The Mysterious Bell – Chapter 213
मैं दुकान के अंदर गया। उसने अंदर कदम रखा। फिर वो मेज़ के सामने रुका और मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
और तब उसने वो कहा जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।
"सभा से पहले तुमसे अकेले बात करनी है," उसने कहा। "और यह बात सिर्फ़ तुम्हारे कान की है।"
मैंने गले से चाबी को छुआ। मेरी जेब में घंटी ने हल्का सा कंपन किया, जैसे किसी ने सोते हुए करवट ली हो। और मैंने रणवीर भारद्वाज की आँखों में देखा — वहाँ न मुस्कान थी, न भूख, न गुस्सा। सिर्फ़ एक चीज़ थी, और वो थी थकान।
बड़ी, पुरानी, अंदर तक उतरी हुई थकान।
॥
"अंदर आइए," मैंने कहा और खुद पहले अंदर गया।
दुकान के अंदर वैसी ही हवा थी जैसी रोज़ होती है — ग्रीस की, पुराने रबर की, और उस चाय की जो सुबह टिंकू बनाकर भूल जाता है। कोने में औज़ारों का ट्रंक खुला पड़ा था। दीवार पर चेन टँगी थी, जिसकी कड़ियाँ हवा से भी नहीं हिलतीं। मेज़ पर पुराना रेडियो था, वही जो एक ग्राहक छोड़ गया था और जिसे मैंने एक दिन गुस्से में पटककर तोड़ दिया था। उसका एक कोना अब भी टूटा पड़ा है। मैंने उसे नहीं जोड़ा। कभी-कभी लगता है कुछ चीज़ें टूटी ही रहनी चाहिए, ताकि आदमी को याद रहे कि गुस्सा क्या करवाता है।
रणवीर भारद्वाज अंदर आया और रुक गया। उसने पूरी दुकान को एक बार में देखा, धीरे-धीरे, जैसे कोई काग़ज़ पढ़ रहा हो। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और ट्रंक से एक रिंच उठाई।
"ये नई है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "कल ही आई है।"
"महँगी होगी।"
"महीने भर की कमाई से आई है।"
उसने रिंच को उँगलियों में घुमाया, जैसे कोई पुराना सिक्का घुमाता है। फिर उसने उसे वापस उसी जगह रख दिया, बिल्कुल सीधा, जैसे हमेशा वहीं रहती थी। उसके बाद उसने पेचकस उठाया, फिर प्लायर, फिर छोटा हथौड़ा। हर औज़ार को छूकर वापस रख दिया। जैसे कोई अजायबघर में चल रहा हो और सोच रहा हो कि कौन सी चीज़ कितने की है।
"तेरे औज़ार साफ़ हैं," उसने कहा। "और तेरी मेज़ पर धूल नहीं है। ये दो चीज़ें बताती हैं कि आदमी काम से प्यार करता है, न कि पैसे से।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मुझे तेरा हुनर पसंद है, अंकुश," उसने कहा और मेज़ पर हाथ रखकर मेरी तरफ़ देखा। "सच में पसंद है। तू पच्चीस साल का भी नहीं है और तेरे हाथ ऐसे हैं जैसे पचास साल का कारीगर हो। ये हुनर बेकार पड़ा है इस गली में।"
"हुनर बेकार नहीं पड़ा," मैंने कहा। "यहाँ लोग साइकिल लाते हैं, मैं ठीक करता हूँ, वो जाते हैं। बस यही है।"
"बस यही है?" उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया। "हुनर की भी एक कीमत होती है, अंकुश। और तू उसे खुद तय नहीं कर रहा। कोई और तय कर रहा है। वो आदमी जो तेरे दरवाज़े के बाहर खड़ा है और तुझे कहता है कि भैया टूट गया है। आज वही तय करता है कि तेरे हाथ कितने का हैं।"
"आप ठीक कह रहे हैं," मैंने कहा। "पर मेरे हाथ किसी कीमत में नहीं बिके, इसीलिए उनकी कीमत है।"
उसने हल्की सी हँसी दी। ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक नहीं, सिर्फ़ आदत थी।
फिर उसने अपना दायाँ हाथ उठाया और मैंने देखा — उसकी छोटी उँगली में वो काली अंगूठी थी। पत्थर जैसी काली, बिना कोई नक्काशी। उसने उँगली मेज़ के किनारे पर टिकाई और उसके नाखून के नीचे से एक काली बूँद फ़र्श पर गिरी। छोटी, ऐसी जैसे स्याही हो। उसने जेब से सफ़ेद रूमाल निकाला और ज़मीन पर रखकर उसे पैर से दबा दिया, जैसे चीज़ को नहीं, बात को छिपा रहा हो।
