The Mysterious Bell – Chapter 216
शबनम आपा अपनी पीतल की थाली लेकर आईं और उसे चबूतरी के किनारे रख दिया। थाली खाली थी। मैंने पूछा, “आपा, ये किसलिए?”
“जो आज सच बोलेगा,” उन्होंने कहा, “उसके लिए चाय। और जो झूठ बोलेगा, उसके लिए भी। क्योंकि झूठ बोलने वाले को सबसे ज़्यादा चाय की ज़रूरत होती है।”
मीरा दो बैटरी, पुराना फ़ोन और कैमरा लेकर आई। उसने कैमरा ऊपर उठाया, फिर धीरे से नीचे कर दिया।
“आज नहीं,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि आज कोई कैमरे के लिए सच नहीं बोलेगा। आज सच बोलेगा तो अपने लिए। बाद में जो रिकॉर्ड करना है, कर लेना।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो पत्रकारों की आँखों में नहीं होती — शुक्र। फिर उसने कैमरा बैग में रख दिया और बोली, “ठीक है। आज मैं सिर्फ़ मीरा हूँ।”
दुबे अंकल अपनी नीली शर्ट में आए, हाथ में पीला लिफ़ाफ़ा और अपनी पुरानी नीली कवर वाली कॉपी। वो चबूतरी पर नहीं बैठे। वो पीपल के तने से टेक लगाकर खड़े हो गए, जैसे कोई गवाह कटघरे में खड़ा होता है।
भोला भाई अपनी दुकान से पटिया उठाकर लाए और उसे चबूतरी के पास रखकर बैठ गए। रज्जो बाई अपना आधा खुला बैग कंधे पर लटकाए कोने में खड़ी थीं। सनी उनके पीछे था, हाथ जेब में, आँखें नीची।
चारों जासूस अपनी जगह पर थे। सानिया स्कूल की तरफ़ वाली गली के मोड़ पर, चिंटू गुमटी के पीछे, गुड्डू थाने की दीवार के पास, रफ़ीक़ नाली के पुल पर। मैंने उन्हें चार नहीं, चार सौ नज़रों से देखने का काम दिया था।
नौ बजकर पचपन मिनट पर रणवीर भारद्वाज आया।
वो पैदल आया। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, और वही चमकते जूते। कोई गाड़ी नहीं, कोई बबलू नहीं, कोई लाठी वाला नहीं। अकेला। वो पीपल के नीचे आया और सबको देखकर हल्का सिर झुकाया। फिर चबूतरी के उस सिरे पर बैठ गया जहाँ कोई नहीं बैठा था — जैसे वो जानता हो कि आज उसके लिए जगह खाली रखी गई है।
“नमस्ते,” उसने कहा। “मैंने वादा किया था। आ गया।”
किसी ने जवाब नहीं दिया। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। दूर कहीं किसी ने साइकिल की घंटी बजाई और मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया। घंटी चुप थी।
मैं खड़ा हुआ। मेरे पीछे पापा खड़े थे — चुप, सीधे, बिना औज़ार।
“आपने कहा था,” मैंने शुरू किया, “कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। तो आज सिर्फ़ बात होगी। और बात का एक ही नियम है — जो बोले, वो अपनी तरफ़ से बोले। किसी और की तरफ़ से नहीं।”
रणवीर मुस्कुराया। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने उसे बहुत पहले रट लिया हो।
“अच्छा नियम है,” उसने कहा। “मैं पहला बोलूँ?”
“बोलिए।”
वो उठा। एक हाथ जेब में, दूसरा हवा में — जैसे कोई सभा में भाषण दे रहा हो।
“मैं यहाँ किसी से लड़ने नहीं आया,” उसने कहा। “मैं यहाँ इसलिए आया हूँ क्योंकि मुझे इस गली से लगाव है। मेरे बुज़ुर्गों का इस गली से नाता रहा है। और आज मैं साफ़ कहना चाहता हूँ — मुझे यहाँ कुछ चाहिए, पर वो ज़मीन नहीं है।”
चबूतरी पर एक हल्की सी सरसराहट हुई। बंसी बाबा ने रहमत बाबा की तरफ़ देखा। हाफ़िज़ बाबा की तस्बीह रुक गई।
“मुझे यहाँ एक इंसान चाहिए,” रणवीर ने कहा, और उसने सीधे मेरी तरफ़ देखा। “इस लड़के में हुनर है। मैंने खुद देखा है। ऐसे हुनर को गली में सड़ना नहीं चाहिए। मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता हूँ — नौकरी, घर, इलाज, सब। मैंने उसे सब चीज़ें खुद अपनी मेज़ पर रखकर दिखाई थीं।”
“और बदले में?” उस्ताद अली बक्श की आवाज़ आई। वो अब तक चुप बैठे थे, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
रणवीर उनकी तरफ़ मुड़ा।
“बदले में कुछ नहीं, उस्ताद,” उसने कहा। “बस ये कि वो मेरी बात सुने।”
