The Mysterious Bell – Chapter 217
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा वहीं खड़ी थी, एक हाथ में बैटरी, दूसरा हाथ आधा उठा हुआ, और उसके चेहरे से खून उतर गया था। रमा मैडम ने भी उसे देखा। एक पल को दोनों औरतें चबूतरी और स्कूल के बीच की उस धूल भरी जगह में आमने-सामने रुक गईं।
फिर रमा मैडम ने आगे बढ़कर चिंटू का चेहरा देखा और कहा, “बच्चा ठीक है?”
“ठीक है,” मैंने कहा।
“छत पर इसे किसने भेजा?”
“कोई नहीं भेजा,” सानिया ने सिसकते हुए कहा। “हम रोज़ पतंग उड़ाते हैं। छत पर कभी कुछ नहीं गिरा। आज अचानक —”
रमा मैडम ने स्कूल की तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़। और उसने धीरे से कहा, “तुम मीरा हो ना?”
मीरा ने सिर हिलाया। उसकी आवाज़ नहीं निकली।
“तुमने वो खबर लिखी थी,” रमा मैडम ने कहा। “पाँच साल पहले।”
मीरा ने फिर सिर हिलाया। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
“मैं आज तुमसे ये नहीं पूछूँगी कि तुमने क्यों लिखी,” रमा मैडम ने कहा। “मैं आज ये पूछूँगी कि तुम अब सच लिखोगी?”
और मीरा ने कहा, “हाँ।”
यह शब्द चबूतरी पर गिरा और किसी पीतल की तरह बजा। मैंने अपनी जेब में घंटी को हल्का गरम होते महसूस किया। एक अंक। शायद दो। पाँच साल की एक गिरी हुई आवाज़ आज वापस उठी थी।
चिंटू को शबनम आपा की गुमटी के बाहर बेंच पर बिठाया गया। मैं खड़ा हुआ, कोहनी पर मिट्टी झाड़ी, और तब मेरी नज़र उस जगह पड़ी जहाँ प्लास्टर गिरा था।
प्लास्टर सादा नहीं था।
मैंने झुककर देखा। जिस जगह से टुकड़ा गिरा था, वहाँ दीवार का रंग अंदर से गीला था। और उस गीले हिस्से के किनारे-किनारे, ईंटों के बीच, मसाले की एक सीधी लकीर दिख रही थी — ऐसी सीधी जैसी कुदरती टूट में नहीं होती। और फिर मुझे वहाँ नीचे कुछ और दिखा: सीढ़ी के उस पाये के पास, ज़मीन में एक ताज़ा गड़्ढा, और उसके पास पड़ी एक लोहे की छड़ का नुकीला सिरा।
मेरे पेट में कुछ ठंडा गुज़रा।
“सानिया,” मैंने धीरे से कहा।
वो आई।
“रात को स्कूल के पास कोई आया था?”
उसकी आँखें बड़ी हो गईं। “उस्ताद, आज सुबह मैंने देखा था — स्कूल के पीछे एक टेम्पो खड़ा था। मैंने सोचा कूड़ा वाला होगा। पर उसमें से कोई बोरा नहीं उतरा था। दो आदमी सीढ़ी लेकर अंदर गए थे।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
और तभी रणवीर ने आवाज़ उठाई।
वो अब भी चबूतरी के उस सिरे पर खड़ा था, हाथ जेब में, चेहरे पर वही धीमी मुस्कान। उसने सबको देखा — डरे हुए बच्चों को, चबूतरी पर बैठे बुज़ुर्गों को, मीरा को, और फिर मुझे।
“देखा?” उसने कहा। “मैंने कहा था ना। ये छत बच्चों के लिए खतरनाक है। आज एक बच्चा बच गया। कल कोई नहीं बचेगा।”
“आप चुप कीजिए,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी, पर ज़ोर से नहीं। “आपने ये छत देखी थी। आपको पता था।”
रणवीर ने सिर हिलाया, जैसे किसी नौसिखिये को सही जवाब दे रहा हो।
“मुझे ये भी पता है,” उसने कहा, “कि इस गली में आज कोई नहीं कहेगा कि स्कूल नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि जिसकी छत आज गिरी है, उसके लिए हर माँ आज रात सोचेगी — कल क्या होगा।”
वो अपनी जगह से उठा और कुर्ते के बटन छूटे हुए सीधे करने लगा, जैसे सभा खत्म हो गई हो।
“मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊँगा,” उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मुझे घास से भी ज़्यादा अखरती है। “मैं इसी शहर में पैदा हुआ हूँ। मैं चाहता हूँ कि यहाँ के बच्चे पक्की छत के नीचे पढ़ें। अगर यहाँ के लोग मेरा नाम लेकर एक काग़ज़ पर हामी भर दें, तो नई इमारत का काम महीने के अंदर शुरू करवा दूँगा। पुराने स्कूल की छत को कोई क्यों सहता रहेगा?”
