The Mysterious Bell – Chapter 215
पापा ने दरवाज़ा अंदर से बंद किया। कुंडी धीरे से चढ़ाई, जैसे कोई सोते हुए बच्चे के कमरे का दरवाज़ा बंद करता है। फिर वो मेज़ के पास आए, कुर्सी खींची और बैठ गए। सीधे। दोनों हाथ घुटनों पर। उनका सफ़ेद कुर्ता आज इस्त्री किया हुआ था, और यही सबसे अजीब बात थी। पच्चीस साल में मैंने उन्हें इस्त्री किया कुर्ता पहने शायद ही देखा हो।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया। टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था, आधा डरा हुआ, आधा यह सोचते हुए कि उसे अंदर रहना चाहिए या बाहर निकल जाना चाहिए।
“तू भी बैठ,” पापा ने उसे कहा।
टिंकू उसी पल फ़र्श पर बैठ गया, जैसे उसे कोई ईनाम मिल गया हो। उसने घुटनों को बाहों से पकड़ लिया और आँखें बड़ी करके पापा को देखने लगा।
पापा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, फिर मेरी आँखों में।
“वो जो घंटी ने कहा,” वो बोले, “कर्ज़ का। वो सच है।”
मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना ही सबसे अच्छा सवाल होता है। यह मैंने इन्हीं पिछले कुछ हफ़्तों में सीखा था, और आज पहली बार उसका फ़ायदा दिख रहा था।
“तेरे दादा जगदीश,” पापा ने कहा, और नाम लेते ही उनकी आवाज़ का पूरा तार बदल गया। “उनकी दुकान थी। यही दुकान। पर उन दिनों यहाँ साइकिल के पुर्ज़ों का काम नहीं, पीतल का काम होता था। घंटियाँ, लोटे, ताले, कुंडे। गली के बाहर वो बड़े कारीगर गिने जाते थे। मेरे पास उनकी एक पीतल की पट्टी आज भी है, जिस पर उनका नाम खुदा है। तूने उसे गड्ढे से निकाला था।”
“वो मुझे पता है,” मैंने कहा। “पट्टी मेरे पास है। और उसके छेद में गले की चाबी तीन चौथाई तक फिट होती है।”
पापा ने आँखें बंद कर लीं। जैसे कोई पुराना दर्द जान-बूझकर छुआ गया हो।
“चाबी उसी का है,” उन्होंने कहा। “वो चाबी उस दरवाज़े की है, जो इस घर में सबसे पुराना है। पीछे की तरफ़, जहाँ अलमारी है, उसके पीछे। तूने उस दरवाज़े को कभी खुला नहीं देखा, क्योंकि वो मेरे जीते-जी खुला नहीं।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए। गले में चाबी पंद्रह-सोलह साल से लटक रही थी। मैंने उसे हमेशा एक पुरानी चीज़ समझा था, जो पापा ने शायद इसलिए दी थी कि बेटे को कुछ देना था। आज पता चल रहा था कि वो चाबी नहीं, एक इंतज़ार थी।
“उस दरवाज़े के पीछे क्या है?” मैंने पूछा।
“मुझे पूरा नहीं पता।”
“पापा —”
“सुन ले पहले,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो बहुत कम आती थी। ज़ोर नहीं था, पर मना करने का हक़ था। “मुझे पूरा नहीं पता। मैं तुझे झूठ नहीं बोलूँगा, न आज, न आगे। जितना पता है, वो ये है — दादा ने एक बार किसी से पैसा लिया था। उस ज़माने में। किसी काम के लिए, किसी मुसीबत के लिए। और वो पैसा लौटा नहीं पाया। उस काग़ज़ पर उनका अंगूठा था। और उस काग़ज़ की एक नक़ल आज भी उस बंद दरवाज़े के पीछे रखी है।”
टिंकू ने धीरे से पूछा, “तो कर्ज़ कितना है, चाचा?”
पापा ने उसकी तरफ़ देखा। टिंकू को वो ‘चाचा’ कहता था, और पापा उसे कभी नहीं टोकते थे।
“बेटा,” पापा ने कहा, “कुछ कर्ज़ पैसों में नहीं होते। ये वो कर्ज़ है जिसमें एक आदमी की इज़्ज़त गिरवी रखी गई हो। और जब इज़्ज़त गिरवी हो, तो हिसाब कभी पूरा नहीं होता।”
मैंने कुर्सी की पीठ पकड़ ली।
“रणवीर?” मैंने पूछा। “ये उसका कर्ज़ है?”
