना।
“ये परीक्षा के काग़ज़ हैं,” शालिनी मैडम ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। “ये कल शाम तक ताले में होने चाहिए थे। और ये आपके बैग से निकले हैं।”
“मैं इन्हें घर नहीं ले जा रहा था।”
“तो बैग में क्यों थे?”
“क्योंकि मैं इन्हें आपसे बचाने के लिए अपने पास रख रहा था।”
शालिनी मैडम का चेहरा लाल हो गया। “मतलब?”
“मतलब यह कि आपने अपने ही क्लास के बच्चों को नंबर बढ़ाकर दिए हैं। और मेरे पास इसका हिसाब भी है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर, नीम के पेड़ के नीचे, रमा मैडम का चॉक बोर्ड पर रुक गया।
बच्चे धीरे-धीरे उठने लगे। सानिया ने गुड्डू का हाथ खींचा। रफ़ीक़ और चिंटू दरवाज़े के पास खड़े हो गए। और फिर वो हुआ जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभा — एक-एक करके बच्चे बाहर निकलने लगे। डरकर। जैसे कमरे के अंदर आग लगी हो और वो बाहर भाग रहे हों।
टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ में बस्ते का पट्टा था, उसे वो ऐसे मरोड़ रहा था जैसे गीला कपड़ा हो।
“उस्ताद,” उसने धीरे से कहा।
“हाँ।”
“स्कूल में भी रिश्ते टूटते हैं क्या?”
मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा। फिर मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“यहाँ तो काग़ज़ भी रोते हैं, टिंकू।” मैंने कहा।
“क्या मतलब?”
“मतलब यह कि हर वो काग़ज़ जिस पर किसी बच्चे ने रात भर मेहनत की, जब ये बड़े लोग उसे अपनी लड़ाई का हथियार बना लेते हैं, तो वो काग़ज़ भी रोता है। तुझे आवाज़ नहीं आती, पर आती है।”
अब मैं अंदर गया। मैंने दरवाज़ा खटखटाया, पर खटखटाने से पहले ही वेद सर ने कहा, “कौन है? अभी नहीं।”
“मैं हूँ,” मैंने कहा, और अंदर आ गया। “साइकिल वाला।”
दोनों मेरी तरफ़ देखने लगे। शालिनी मैडम ने चश्मा पहन लिया, जैसे मुझे पहचानना चाहती हों। वेद सर ने मेरी ओर देखकर कहा, “तुम्हें किसने बुलाया?”
“किसी ने नहीं। मैं खुद आया।” मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया। “बात सुनिए, आप दोनों जो भी लड़ रहे हैं, वो आपकी लड़ाई है। पर उसका सबूत मेज़ पर पड़ा है और बाहर बच्चे डरकर भाग रहे हैं। ये मुझे ठीक नहीं लगा।”
“ये तुम्हारा काम नहीं है,” वेद सर ने कहा।
“हाँ, ये मेरा काम नहीं है।” मैंने कहा। “मेरा काम साइकिल ठीक करना है। पर भाई साहब, आप दोनों की ये लड़ाई इतनी दूर तक पहुँच गई है कि बच्चे बाहर डरकर खड़े हैं। अब बताइए, मैं कैसे चुप बैठूँ?”
शालिनी मैडम ने काग़ज़ का बंडल उठाया।
“ये काग़ज़ मेरे क्लास के बच्चों के हैं। और मैं इन्हें बिना देखे यहाँ नहीं छोड़ूँगी।”
“आप इन्हें देखेंगी, तो मैं क्या करूँ?” वेद सर ने कहा। “आपने अपने बच्चों को नंबर बढ़ाकर दिए हैं, ये मेरे पास लिखा हुआ है।”
“जब आपके पास लिखा हुआ है, तो आपने अब तक प्रिंसिपल को क्यों नहीं दिया?”
“क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद कबूल करें।”
“मतलब आप मेरे पीछे पड़े हैं पिछले महीने से — क्योंकि इस बार भी प्रमोशन मेरा नाम आया और आपका नहीं।”
कमरे में हवा भारी हो गई। वेद सर की मुट्ठी बंद हो गई। उन्होंने कुछ कहा, फिर रुक गए, फिर बोले, “ये बात आपने कही।”
“मैंने कही।”
“तो सुनिए, मैं तेरह साल से इस स्कूल में हूँ। मैंने एक दिन भी छुट्टी नहीं ली। मेरी तनख्वाह आपसे कम है, ये बात मुझे पता है। पर मैंने आज तक कोई काग़ज़ नहीं बेचा।”
मैं बीच में बोला, “रुकिए।”
दोनों रुके। मैं उठा, और दोनों के बीच आकर खड़ा हो गया।
“अब ऐसा करें,” मैंने कहा। “आप दोनों एक-एक कुर्सी पर अलग बैठिए। बीच में ये मेज़ है। और बात जब तक एक-एक चीज़ साफ़ न हो जाए, यहाँ से कोई नहीं जाएगा।”
“तुम कौन होते हो?” वेद सर ने कहा, पर वो उठकर बैठ गए। शालिनी मैडम भी बैठ गईं।
तुम सोच रहे होगे कि साइकिल मरम्मत करने वाला इनसे क्या हल करवाएगा? भाई, मैं भी यही सोच रहा था। पर घंटी जेब में थी, और घंटी चुप थी। बस चुप बैठी थी, जैसे मुझे पहले देखने दे रही हो।
“पहले ये बताइए,” मैंने कहा, “ये बंडल आपके बैग में कैसे आया?”
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