The Mysterious Bell – Chapter 214
"क्योंकि सभा में बैठने से पहले मुझे एक आदमी से एक बात कहनी है जो मुझे पसंद है," उसने कहा। "और तू वो आदमी है। तुझमें एक बात है जो मुझमें नहीं थी। तेरे पास एक ज़िद है। मेरे पास भी थी। तीस साल की उम्र में मैंने एक कमरे में बैठकर तय किया था कि मैं इस शहर में एक इमारत बनाऊँगा जिसके नीचे मेरा नाम होगा। और आज इस शहर में चालीस और इमारतें हैं, और मुझे किसी की छत याद नहीं।"
उसकी आवाज़ में वो थकान थी जो सुबह उसकी आँखों में दिखी थी। मैंने सोचा, आदमी अगर इतना बड़ा हो जाए कि अपनी ही छतें याद न रखे, तो वो किसके लिए बड़ा हो रहा है।
"अब आख़िरी सौदा," उसने कहा और सीधा मेरी तरफ़ देखा। "एक ही बार। आज दस बजे से पहले। तू मुझे वो घंटी दे दे जो तेरी जेब में है। बस घंटी। कोई काग़ज़ नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई गवाह नहीं। मुझे सिर्फ़ वो चाहिए।"
दुकान में पंखा धीरे चल रहा था और मुझे लगा जैसे आवाज़ें सब चली गई हों।
"बदले में," वो बोला, "जो भी है तेरे सामने, सब मैं हटा दूँगा। अस्पताल बच जाएगा। बेचने की बात खत्म। पीछे का प्लॉट खाली रहेगा। तेरी माँ का इलाज पूरा — जो जाँच बाकी है, जो दवा बाकी है, जो डॉक्टर बाहर से बुलाना पड़े, सब मेरे खाते पर। तेरे पापा के नाम पर जो कोई काग़ज़ है, वो मैं खुद जलाकर तेरे सामने राख कर दूँगा। और ये दुकान — ये पुरानी टपरिया नहीं, नई। पक्की, दो मंज़िल की, ऊपर तेरा कमरा, नीचे तेरा काम। अपने नाम पर। बिना किसी का अंगूठा, बिना किसी का हस्ताक्षर।"
उसने रुककर मेरी आँखें देखीं।
"सिर्फ़ एक घंटी के बदले," उसने कहा। "जो तेरी नहीं है। जो तेरे दादा की थी। जो तेरे पापा की थी। जो एक दिन किसी और की भी रहेगी। तू उसे अपनी क्यों समझ रहा है?"
मैंने अपने हाथ मेज़ पर रखे रखे देखे। उन पर ग्रीस के पुराने निशान थे। मैंने सोचा — अगर मैं हाँ कह दूँ, तो माँ की जाँच कल ही हो जाएगी। काजल को रोना नहीं पड़ेगा। पापा को दस बजे चबूतरी पर खड़े होकर कुछ बोलना नहीं पड़ेगा। पूरी गली को कुछ सहना नहीं पड़ेगा। एक घंटी। बस एक छोटी सी पीतल की चीज़।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी बिल्कुल चुप थी। न हिली, न बोली। जैसे वो भी सुनना चाहती हो कि मैं क्या कहता हूँ।
"भाई साहब," मैंने कहा और अपनी आवाज़ जितनी नरम हो सकती थी, उतनी नरम रखी। "आपने बहुत अच्छा सौदा रखा है। इतना अच्छा कि अगर मैं ईमानदार न होता, तो हाथ बढ़ा देता।"
"तो हाथ बढ़ा दे।"
"नहीं," मैंने कहा।
उसके चेहरे पर मुस्कान वही रही। मुझे लगा वो मुस्कुराहट उसके चेहरे पर चिपकी हुई है, जैसे दीवार पर कोई पुराना पोस्टर — नीचे से दीवार गल गई हो, पर पोस्टर हटता नहीं।
"ये घंटी बिकने की चीज़ नहीं है," मैंने कहा। "ये मेरे पास इसलिए नहीं है कि मैं इसे संभालकर रखूँ। ये मेरे पास इसलिए है कि लोग अपना दर्द लेकर आते हैं और ये सुनती है। जिस दिन मैं इसे किसी सौदे में लगा दूँगा, उस दिन इससे सिर्फ़ आवाज़ निकलेगी, बात नहीं। और आपको सच बता दूँ — मैं अपनी माँ के इलाज के लिए, अपने पापा की इज़्ज़त के लिए, और इस गली के हर उस आदमी के दर्द के लिए, जिसने मुझ पर भरोसा किया है, किसी से एक पैसा भी नहीं लूँगा। न आपसे, न किसी और से।"
"तो तेरी माँ की दवा?"
