The Mysterious Bell – Chapter 212
चारों के चेहरे गर्व से चमक उठे। चिंटू ने ट्रंक पर खड़े होकर सलाम किया और मैंने उसे नीचे उतारा।
फिर सब गए। मीरा सबसे आख़िर में गई, और दरवाज़े पर रुककर उसने कहा, "अंकुश, एक बात।"
"बोलो।"
"कल सुबह छह बजे मैं उसके दफ़्तर के बाहर खड़ी रहूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे देखना है कि कोई ऐसा आता है या नहीं जो उससे भी ऊपर हो।"
मैंने कुछ देर उसे देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "तुम अकेली मत जाना।"
"मैं अकेली जाऊँगी," उसने कहा। "पर ये बता — कल तू सभा में सबसे पहले क्या बोलेगा?"
"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "सच कहूँ तो मुझे डर है कि कहीं मैं गलत बोलकर सब बिगाड़ न दूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और थोड़ा मुस्कुराई।
"तू पहली बार सच बोला," उसने कहा और चली गई।
दरवाज़ा बंद होने के बाद कमरा खाली लगा। कमरा जब खाली होता है तब उसमें पुराने औज़ारों की गंध तेज़ हो जाती है। मैं चारपाई पर बैठ गया। मैंने ट्रंक से रोटी का टिफ़िन निकाला — माँ ने सुबह रखा था, मैंने खाया नहीं था। अब ठंडा हो चुका था। मैंने खोला और खाने लगा। ठंडी रोटी और आलू। तुम सोचोगे कि इतनी बड़ी रात में आदमी खाता क्यों है। पता नहीं। भूख नहीं लगी थी। बस मुँह में कुछ चाहिए था, ताकि अंदर का डर थोड़ा चुप हो जाए।
फिर मैंने गले से वो पुरानी चाबी निकाली। पापा ने पंद्रह सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है। अब मैं जानता हूँ कि ये उस बंद दरवाज़े की है जो घर में है और जो अब तक नहीं खुला। मैंने चाबी को हथेली में दबाया। मुझे लगा चाबी थोड़ी गरम है। शायद मेरी कल्पना।
मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल का रंग अब पहले जैसा नहीं, बस वैसा ही है जैसा तुम्हारी दादी के पुराने डिब्बे का होता है। मैंने उसे हल्का बजाया।
टन।
बहुत धीमी आवाज़। दुकान के पीछे, खाली कमरे में, वो आवाज़ किसी की साँस जैसी लगी।
"कल क्या होगा?" मैंने पूछा।
चुप्पी।
फिर आवाज़ आई, धीमी, टुकड़ों में, जैसे कोई पुराना रेडियो स्टेशन पकड़ रहा हो।
"जवाब काग़ज़ में नहीं।"
"तो कहाँ है?"
"तेरे पास।"
मैंने माथा खुजाया।
"घंटी, तू हमेशा ऐसा करती है। सीधी बात कर। कल सभा में क्या करना है?"
लंबी चुप्पी। इतनी लंबी कि मुझे लगा वो चली गई।
फिर उसने कहा, "जो देगा, वो लेगा भी।"
"मतलब?"
"जो देगा…"
वो दोहराया और चुप हो गई।
मैंने सिर हिलाया। मुझे समझ आ गई कि उस्ताद की चेतावनी और घंटी की बात एक ही चीज़ की दो तरफ़ हैं। रणवीर कल कुछ देने आएगा। और जो देता है, वो सामने वाले से कुछ लेता है। चाहे वो काग़ज़ हो, चाय हो, माफ़ी हो, या इलाज।
मैंने फिर पूछा, "और अंक?"