वो पीपल के नीचे से निकलने लगा। और तभी —
“रुकिए।”
आवाज़ प्रिंसिपल की थी। वो अब तक चुप खड़े थे, काग़ज़ हाथ में लिए। मैंने उन्हें पहले देखा नहीं था — पतले, सफ़ेद बाल, कमज़ोर चश्मा, और हाथ जो काग़ज़ को ऐसे पकड़े हुए थे जैसे वो उड़कर न चला जाए।
वो आगे आए। उनके होंठ काँप रहे थे। उन्होंने काग़ज़ पर देखा, फिर सबको देखा, फिर रणवीर को।
“साहब,” उन्होंने कहा, “मैं इस स्कूल में पैंतीस साल से हूँ। मैंने इस छत के नीचे हज़ारों बच्चों को पढ़ाया है। इस छत ने आज तक कुछ नहीं गिराया। आज गिराया।”
रमा मैडम ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया।
“और ये काग़ज़,” प्रिंसिपल ने कहा, और उनकी आवाज़ लड़खड़ाई। “ये काग़ज़ बीती रात स्कूल के दरवाज़े के नीचे से मिला। ऊपर हमारा स्कूल बंद करने का नोटिस है। नीचे, छोटी लाइन में, ये वजह है कि छत कमज़ोर है।”
वो रुके। पूरी गली चुप थी। मैंने पीपल की आवाज़ सुनी। मैंने अपनी साँस सुनी।
“जानते हो इसमें सबसे बड़ी बात क्या है?” प्रिंसिपल ने कहा, और अब उनकी आवाज़ रो रही थी। “इस काग़ज़ पर मोहर उस आदमी की नहीं है जिसने इसे दिया। मोहर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है।”
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया।
रणवीर ने आधा कदम आगे बढ़ाया, और उसकी मुस्कान इस बार कुछ और थी — पतली, ठंडी, बिना मिठास की। उसने प्रिंसिपल के हाथ से काग़ज़ देखा, बिना छुए, और बहुत धीरे से कहा, “प्रिंसिपल जी, काग़ज़ के नीचे मेरी मोहर है, क्योंकि स्कूल की नई छत मेरे खर्चे से बनेगी। कोई गलती नहीं हुई।”
प्रिंसिपल ने उसकी तरफ़ देखा। उनके हाथ में वो पीला काग़ज़ काँप रहा था।
“नई छत इसलिए बनेगी,” प्रिंसिपल ने कहा, “क्योंकि पुरानी छत को खुद तोड़ा गया है। मेरे एक बच्चे ने आज सुबह मुझे बताया कि रात को छत पर दो आदमी चढ़े थे। मैंने उसे डाँटकर चुप करा दिया था।”
और फिर उन्होंने वो काग़ज़ ऊपर उठाया और काँपती हुई आवाज़ में वो बात कही, जो आज सुबह किसी ने नहीं सोची थी।
“और मैं आपको सिर्फ़ इतना बताने आया हूँ,” उन्होंने कहा, “कि कल सुबह से स्कूल की छत बंद रहेगी।”
हवा रुक गई।
बंसी बाबा का हाथ चबूतरी पर जम गया। उस्ताद अली बक़्श ने चश्मा उतार लिया। मीरा के हाथ से बैटरी फिसलकर गिरी और लुढ़कती हुई नाली के पुल तक चली गई।
मैं स्कूल की उस छत को देख रहा था, जहाँ कल सुबह से कोई बच्चा पतंग नहीं उड़ाएगा। और उसी प्लास्टर के गिरे हुए टुकड़े पर मेरी नज़र गई, जिसके गीले किनारे से पानी की एक बूँद टपक रही थी — ताज़ा, ठंडी, और किसी की मेहनत से बनी हुई।
॥
उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। कंधे पर जो चोट लगी थी, वो बात करते वक़्त पता नहीं चलती, पर करवट लेने पर याद दिला देती है। काजल ने पट्टी बाँधते हुए चार बार कहा था कि अस्पताल चलो। मैंने चारों बार यही कहा — सुबह चलेंगे। सच यह था कि मुझे सुबह यह भी नहीं पता था कि कहाँ जाना है। और सुबह उठा, तो पता चला कि पैर खुद स्कूल की तरफ़ मुड़ गया था।
तुम सोच रहे होगे कि स्कूल क्यों? भाई, अगर एक छत को रात में दो आदमी चढ़कर तोड़ते हैं, और उस छत के नीचे पैंतीस साल से बच्चे पढ़ते हैं, तो जाना तो पड़ेगा ना। मेरे पास और कोई काम भी नहीं था, सच बता दूँ तो। दुकान का शटर खोलता, तो वही उलझन दिमाग़ में बैठी रहती। सो मैंने सोचा, चलकर देख आते हैं कि जिस छत के लिए साहब नई इमारत का सपना दिखा रहे हैं, वो छत कैसी दिखती है।
रास्ते में टिंकू मिल गया। बस्ता कंधे पर था, पर उसकी शक्ल बता रही थी कि उसे भी पता है कि आज स्कूल में वो नहीं होगा जो रोज़ होता है।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मास्टर जी बोल रहे थे कि आज छत बंद है, तो बच्चे पेड़ के नीचे बैठेंगे।”
“तो तू क्यों आया?”
“देखने।”
“क्या देखने?”
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