"दवा का इंतज़ाम मैं करूँगा," मैंने कहा। "कर्ज़ लेकर, काम करके, जो भी हो। पर जिस हाथ से मैं दवा लाऊँगा, वो हाथ साफ़ रहेगा। जिस दिन मैं अपनी माँ को ये कहने लगूँ कि तेरा इलाज इस शर्त पर हुआ कि मैं किसी का दर्द बेच आया, उस दिन मेरी माँ मुझे अपने पास नहीं बैठने देगी। और मुझे पता है वो ऐसा करेगी, क्योंकि उसने मुझे यही सिखाया है।"
रणवीर भारद्वाज एक पल चुप रहा।
फिर उसने चाय उठाई। एक घूँट लिया। बहुत छोटा घूँट। और मैंने देखा कि उसके हाथ में कंपन नहीं था, कुछ भी नहीं था — जैसे उसने अंदर ही अंदर कोई दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
"अच्छी चाय है," उसने कहा। "तेरी माँ की चाय जैसी। मैंने एक बार पंद्रह साल पहले तेरे घर की चाय पी थी। तेरे पापा ने बनाई थी। उसमें अदरक ज़्यादा थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो उठा। कुर्सी पीछे सरकी और चरचराई। उसने अपना कुर्ता सीधा किया और मुझे देखने लगा — और अब उसकी आँखों में वो मुस्कान नहीं थी, बस ठंडक थी। साफ़, सपाट, किसी पत्थर की तरह। ऐसी ठंडक जो कुछ कहती नहीं, बस रहती है।
"मैं दस बजे चबूतरी पर बैठूँगा," उसने कहा। "मैं वादा निभाता हूँ। जैसा मैंने कहा था — कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। तू भी आ।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका। जैसे कुछ और कहना बाकी हो। उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा — और उसकी नज़र मेरी जेब पर गई। सिर्फ़ एक पल। फिर वो बोला, "तेरी घंटी की आवाज़ बहुत पुरानी है, अंकुश। मैंने वो आवाज़ पच्चीस साल पहले सुनी थी। बिल्कुल किसी पुराने कर्ज़ की तरह बजती है। और कर्ज़ वो नहीं चुकाते जो लेते हैं। कर्ज़ वो चुकाते हैं जो उसमें फँस जाते हैं।"
फिर वो निकला।
मैं दरवाज़े तक गया।
बाहर गली में लोग खड़े थे। शबनम आपा अपनी गुमटी के बाहर, हाथ में चिमटी पकड़े। भोला भाई अपनी दुकान की पटिया से टेक लगाए। मीरा कोने पर, कैमरा नीचे लटकाए, आँखें सीधी गाड़ी पर। बबलू गाड़ी के पास खड़ा था, और उसके हाथ में आज पानदान नहीं था — वो उँगलियाँ मसल रहा था। चारों जासूस एक-एक कोने पर, बिल्कुल वैसे जैसे मैंने उन्हें काम दिया था।
रणवीर गाड़ी तक पैदल गया। रास्ते में उसने शबनम आपा की तरफ़ देखा और हल्का सिर झुकाया, जैसे कोई पुराना ग्राहक गुमटी वाले को सलाम करता हो। शबनम आपा ने चिमटी उठाई भी नहीं। वो उसे इस तरह देख रही थीं जैसे कोई भड़की हुई चीज़ देख रही हों।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। वो बैठा। खिड़की से उसने मेरी तरफ़ देखा। बस एक बार। और फिर गाड़ी पीछे हटी, नाली के पुल पर चढ़ी, और गली के मुँह की तरफ़ मुड़ गई।
रफ़ीक़ ने गली के मुँह से दौड़कर आकर कहा, "उस्ताद, गाड़ी में कोई और नहीं था। ड्राइवर भी नहीं था। खुद ही चला गया।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे पीछे पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। सिर्फ़ मेरे चेहरे को देखा और बोले, "अंदर आ।"
मैं अंदर आया। और तभी —
टिंग।
घंटी बजी।
एक बार। साफ़। तेज़। अपने आप।
मेरे दोनों हाथ बिल्कुल मेज़ पर रखे थे। मैंने उन्हें उठते देखा। मेरी जेब में कोई हाथ नहीं था। पीछे वाले कमरे की तरफ़ से टिंकू निकला — उसका चेहरा सफ़ेद था और उसकी आवाज़ फँसी हुई थी।
"उस्ताद," उसने कहा। "उस्ताद, हाथ तो जेब में था ही नहीं। मैं देख रहा था। आपके दोनों हाथ मेज़ पर थे।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो फिर किसने बजाई?"
पापा ने दरवाज़ा बंद किया। धीरे, बिना आवाज़। उन्होंने पीछे वाले बल्ब की तरफ़ देखा और फिर मेरी जेब की तरफ़।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी बाहर निकाली। वो मेरी हथेली पर ठंडी थी — इतनी ठंडी कि एक पल को लगा कि किसी ने उसे बर्फ में रखा था। उसका रंग गहरा था, फूल खुदा हुआ था, और उसकी सतह पर उँगली रखने पर एक झुरझुरी उँगली से सीधे कंधे तक गई।
और फिर घंटी बोली।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि जैसे कहीं दूर किसी बंद कमरे से आ रही हो। पर हर शब्द साफ़ था।
"यह कर्ज़ तुम्हारा नहीं है। यह तुम्हारे दादा का है।"
मैंने घंटी को दोनों हाथों में पकड़ लिया।
"और कर्ज़दार," घंटी ने कहा, "आज गली में आया है।"
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