"अंकुश," वो बोला और उसकी आवाज़ का ढंग बदल गया — अब वहाँ वो बड़े साहब वाली मिठास नहीं थी। "मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ, और तू ये बात अच्छे से सुन ले। मुझे पता है कि तेरे पापा ने पाँच साल पहले मेरे काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया था।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जैसे साइकिल की चेन अचानक खिंच जाए। मैंने हाथ मेज़ के नीचे रख लिया, ताकि वो देख न सके कि मुट्ठी बँध गई है।
"मुझे पता है," वो बोला, "कि कैसे लगाया था। मुझे तारीख़ भी पता है, कमरा भी पता है, वो मेज़ भी पता है जिस पर काग़ज़ों का ढेर था। मुझे ये भी पता है कि उस काग़ज़ पर सिर्फ़ तेरे पापा का नाम नहीं था। उस पर तेरा नाम भी था, अंकुश।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और आज दस बजे," उसने धीरे से कहा, "जब तेरे पापा पीपल की चबूतरी पर खड़े होकर ये बात खुद बोलेंगे, तो पूरी गली को ये भी पता चलेगा कि उस काग़ज़ पर दो नाम थे, और दोनों में से एक पर अंगूठा नहीं लगा। बाकी लोग खुद सोच लेंगे कि क्यों नहीं लगा। किसी को कुछ कहना नहीं पड़ेगा। गली खुद बात बना लेगी। आज शाम तेरे पापा को कोई सीधा नहीं देखेगा, और तेरी दुकान पर कोई साइकिल नहीं लाएगा। और तू जानता है ये सबसे बड़ी बात क्या है? मुझे कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। सच खुद अपना काम कर देगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ कोई चमक नहीं थी। वो अपनी बात को इस तरह कह रहा था जैसे कोई किसान मौसम बता रहा हो।
और मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा कि एक पल को लगा कि मैं मेज़ उठाकर पटक दूँ। हाथ काँप रहा था। गले में चाबी अचानक भारी लगने लगी। मुझे वो रात याद आई जब मैंने वो रेडियो तोड़ा था — कितना आसान था, बस एक झटका और चीज़ टुकड़े-टुकड़े। और कितना मुश्किल था बाद में उसे उस ग्राहक के सामने खड़े होकर झेलना।
मैंने एक लंबी साँस ली। उसने सुना। वो बैठा नहीं, खड़ा रहा और मेरी तरफ़ देखता रहा।
"जो सच है," मैंने कहा और मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी सपाट लगी, "वो आज दस बजे पापा खुद बोलेंगे। मैं उनके लिए नहीं बोलूँगा, और आपके लिए भी नहीं बोलूँगा। न उसे छिपाया जाएगा, न उसे मीठा बनाकर परोसा जाएगा। जो हुआ, हुआ। गली को जो सोचना है, सोचे। पर मैं आपको एक बात साफ़ बता दूँ, भाई साहब — गली में जो आदमी सच छिपाकर बैठा है, वो मेरे पापा नहीं हैं।"
उसके चेहरे पर कुछ हिला नहीं।
"बहुत अच्छा," उसने कहा। "सच बोलने वाले बहुत पैदा होते हैं, अंकुश। ज़िंदा रहने वाले कम होते हैं।"
उसने कुर्सी खींची और बैठ गया, ऐसे जैसे ये उसकी दुकान हो। फिर उसने मेज़ पर अपनी दोनों हाथें खोलकर रख दीं, हथेलियाँ नीचे की तरफ़।
"एक चाय हो जाए," उसने कहा।
मुझे उस्ताद की तीन शर्तें याद आईं। पहली — पहले कुछ माँगना नहीं। दूसरी — साहब से कुछ लेना नहीं। तीसरी — चाय देने से पहले दोनों हाथ खुले मेज़ पर रखना।
मैंने पीछे वाले कमरे से स्टोव निकाला, केतली चढ़ाई और अपने दोनों हाथ मेज़ पर खोलकर रख दिए — बिल्कुल उसके सामने, बिल्कुल उसकी तरह। हथेलियाँ नीचे, उँगलियाँ अलग-अलग, कोई मुट्ठी नहीं, कोई छिपी चीज़ नहीं।
वो मेरे हाथों को देखने लगा। फिर बोला, "कितने साल से ये ग्रीस इन पर है?"
"सोलह की उम्र से।"
"और कोई चीज़ नहीं पकड़ी?"
"पकड़ी थी," मैंने कहा। "एक बार एक रेडियो पटका था। उस दिन के बाद से सिर्फ़ औज़ार पकड़ता हूँ।"
उसने सिर हिलाया। चाय आई, मैंने उसके सामने रख दी और अपने हाथ फिर मेज़ पर रख दिए। उसने चाय उठाई भी नहीं। वो सिर्फ़ भाप को देखता रहा, जैसे उस भाप में कोई पुरानी तस्वीर दिख रही हो।
"तू सोच रहा होगा कि मैं आया क्यों," उसने कहा।
"सोच रहा हूँ कि आप आए क्यों," मैंने कहा।
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