"एक सौ अठ्ठावन," उसने कहा, और फिर, जैसे अपने आप से, "बची उम्र।"
मैं हँसा।
"तू जब 'बची उम्र' बोलती है," मैंने कहा, "तो लगता है कोई डॉक्टर हो जिसके पास मरीज़ भी नहीं और कुर्सी भी नहीं।"
घंटी चुप रह गई। पर चुप होने से पहले उसमें एक हल्की सी गूँज बची रह गई, जैसे हँसी हो, बहुत दूर की।
रात ग्यारह बजे मैंने दुकान का बाहरी शटर उठाकर आधा गिराया और चारपाई पर लेट गया। नींद नहीं आई। मैं छत पर गया। दुकान के पीछे की छोटी छत, आधी ईंट आधी टीन, जहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, पत्थर की चबूतरी, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी की बंद लालटेन। सब सो रहे थे। सिर्फ़ दुबे अंकल की कुर्सी खाली पड़ी थी और उसके नीचे वो पुरानी ईंट का टुकड़ा था जिससे उन्होंने कुर्सी का हिलना बंद किया था।
मैंने आसमान देखा। मुझे कुछ नहीं दिखा, बस अंधेरा और थोड़ी धूल। मैंने सोचा कि कल सुबह पूरी गली एक साथ खड़ी होगी, और मुझे पता नहीं कि मैं उसमें कौन हूँ। मैं साइकिल मरम्मत करने वाला लड़का हूँ। मेरे हाथ में ग्रीस है, मेरी जेब में घंटी है, और मेरे पीछे एक गली है। यही मेरी पूरी ताक़त है। कोई जादू नहीं, कोई गाड़ी नहीं, कोई दफ़्तर नहीं। बस गली।
और मुझे पहली बार लगा कि यही काफ़ी है।
सुबह मैं साढ़े सात बजे उठा, क्योंकि नींद टूटी तो एक बात मुँह में थी और उसे बाहर निकालना ज़रूरी था। मैंने टब में हाथ धोया, चेहरा धोया, ट्रंक पर रखी नई रिंच उठाई और बिना सोचे शटर पूरा उठा दिया। गली में हवा थी, पीपल की पत्तियाँ सूखी थीं, दूर किसी ने नल खोला और पानी ईंटों पर गिरा। सब सामान्य था, और यही सबसे असामान्य बात थी।
आठ बजे बच्चे तितर-बितर हो गए। सानिया नल के पास बैठ गई, कुछ दूर, बांस की डोर लेकर जैसे पतंग ठीक कर रही हो। चिंटू और रफ़ीक़ दो टोकरियों के बीच, गुड्डू छत पर। मीरा छह बजे ही उसके दफ़्तर के बाहर खड़ी हो चुकी थी और मुझे उसका फ़ोन आया था, एक ही लाइन में — "बाहर खड़ी हूँ, कुछ नहीं दिखा, आगे देखती हूँ।"
पौने नौ बजे मैंने पापा को चाय दी। उन्होंने आज चश्मा ठीक से पहना था, कान पर टेप बदल दिया था, और सफ़ेद कुर्ता पहना था। वो कोई औज़ार नहीं लाए थे। यही उनका हथियार था।
"पापा," मैंने कहा, "आज दोपहर तक सब खत्म हो जाएगा।"
"कुछ खत्म नहीं होता," उन्होंने कहा। "कुछ जुड़ता है, कुछ टूटता है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गली के मुँह की तरफ़ से आवाज़ आई। धीमी आवाज़। किसी ने सड़क पर पत्थर से छोटी सी हलचल मचाई थी।
और फिर मैंने वो सफ़ेद गाड़ी देखी।
वो गली के मुँह पर नहीं रुकी। वो इस बार अंदर आई। धीरे, बिल्कुल धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी उतर रहा हो। गली इतनी चौड़ी नहीं है कि गाड़ी आराम से आए, पर वो आई। उसके पहिये नाली के पत्थर के पुल को पार करके चरचराए और फिर वो अंकुश की दुकान के सामने रुकी, सीधी मेरे बोर्ड के नीचे, जो टेढ़ा टँगा है।
सानिया ने नल के पास उठकर पानी की बाल्टी छोड़ दी। दूर से मैंने देखा कि उसने कुछ लिखना शुरू किया। छत पर गुड्डू अपना सिर नीचे झुकाकर देख रहा था।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला।
रणवीर भारद्वाज अकेला उतरा।
आज उसके साथ कोई नहीं था। न बबलू, न वकील, न कोई चुपचाप खड़ा आदमी। सिर्फ़ वो। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा। सफ़ेद चमकते जूते सड़क की धूल में पड़े और लगा जैसे धूल को उनसे शर्म आ गई हो। उसने अपने आगे का बटन बंद किया और गाड़ी की छत पर हल्का हाथ रखकर मेरी तरफ़ देखा।
फिर वो आया।
धीरे-धीरे, बिना जल्दी। दुकान की तीन सीढ़ियाँ उतरीं — चरचराती लकड़ी, आधी टूटी। वो उतरा और मेरे सामने खड़ा हो गया।
"सुबह की चाय?" उसने कहा।
उसकी आवाज़ शांत थी। कुछ ज़्यादा ही शांत, जैसे पिछली रात खुद उसने भी सो नहीं, ऐसी शांत।
"आपने कहा था चार बजे," मैंने कहा। "अब नौ से पहले कैसे?"
"समय बदल गया," उसने कहा।
"आपका या मेरा?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आसपास देखा — मेरी दुकान, टंकी, औज़ारों का ट्रंक, मेज़ पर रखा पुराना रेडियो, दीवार पर टँगी चेन। फिर उसकी नज़र पीपल की तरफ़ गई, जहाँ आज कुछ देर बाद दस बजे पूरी गली जुटनी थी, और वहाँ अभी खाली चबूतरी पड़ी थी, जैसे कोई खुला मंच बिना खिलाड़ी के।
"अंदर चलें?" उसने कहा।
मैंने बाहर देखा। पापा दरवाज़े के पीछे खड़े थे। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने बहुत हल्का सिर हिलाया — मतलब, चलो। बच्चों ने और मीरा ने जो कहा था, सब मेरे दिमाग़ में एक साथ चल रहा था। सफ़ेद गाड़ी से अकेला उतरा। कोई बाहर नहीं छोड़ा। यानी इस बार वो कुछ और लेकर आया है। शायद कोई डर नहीं, कोई धमकी नहीं। शायद एक बात।
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