The Mysterious Bell – Chapter 22
मैं मुस्कुराया। "अच्छा मैडम।"
वो मुस्कुराई नहीं। बस चली गई। कभी-कभी लोग मुस्कुराते नहीं, क्योंकि उनके मुँह में मुस्कुराहट फँस जाती है।
मैं दुकान पहुँचा तो टिंकू पहले से वहाँ था। बोर्ड उसने उतार लिया था और अपनी पट्टी बँधी उँगलियों से उस पर ज़ंग साफ़ कर रहा था। मुझे देखकर बोला, "उस्ताद, आज चाय आपकी तरफ़ से है। मैं दो घंटे से इसे रगड़ रहा हूँ।"
"रगड़ने से पेंट नहीं आता।"
"तो पेंट लाओ।"
"पैसे हैं नहीं।"
"तो रगड़ते रहो।"
मैंने उसका सिर पकड़कर हिलाया और औज़ार का डिब्बा खोला। दिन शुरू हो गया था, और मन कुछ हल्का लग रहा था, जैसे एक रात बीत जाने से चीज़ें वाकई थोड़ी ठीक हो जाती हों।
फिर मीरा आई।
वो गली में ऐसे घुसी जैसे कोई आँधी घुसे, बिना दरवाज़ा खटखटाए। कैमरा कंधे पर, बैग टूटा हुआ, बाल बिखरे और आँखों के नीचे काले घेरे — जैसे सारी रात किसी काग़ज़ के ऊपर झुकी रही हो।
मैंने मज़ाक किया, "मीरा जी, सुबह-सुबह चेहरा बता रहा है कि रात में भूत देखा है।"
वो नहीं हँसी।
उसने अपना बैग बेंच पर पटका और एक काग़ज़ निकालकर मेरे सामने फैला दिया।
"पढ़।"
"मैं इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ—"
"मैं पढ़ा देती हूँ।" उसने उँगली रखी। "इस गली की ज़मीन पिछले दो महीने में दो बार नाम बदल चुकी है। एक बार किसी के नाम पर, फिर किसी और के नाम पर। और दोनों बार तारीख़ इतनी आसान थी कि कोई स्कूल का बच्चा भी पकड़ ले।"
मैंने कहा, "तो?"
"तो ये काग़ज़ों की गड़बड़ नहीं है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये तैयारी है।"
उसने अपनी उँगली खिसकाई।
"यहाँ से पीपल का पेड़, यहाँ से पीछे का खाली प्लॉट, यहाँ से मुहाने का अस्पताल, और स्कूल की दीवार के पीछे वाली झुग्गी — तीनों एक ही सौदे में जुड़े हुए हैं। एक टुकड़ा। जैसे किसी ने तराज़ू पर नापकर काटा हो।"
मेरा हाथ औज़ार पर रुक गया।
उसने आवाज़ धीमी की, पर वो धीमी आवाज़ ज़्यादा चुभती है, ये मैं तब जाना जब वो बोली।
"और तुम्हारी दुकान का नंबर भी उसी सूची में है। सातवाँ।"
मैंने कहा, "मुझे पता है मेरी दुकान उस सूची में है। मैंने वो सूची देखी है।"
"तो तुम अब भी यहाँ बैठे हो? तुम अब भी इन लोगों को चाय पर बुलाकर, हँसी-मज़ाक करके, अपनी घंटी वाली बातें सुनाकर—"
"रुक।" मैंने कहा। "घंटी वाली बातें क्या मतलब?"
मीरा ने अपना होंठ काटा। ज़ाहिर था कि उसने कुछ ज़्यादा बोल दिया था, पर वो पीछे नहीं हटी। मीरा कभी पीछे नहीं हटती, यही उसकी सबसे अच्छी और सबसे ख़राब आदत है।
"मतलब ये कि तुम लोगों को जोड़ने की बातें करते हो।" उसने कहा। "तुम कहते हो — हम सब एक हैं, हम सब साथ हैं, सब ठीक हो जाएगा। और लोग? लोग सच में मानने लगते हैं। शबनम आपा ने कल रात अपनी बहन को फ़ोन किया। पंद्रह साल बाद। तुम्हें पता है? उसने मुझे बताया। वो रो रही थी, अंकुश। ख़ुशी से नहीं। डर से। क्योंकि उसे लगा कि अब कुछ बदल सकता है।"
मैं चुप रहा।
"और मैं तुमसे पूछती हूँ — किसके भरोसे?" उसने कहा। "तुम्हारे पास क्या है? कोई काग़ज़? कोई वकील? कोई पैसा? कुछ भी? तुम्हारे पास सिर्फ़ बातें हैं। और जब ये सौदा हो जाएगा, और ये गली गिर जाएगी, तो जिन लोगों को तुमने खड़ा किया है, वो और ज़ोर से गिरेंगे। क्योंकि जो ऊँचाई से गिरता है, वो सिर्फ़ हड्डी नहीं तोड़ता। वो भरोसा तोड़ता है।"
मैंने औज़ार रख दिया।
"तुम मुझे ठग समझती हो।"
वो एक पल रुकी।
"मैंने ये नहीं कहा।"
"कहने की ज़रूरत नहीं।" मैंने कहा। "मेले में तुमने मेरी फ़ोटो खींची, मुझे ठग कहकर माइक थमाया, और अब तुम सुबह-सुबह ये काग़ज़ लेकर आई हो, जैसे तुम मुझे पकड़ने आई हो। मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझ रही हो, मीरा।"
