The Mysterious Bell – Chapter 20
पापा का हाथ रुक गया। पेचकस धीरे से नीचे रख दिया। उन्होंने दोनों हाथ घुटनों पर रख लिए और सामने फर्श को देखने लगे। बोले कुछ नहीं।
और उनकी यही चुप्पी मुझे सबसे ज़्यादा चुभी। चीख़ से ज़्यादा चुभी। क्योंकि चीख़ का जवाब दिया जा सकता है। चुप्पी का नहीं।
मैं खड़ा हो गया। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे यह सुनकर और गुस्सा आया कि मेरे हाथ काँप रहे हैं।
"पापा, आप जानते हैं, आपकी चुप्पी से क्या हो रहा है? मैं सुबह उठता हूँ और मुझे डर लगता है कि आज घर में कौन सी चीज़ टूटी मिलेगी। मैं दुकान पर बैठता हूँ और सोचता हूँ कि किसी दिन कोई आकर कहेगा कि ये तुम्हारे पापा का काग़ज़ है, देख लो। मैं अस्पताल जाता हूँ और डॉक्टर मुझसे नज़र नहीं मिलाते। और आप? आप पंखा ठीक करते हैं।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"आप चुप रहकर सब ठीक नहीं कर रहे, पापा। आप चुप रहकर सिर्फ़ मुझे अंधेरे में रख रहे हैं। मैं अंधेरे में लड़ नहीं सकता, समझते हो? मुझे दुश्मन दिखे तो मैं लड़ूँ। पर आपने मेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया है और कह रहे हो कि बेटा, संभलकर चलो।"
तभी माँ की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
वो धीमी थी, पर उसमें वो डोरी थी जो एक बार खिंच जाए तो हाथ कट जाता है।
"चूल्हे पर हूँ, मुड़ नहीं रही। सुन रहा है?"
"माँ —"
"सुन रहा है?"
"हाँ।"
"तेरे पापा ने ज़िंदगी भर चुप रहकर ही हमें खड़ा रखा है।"
मैं चुप हो गया।
"जब तेरे दादा बीमार पड़े, तब ये घर था, और इन्होंने चुप रहकर साइकिल गिरवी रखी। मुझे तीन दिन बाद पता चला। जब मैं बीमार पड़ी, इन्होंने चुप रहकर अस्पताल के काग़ज़ भरे। तुझे तब भी नहीं बताया, क्योंकि तू तब छोटा था, और तेरा बचपन ख़राब होने का डर इन्हें मुझसे ज़्यादा था।"
उनकी आवाज़ का आख़िरी हिस्सा काँप गया। माँ ने करछी नीचे रखी, और उसकी खनक घर में गूँज गई।
"ये चुप नहीं हैं, अंकुश। ये थके हैं। और थका आदमी बोलता नहीं, बस सहता है। तू चौबीस साल का है, तुझे लगता है कि सच बोलना बहादुरी है। सच बोलना बहादुरी है। पर कभी-कभी सच सहना भी उतनी ही बड़ी बात होती है, जो ये सालों से कर रहे हैं।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
वहाँ, आधे खुले दरवाज़े के पीछे, काजल खड़ी थी। नर्सिंग का बैग कंधे से उतरा हुआ, जूते पैरों में ही, और आँखें भरी हुईं। वो मुझे देखकर हटी नहीं। वो मुझे देखती रही, और मैंने उसकी आँखों में वो बात देखी जो वो कभी बोलती नहीं — कि वो भी चुप्पी में हिस्सेदार है। कि उसने भी पापा को भारद्वाज भवन के बाहर टूटे चेहरे के साथ देखा था और किसी से कुछ नहीं कहा था।
वो अंदर आई, बैग रखा, मेरे पास से निकली और सीधे पापा के पास जाकर बैठ गई। पापा के घुटने पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोली।
पापा ने उसका हाथ नहीं हटाया।
और मैं, जो अभी-अभी इतना कुछ बोल गया था, उस दृश्य में कहीं भी फ़िट नहीं हो रहा था। मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा और बाहर निकल गया।
रात को मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा था।
कमरा छोटा है — इतना ही कि एक चारपाई, एक लोहे की अलमारी, और औज़ारों का एक ट्रंक आ जाए। दीवार पर एक पुराना बल्ब है जो जलता है तो गुनगुनाता है। उसकी रोशनी में सारी चीज़ें पीली दिखती हैं, जैसे पुरानी तस्वीर।
मेरे सामने मेज़ पर एक रेडियो रखा था। बबलू के आने से पहले वाला कोई ग्राहक छोड़ गया था — बोला था कि आवाज़ आती है पर फटी हुई, और अगर ठीक हो जाए तो दस रुपये देगा। मैंने रेडियो खोला। अंदर धूल, जंग, और एक टूटा तार।
मैंने पेचकस उठाया। तार जोड़ा। रेडियो में फटी आवाज़ आई — कहीं कोई भजन चल रहा था। फिर बंद।
मैंने फिर जोड़ा। फिर बंद।
मैंने रेडियो को ज़ोर से मेज़ पर पटका।
"बोल!" मैंने कहा। "बोल न!"