पापा ने सिर हिलाया — आधा हाँ, आधा नहीं।
“रणवीर का परिवार,” उन्होंने कहा। “आज जो गली में आया है, वो अकेला आदमी नहीं है। वो एक हिसाब लेकर आया है, और वो हिसाब उसके बुज़ुर्गों ने खोला था। जिस काग़ज़ पर दादा का अंगूठा था, उस काग़ज़ के नीचे के खाने में एक नाम लिखा था। और वो नाम आज भारद्वाज भवन की दीवारों पर लगी तस्वीरों में मुस्कुराता है।”
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैंने पहले महसूस नहीं किया था। अब तक मैं ये समझ रहा था कि रणवीर ने गली पर नज़र डाली है, क्योंकि गली की ज़मीन सस्ती है। अब पता चल रहा था कि वो नज़र नई नहीं थी। वो नज़र पच्चीस साल पुरानी थी, और शायद उससे भी पुरानी।
“तो इसका मतलब,” मैंने धीरे से कहा, “वो मेरे दादा से बदला लेने आया है?”
“नहीं,” पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ हो गई। “बदला नहीं। वसूली। बदले में आदमी को गुस्सा चाहिए। वसूली में सिर्फ़ काग़ज़ चाहिए। और उसके पास काग़ज़ है।”
टिंकू ने घुटने छोड़ दिए और सीधा होकर बैठ गया।
“तो फिर हम उस दरवाज़े को खोलेंगे,” उसने कहा, जैसे यह सबसे आसान बात हो। “चाबी तो उस्ताद के गले में है ही। खोलो, काग़ज़ निकालो, फाड़ दो, और —”
“और फिर?” मैंने कहा।
“फिर… फिर सब ठीक।”
“टिंकू, अगर काग़ज़ फाड़ने से कर्ज़ मिटता, तो दुनिया में कोई कर्ज़दार न बचता।”
वो चुप हो गया। मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“अभी नहीं,” पापा ने कहा, जैसे उन्होंने मेरा सवाल हवा में पढ़ लिया हो। “अभी दस बजे वाली सभा। पहले चबूतरी। बाद में ताला।”
“पापा —”
“अंकुश।” उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे कोई औज़ार मेज़ पर रखता है। “अगर आज सुबह मैं चबूतरी पर नहीं पहुँचा, तो फिर कभी नहीं पहुँचूँगा। तेरे दादा ने कभी सबके सामने नहीं खोला। मैंने पाँच साल पहले एक दफ़्तर में अंगूठा लगाकर चुप्पी खरीदी थी। आज मैं वो चुप्पी वापस करने जा रहा हूँ। उसके बाद अगर तेरे हिस्से का ताला खुलना है, तो खुलेगा। पहले इंसान, फिर काग़ज़।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। आज सुबह उन्होंने अपने औज़ार नहीं उठाए थे। ट्रंक वैसे ही बंद पड़ा था। सिर्फ़ चश्मा था, कान पर टेप से बँधा हुआ, और सफ़ेद कुर्ता।
“ठीक है,” मैंने कहा। “पहले इंसान।”
पापा उठे। दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। फिर रुके और बिना मुड़े बोले, “अंकुश, एक बात।”
“हाँ।”
“आज चबूतरी पर जो भी हो, मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा। पर मैं तेरी जगह नहीं बोलूँगा। जो बोलना है, तू बोलेगा। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा जो मेरा है।”
“यही तो चाहिए,” मैंने कहा।
वो बाहर निकले। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और फुसफुसाया, “उस्ताद, आपके दादा की दुकान थी ये?”
“लगता है थी।”
“तो फिर आप मालिक हो।”
“टिंकू, मालिक वो होता है जिसके पास काग़ज़ होता है। मेरे पास आज भी एक घंटी है, एक चाबी है, और एक गली है। देखते हैं इन तीनों से कितना काम निकलता है।”
पौने दस बजे गली भर गई थी।
पीपल के नीचे चबूतरी पर कोई माइक नहीं था, कोई बैनर नहीं था, कोई कुर्सी नहीं थी। बस वही पुरानी चबूतरी, जिस पर पचास साल से बुज़ुर्ग बैठते आ रहे थे। आज उस पर बुज़ुर्ग भी बैठे थे और जवान भी खड़े थे। बंसी बाबा एक कोने पर, रहमत बाबा दूसरे पर — अब दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे, और यही सबसे बड़ी खबर थी। हाफ़िज़ निसार अहमद अपनी तस्बीह लिए, पंडित ब्रजकिशोर अपना गमछा संभाले। बाबा कलीम, पंडित रामदीन, इब्राहीम चाचा, बृजमोहन बाबा, उस्ताद तुफ़ैल, मास्टर प्यारेलाल, बाबा नूर मोहम्मद, लाला रामकिशन, बाबा शरीफ़, लाला बसंतलाल, बाबा हाशिम, काका हरनाम, बाबा क़ादिर, लाला बद्रीप्रसाद, बाबा इक़बाल, लाला बद्रीनाथ, मक़बूल चाचा, रामस्वरूप काका।
मैंने उन्हें देखा और मेरे अंदर एक अजीब सी बात हुई। ये सब वही लोग थे जिनके बीच मैंने पिछले कुछ हफ़्तों में सोलह सुलहें जोड़ी थीं। सोलह। हर एक के पीछे एक कहानी थी, एक ज़िद, एक चुप्पी। आज वो सब एक ही जगह बैठे थे, और किसी ने किसी से नहीं कहा कि मुझे यहाँ क्यों बुलाया।
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