“बेटा,” उस्ताद ने कहा, बहुत धीमे से, “जो आदमी बदले में कुछ नहीं माँगता, वो सबसे बड़ा बदला माँगता है।”
चबूतरी पर कुछ लोग हँसे। हल्की हँसी, डर वाली हँसी। रणवीर की मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली।
“मैं आपकी बात समझ गया,” उसने कहा। “पर मैं अपनी बात पूरी कर लूँ।” उसने हाथ ऊपर उठाया और स्कूल की तरफ़ इशारा किया। “ये स्कूल। देखिए इसे। छत पर प्लास्टर उखड़ रहा है। दीवारें झुक रही हैं। मैंने तीन बार लिखकर दिया है कि इसे गिराकर नया बनवाया जाए। नई छत, नए कमरे, बच्चों के लिए बड़ा मैदान। मैं पैसा नहीं माँगता। मैं सिर्फ़ ये चाहता हूँ कि यहाँ के लोग मेरी बात सुनें।”
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा फैल गया। रणवीर आज किसी काग़ज़ की बात नहीं कर रहा था। वो स्कूल की बात कर रहा था। और जब कोई आदमी स्कूल की बात करे, तो गली के लोग सुनते हैं। बच्चों की बात पर कोई नहीं लड़ता।
“और ये ज़मीन का मामला —” भोला भाई ने कहना शुरू किया।
“ज़मीन का मामला मेरा नहीं है, भोला भाई,” रणवीर ने कहा, इतनी मुलायम आवाज़ में कि सच लगे। “ज़मीन काग़ज़ देखती है। मैं तो बस एक आदमी हूँ जो बच्चों के लिए छत बनाना चाहता है।”
और तभी —
चटक।
आवाज़ स्कूल की तरफ़ से आई। ऐसी आवाज़ जैसे किसी कमरे में कोई भारी चीज़ अपनी जगह से खिसक गई हो। एक पल के लिए चबूतरी पर सब चुप हो गए। मैंने देखा कि रणवीर का हाथ जेब में था और उसकी आँखें स्कूल की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ थीं।
फिर स्कूल की छत से चीख आई।
“अरे — अरे —”
मैंने पलटकर देखा। छत के किनारे पर पतंग उड़ाने वाले बच्चे खड़े थे। दो-तीन। और उनके नीचे, छत के उस कोने से, प्लास्टर का एक बड़ा टुकड़ा धूल के साथ नीचे आ गिरा। आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने पीपल की जड़ पर पत्थर मार दिया हो।
और फिर मैंने देखा।
लोहे की सीढ़ी दीवार से टिकी थी, और उस पर चिंटू चढ़ा था। आधा चढ़ा — दो सीढ़ी ऊपर। वो घूमकर पतंग देख रहा था और उसका एक हाथ सीढ़ी से छूट चुका था। छत के कोने से प्लास्टर गिरा, सीढ़ी को हल्का धक्का लगा, और चिंटू का पैर फिसल गया।
मैंने सोचा नहीं। मेरे पैर अचानक खुद से दौड़ने लगे। मैंने शबनम आपा की थाली को पैर से खिसकते हुए देखा, मीरा के हाथ में बैटरी देखी, और उन चार कदमों में मुझे सिर्फ़ एक चीज़ दिख रही थी — तेरह साल का एक लड़का जो हवा में है और जिसके नीचे पत्थर का फ़र्श है।
मैंने सीढ़ी के पास पहुँचकर दोनों हाथ ऊपर उठाए।
उसका हाथ मेरे हाथ पर आया। वो मेरी बाँह में गिरा और मैंने उसे सीने से लगाकर घुमाया — मेरी कमर झुकी, मेरा घुटना फ़र्श से छू गया, और हम दोनों नीचे गिरे, पर हम दोनों एक साथ गिरे और मैं उसके नीचे रहा।
चिंटू मेरी छाती पर पड़ा था। उसकी साँस अटकी हुई थी। उसके हाथ मेरी कमीज़ को ऐसे पकड़े थे जैसे कोई डूबता आदमी रस्सी पकड़ता है।
“उस्ताद — उस्ताद —” वो हाँफ रहा था।
“साँस ले,” मैंने कहा। “धीरे। साँस ले। सब ठीक है।”
मेरी पीठ में दर्द उठा। मेरी कोहनी से खून की एक पतली लकीर निकली। पर वो चिंटू नहीं थी। उसके घुटने पर भी पुरानी पट्टी के ऊपर एक नई खरोंच आई थी, पर हड्डी सही थी।
गली के लोग दौड़कर आए। सानिया ने मेरी तरफ़ देखा और ज़ोर से रो पड़ी। गुड्डू ने “पानी लाओ” चिल्लाया। शबनम आपा अपनी चिमटी वहीं फ़र्श पर छोड़कर दौड़ीं और चिंटू का सिर थामकर उसे अपनी छाती से लगा लिया।
“अम्मी — अम्मी को मत बताना,” चिंटू ने कहा, और सब हँस पड़े, जबकि सानिया रो रही थी।
और तभी स्कूल की तरफ़ से स्कूल के प्रिंसिपल आते दिखे — चश्मा टेढ़ा, हाथ में कोई काग़ज़, पीछे-पीछे रमा मैडम।
रमा मैडम।
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