वो चुप।
मैंने दोबारा पटका। इस बार इतनी ज़ोर से कि उसका पिछला ढक्कन खुलकर गिर गया और अंदर के पुर्ज़े बिखर गए।
मैं हाँफने लगा। मेरे हाथ ग्रीस से काले थे और उनमें काँपट थी। कमरे में बस मेरी साँस की आवाज़ थी और बाहर से किसी कुत्ते के भौंकने की।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। सुबह से ठंडी।
मैंने उसे बाहर निकाला और ज़ोर से बजाया।
टन्न।
"सुन।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ कर्कश थी। "कुछ कर। कुछ बता। तेरा कोई काम है या नहीं? तू बस ऐसे ही पड़ी रहती है, और जब मन करता है तब पहेली बोल देती है। आज तूने कहा था कि मीठी आवाज़ वाला सबसे ज़्यादा तोड़ता है। ठीक है, मान लिया। पर उसके बाद? मैं उससे क्या पूछूँ? क्या लड़ूँ? मेरे पापा ने क्या किया था, ये तुझे पता है न? तो बता दे। सीधा बता दे। मैं तेरे पास पहेली सुलझाने नहीं आया, मैं तेरे पास अपना घर बचाने आया हूँ।"
घंटी चुप रही।
मैंने उसे मेज़ पर पटक दिया। पीतल की आवाज़ हुई और वो लुढ़ककर ट्रंक के पास जा गिरी।
मैं चारपाई पर बैठ गया और अपना सिर हाथों में पकड़ लिया।
तुम सोच रहे होगे कि ये लड़का इतना क्यों बिगड़ रहा है, बात तो छोटी है। भाई, बात छोटी नहीं है। बात ये है कि आज सुबह तक मुझे लगता था कि मेरे घर में एक ही आदमी है जो कभी गलत नहीं हो सकता — मेरे पापा। और शाम तक मुझे पता चल गया कि उनके नाम के आगे कहीं लाल स्याही का अँगूठा है। मुझे ये नहीं पता कि वो अँगूठा किस काग़ज़ पर है। और यही सबसे बुरा हिस्सा है। जब आपको दुश्मन पता हो, तो लड़ाई आसान होती है। जब आपको ये पता हो कि आपके ही घर में कोई चोट खा रहा है और नाम नहीं बता रहा — तब आप हर कमरे में चोर ढूँढते फिरते हो और हर आवाज़ पर चौंक जाते हो।
तभी खिड़की पर खटका हुआ।
छोटी खिड़की है, छत की तरफ़। उस पर लोहे की जाली है। मैंने सिर उठाया।
चार सिर दिख रहे थे। एक के ऊपर दूसरा।
"उस्ताद।"
सानिया की आवाज़। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और सबसे नीचे चिंटू, जो अपनी ऊँचाई के हिसाब से किसी की कंधे पर चढ़ा था।
"क्या है?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अभी भी सख़्त थी।
"उस्ताद, गुस्सा मत करो।" चिंटू ने कहा। "हमने तुम्हें सोया नहीं देखा, इसलिए आए।"
"बोलो।"
गुड्डू आगे आया। उसकी आँखें बड़ी थीं, जैसी चौदह साल के लड़के की आँखें होती हैं जब उसे लगता है कि उसने कुछ बड़ा देख लिया है।
"उस्ताद, शाम को हम थाने के सामने बैठे थे। दुबे अंकल की कुर्सी के पास।"
"हाँ।"
"तो एक सफ़ेद गाड़ी आई। बड़ी, चमकदार। रुकी। उसमें से सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी उतरा — वही जो काग़ज़ बाँटने आया था, पर आज उसके हाथ में काग़ज़ नहीं था, बस एक फ़ोन।"
मैं सीधा बैठ गया।
"वो थाने के अंदर नहीं गया।" रफ़ीक़ बोला। "बाहर ही खड़ा रहा। और फिर उसने फ़ोन पर किसी से बात की।"
"क्या बात की?" मैंने पूछा।
सानिया ने आगे झुककर कहा, "उस्ताद, हम सब चुपचाप पास चले गए। दुबे अंकल सो रहे थे, और उनकी कुर्सी की आड़ में हम बैठ गए। वो आदमी ज़ोर से नहीं बोल रहा था, पर जब गुस्से में होता है तो आवाज़ खुद ऊपर उठ जाती है।"
"उसने कहा —" गुड्डू ने नकल करते हुए कहा, "यादव का अंगूठा। वही अंगूठा। और अगर वो अंगूठा नहीं मिला तो पूरी फ़ाइल बेकार है।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये ज़रूरी नहीं कि वो हमारे पापा के बारे में बोल रहा था।" मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ कह रही थी कि वो हमारे पापा के बारे में ही बोल रहा था।
"उस्ताद, हमने सुना —" चिंटू ने धीमे से कहा, "वो आदमी ये भी बोला कि अगर ये काग़ज़ नहीं टिका, तो साहब को अस्पताल की ज़मीन के लिए रास्ता नहीं मिलेगा।"
मैंने अपनी साँस रोक ली।
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