The Mysterious Bell – Chapter 21
अस्पताल। वही अस्पताल जहाँ माँ का इलाज चल रहा है। वही अस्पताल जिसके लिए डॉक्टर इसरानी ने कहा था — बस अस्पताल बचा रहे।
मैंने बच्चों को देखा। चारों खिड़की की जाली से झाँक रहे थे, और उनके चेहरे पर वो भावना थी जो बड़ों के चेहरे पर होनी चाहिए थी — डर, और साथ में उत्साह। क्योंकि बच्चे जब कोई खबर लाते हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने दुनिया को बदल दिया। और सच कहूँ तो, कई बार वो सच में बदल देते हैं।
"तुम चारों सीधे घर जाओ।" मैंने कहा। "किसी को कुछ मत बताना।"
"उस्ताद —"
"एक बात।" मैंने कहा। "ये अंगूठे वाली बात तुमने किसी को बताई?"
"नहीं उस्ताद।" सानिया ने कहा। "हमने सोचा, पहले तुम्हें बताएँ।"
"अच्छा किया।"
वो चारों उतर गए, और खिड़की फिर खाली हो गई।
मैं कमरे में अकेला था। फिर मेरी नज़र ट्रंक के पास पड़ी घंटी पर गई। वो वहीं पड़ी थी, पीतल का रंग बल्ब की रोशनी में और गहरा लग रहा था।
मैं उठा। उसे उठाया। मुट्ठी में पकड़ा।
"सुन।" मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ गुस्से से नहीं, थकान से भरी थी। "मैं आज सुबह सोच रहा था कि मैं सब सँभाल लूँगा। माँ की बीमारी, पापा की चुप्पी, दुकान, काग़ज़, बबलू, वो मीठी आवाज़ वाला आदमी — सब। और अब शाम को मुझे लग रहा है कि मैं सिर्फ़ एक अंधेरे कुएँ में गोली चला रहा हूँ।"
मैंने घंटी को ऊपर उठाया, जैसे किसी से सीधे बात कर रहा होऊँ।
"तू क्यों चुप है? जब मैंने पापा पर चिल्लाया, तब तू चुप रही। जब मैंने बेकार रेडियो तोड़ा, तब तू चुप रही। तुझे क्या लगता है, मैं ग़लत कर रहा हूँ? मुझे गुस्सा नहीं आना चाहिए था? मेरे पापा के नाम के आगे किसी ने लाल स्याही का अँगूठा लगाया है, और तू मुझसे कहेगी कि मैं घर में तोड़ी हुई चीज़ें ढूँढूँ?"
कमरे में चुप्पी।
फिर मैंने घंटी बजाई।
टन्न।
और आवाज़ आई। रूखी। वैसी ही जैसी पहली रात आई थी, जैसे कोई बुज़ुर्ग बिना मुड़े पीछे से बोल रहा हो।
"गुस्से से कुछ नहीं जुड़ेगा।"
मैं कुछ कहने वाला था कि आवाज़ फिर आई, और इस बार उसमें एक अजीब सी गर्मी थी, जो मैंने पहले नहीं सुनी थी।
"पहले वो ढूँढ जो तेरे घर में टूटा है, और जिसे तूने कभी देखा ही नहीं।"
घंटी फिर चुप हो गई।
मैं कमरे में खड़ा रह गया, हाथ में पीतल, और सामने मेज़ पर बिखरा हुआ वो टूटा रेडियो।
जो मेरे घर में टूटा है, और जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।
मैंने दीवार पर टँगा कैलेंडर देखा। मैंने ट्रंक देखा। मैंने फर्श पर पड़ा वो जंग लगा पेचकस देखा, जो पापा का था और जो कल से यहीं पड़ा है, क्योंकि वो उसे लेने कभी नहीं आए।
और मुझे समझ आया कि आज रात मुझे सोना नहीं है।
आज रात मुझे अपने ही घर में उस चीज़ को ढूँढना है जिसे मैंने चौबीस साल से देखा है, पर कभी देखा नहीं।
॥
रात भर मैंने अपने ही घर में चोरी की।
ऐसे चोरी, जैसे कोई अपनी ही अलमारी में हाथ डाले और फिर हर आवाज़ पर चौंक जाए। पहले रसोई। माँ की हिसाब की कॉपी, मसालों के डिब्बे, पीछे वाला कोना जहाँ पुराने बर्तन रखे हैं और उनके ऊपर धूल की एक मोटी परत बैठी है। फिर माँ का साड़ी वाला बक्सा। कपड़ों के नीचे रिपोर्टें मिलीं, दो टेस्ट की परचियाँ, पुरानी दवाओं के खाली पत्ते, और एक छोटी सी पुड़िया जिसमें माँ ने पहली बार की सुई रखी थी।
पर वो चीज़ नहीं मिली जिसे घंटी ने कहा था।
जो टूटी है और जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।
फिर पापा की अलमारी। दो कुर्ते, एक चादर, औज़ारों की लोहे की डिब्बी, और नीचे वो पुरानी रस्सी का गोला जिसे उन्होंने आज तक नहीं फेंका। छत पर भी गया। पानी की टंकी के पीछे ईंटों का ढेर, उसके पीछे सिर्फ़ अँधेरा। दुकान के पीछे वाले कमरे में ट्रंक उलट दिया। टूटा रेडियो, औज़ार, पुराने बोल्ट, पंचर वाले टब के नीचे सिर्फ़ कीचड़।
कुछ नहीं।
सुबह हो गई और मैंने कुछ नहीं ढूँढा।
तुम सोच रहे होगे कि एक पूरी रात में इतना कुछ ढूँढने पर भी कुछ नहीं मिला तो मैं बेवकूफ़ हूँ। सच कहूँ तो, मैं उस वक़्त खुद को बेवकूफ़ ही लग रहा था। पर बात ये थी कि मैं चीज़ें ढूँढ रहा था, और घंटी ने मुझसे कहा था — वो ढूँढ जो तोड़ा हुआ है। दोनों में फ़र्क़ होता है। टूटी हुई चीज़ आम तौर पर आँख से छुप जाती है, क्योंकि इंसान उसे देखता नहीं, उसके आर-पार देख जाता है।
सूरज निकलते ही माँ उठ गईं।
खाँसी पहले आई, फिर आवाज़। ऐसे जैसे कोई पुरानी अलमारी खुले। मैंने पानी का गिलास बढ़ाया, उन्होंने लिया, दो घूँट पिए, और फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, "तूने रात में सब कुछ हिला-डुला दिया।"
मैंने कहा, "कुछ ढूँढ रहा था।"
"क्या?"