"तो तुम क्या हो?" उसने पूछा। "बता दो। क्योंकि मैं दो हफ़्ते से देख रही हूँ। तुम चार बच्चों को खबरें लाने भेजते हो। तुम एक बूढ़े दर्ज़ी की बंद दुकान के आगे खड़े रहते हो। तुम एक चायवाली को उसकी बहन से मिलाने की बात करते हो। किसी के पास कोई ताक़त नहीं है, कोई रास्ता नहीं है, और तुम सबको लड़ने के लिए तैयार कर रहे हो। ऐसा आदमी क्या कहलाता है? मुझे बताओ।"
मेरे भीतर कुछ तपक उठा।
वो तपक वो नहीं थी जो काग़ज़ों से आती है। वो वो थी जो तब आती है जब कोई इंसान तुम्हारे सबसे सच्चे हिस्से को उठाकर तुम्हारे मुँह पर पटक देता है और कहता है — देख, ये भी तो बेकार है।
मैंने कहा, "और तुम? तुम हर बात में सिर्फ़ गंदगी ढूँढती हो। किसी की नीयत में, किसी की मेहनत में, किसी की हँसी में भी। शायद इसीलिए तुम्हारा कोई भरोसा नहीं करता।"
मैंने ये बात कही और उसी वक़्त जान गया कि मैंने ग़लत कही।
पर बोला हुआ शब्द वापस नहीं आता। वो हवा में लटक जाता है और वहीं रहता है, तुम्हारे और सामने वाले के बीच, एक टूटे हुए तार की तरह।
मीरा का चेहरा बदला।
एक पल के लिए। सिर्फ़ एक पल। उसकी आँखों में कुछ ऐसा खुला जो वो हमेशा बंद रखती है — जैसे किसी ने कमरे में जलती हुई माचिस डाल दी हो और वो भीतर तक देख लिया हो।
फिर वो बंद हो गया।
उसने अपना काग़ज़ उठाया। तह किया। बड़े ध्यान से बैग में रखा, जैसे उस काग़ज़ का कोई कसूर हो। और बिना मेरी तरफ़ देखे बोली, "ठीक है। मेरा काम हो गया।"
"मीरा—"
"तुम्हारी गली। तुम्हारे लोग। तुम्हारी बातें।" उसने कंधे पर कैमरा सँभाला। "मुझे क्या। मैं तो सिर्फ़ खबर ढूँढती हूँ। और तुमने अभी-अभी बता दिया कि मैं क्या ढूँढती हूँ।"
वो मुड़ी और चली गई।
उसका बैग बेंच से टकराया। एक पें उससे छूटकर धूल में गिरी और वो नहीं रुकी। मैंने उसे उठाना चाहा, पर टिंकू ने पहले उठा लिया। वो उसे लेकर दौड़ा, "दीदी! दीदी, आपकी पेन!"
मीरा ने रुककर पेन लिया। टिंकू के सिर पर हाथ रखा। और फिर आगे बढ़ गई। पर जाते वक़्त उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, और यही सबसे ज़्यादा बोल गया।
टिंकू लौटा। बोला, "उस्ताद, उनकी आँखें…"
"चाय बना।"
"उस्ताद—"
"टिंकू। चाय।"
वो चला गया। मैं बेंच पर बैठा रहा। मेरे हाथ पर ग्रीस लगी थी और मुझे उसकी खबर नहीं थी। मैं सोच रहा था कि इंसान जब किसी को चोट पहुँचाता है, तो सबसे पहले किस चीज़ का बहाना बनाता है? अपनी थकान का। मैं भी थका था। रात भर सोया नहीं था। माँ की खाँसी सुनकर उठा था। और मैंने उसे वो बात कह दी जो किसी को नहीं कहनी चाहिए थी।
तभी मुझे आवाज़ आई।
टिक। टिक। टिक।
मैंने सिर उठाया।
गली के उस पार, उस्ताद अली बक्श की दुकान का दरवाज़ा खुला था।
कई दिनों से वो बंद था। ताला लगा था, धूल जमी थी, और मैंने सोचा था कि उस्ताद शायद कहीं बाहर गए हैं। पर आज दरवाज़ा खुला था, और भीतर से उनकी पुरानी सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी।
टिक। टिक। टिक।
वो आवाज़ गली की सबसे पुरानी आवाज़ है। मैं बच्चा था जब पहली बार सुनी थी। उस्ताद बैठे रहते हैं, पैर से पेडल दबाते हैं, और सुई ऊपर-नीचे होती रहती है, जैसे कोई दिल धड़क रहा हो।
मैंने बिना सोचे अपनी जेब से घंटी निकाली।
मुझे नहीं पता क्यों निकाली। शायद इसलिए कि जब मन भारी होता है, तो हाथ किसी पुरानी चीज़ को पकड़ना चाहता है। शायद इसलिए कि मैं मीरा की बातों से जूझ रहा था और मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो मुझसे बहस करे।
मैंने घंटी दबा दी।
टन।
छोटी सी आवाज़। हल्की। घंटी बोली नहीं। बस बजी।
और उस पार, उस्ताद अली बक्श रुक गए।
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