मैं चुप रह गया।
माँ ने मुझे देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो किसी भी माँ की आँखों में तब आती है जब उसका बच्चा उससे कोई बात छुपा रहा हो और वो समझ जाए कि इस बार बात बड़ी है।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "अगर कुछ मिल गया है तो बता दे। छुपाने से बोझ बढ़ता है।"
मैंने उन्हें वो सच नहीं बताया जो मैं खुद नहीं जानता था।
फिर मेरी नज़र घर के उस कोने पर गई, जहाँ पापा का संदूक रखा है।
मैं तुम्हें उस संदूक के बारे में बताता हूँ। वो हमारे घर के उस कोने में है जहाँ शाम को सबसे पहले अँधेरा आता है। लकड़ी का, गहरा भूरा, कोनों पर लोहे की पत्तियाँ, और ऊपर से रस्सी बँधी है। रस्सी ऐसे बँधी है जैसे किसी ने उसे खोलने से नहीं, खुलने से बचाने के लिए बाँधा हो। उसके ऊपर पापा के औज़ार पड़े रहते हैं, एक मोड़ी हुई चादर, और बटनों का एक पुराना टिन।
और मेरे गले में वो चाबी है।
छोटी, काली पड़ चुकी, दाँते घिसे हुए। पापा ने यह चाबी मुझे तब दी थी जब मैं पंद्रह-सोलह साल का था। कहा था — संभाल के रखना। बस। यह किस चीज़ की है, ये कभी नहीं बताया। और मैंने कभी पूछा भी नहीं। घर में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें पूछना अपने आप पर शक करने जैसा लगता है।
पर आज सुबह मैंने उस संदूक को बहुत देर तक देखा।
बहुत देर तक।
ऐसे देखा जैसे वो भी मुझे देख रहा हो, और दोनों में से कोई पहले नहीं बोलना चाहता हो।
माँ ने रसोई से कहा, "उस संदूक को ऐसे मत देख, जैसे उसमें कोई ज़िंदा बैठा हो।"
मैंने भीतर से कहा — क्या पता, माँ। क्या पता उसमें सच में कोई बैठा हो।
पापा फर्श पर बैठे थे। वही टूटा पंखा उनके सामने खुला पड़ा था, वही पंखा जिसका तार कल से टूटा है और जिसे वो दो दिन से ठीक करने के बहाने छू रहे हैं। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, पेचकस हाथ में, और आँखें उस तार पर जमी हुईं, जो असल में वहाँ नहीं थीं।
मैंने कहा, "पापा, चाय ठंडी हो रही है।"
उन्होंने सिर हिलाया। प्याला उठाया। एक घूँट लिया, और रख दिया।
मुझे कुछ पूछना था। संदूक के बारे में, चाबी के बारे में। पर मैंने पूछा नहीं। मुझे लगा कि आज सुबह अगर मैंने वो सवाल पूछा और वो फिर टाल गए, तो कहीं मैं फिर चिल्ला न दूँ, जैसे कल चिल्लाया था। और ये मैं नहीं चाहता था। कल की शाम ने मुझे उस चीज़ का स्वाद दे दिया था जो बाद में बहुत कड़वा लगता है।
काजल अपनी नर्सिंग की किताब दबाए निकली। बाल बाँधते हुए बोली, "आज डॉक्टर साहब सुबह ही आएँगे, दवा का हिसाब करना है।"
"तू जा," माँ ने कहा। "सीख, आगे काम आएगा।"
काजल ने मुझे देखा। कुछ कहना चाहती थी, फिर नहीं कहा। दरवाज़े से निकलते हुए रुकी और बोली, "अंकुश, आज दुकान के बोर्ड पर चढ़ना कम, टिंकू से करवाना। उसकी फीस का काग़ज़… मैंने देखा है, तेरी जेब में है।"
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