The Mysterious Bell – Chapter 19
"उम्र का तो पता ही नहीं चलता, बेटा।" चंद्रेश ने कहा, और उसके चेहरे पर हँसी फैल गई, जैसे कोई चीज़ पानी में डालकर फैलती हो।
फिर उसने अपनी फ़ाइल खोली, एक काग़ज़ निकाला, और बिना आवाज़ बदले बोला, "तारीख़ आगे नहीं बढ़ेगी।"
कमरे में एक ऐसी चुप्पी आई जो पहले नहीं थी। बेंच पर बैठा वो आदमी जिसके हाथ में बच्चा था, उसने बच्चे को अपने सीने से चिपका लिया, जैसे उसने भी कुछ समझ लिया हो।
"मैंने तुमसे कहा था कि मुझे समय चाहिए।" डॉक्टर इसरानी ने कहा।
"समय चीज़ों को ठीक नहीं करता, बेटा।" चंद्रेश ने फ़ाइल बंद की। "समय सिर्फ़ तारीख़ें बदलता है। और तारीख़ें मेरे पास हैं।"
मैंने देखा कि डॉक्टर इसरानी की उँगलियाँ काँप रही थीं। वो कोई जवाब देते, उससे पहले मुझसे निकल पड़ा।
"साहब।"
चंद्रेश मुड़ा। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, और उसका देखना ऐसा था जैसे दर्ज़ी किसी कपड़े को पलटकर उसका पीछा देखती हो।
"यहाँ मरीज़ भर्ती हैं।" मैंने कहा। "बाहर बेंच पर बच्चे हैं। अंदर बूढ़ी औरतें हैं। आप यहाँ काग़ज़ निकालकर खड़े हैं। ये ठीक नहीं लगता।"
वो हँसा। सच में हँसा, और उसकी हँसी में कोई ठंडक नहीं थी — वो बस हँसी थी, जैसे बच्चा कुछ मज़ेदार कह दे और बड़े लोग हँस दें।
"बहुत अच्छा कहा।" उसने कहा। "बिल्कुल ठीक कहा।"
फिर उसने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया।
"तुम्हारा नाम?"
"अंकुश। अंकुश यादव।"
"अंकुश।" उसने दोहराया, जैसे नाम को मुँह में रखकर चख रहा हो। "अच्छा नाम है। पुराना नाम है। मेरे एक दोस्त का भी ऐसा ही नाम था।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"यहाँ क्या काम है, अंकुश?" उसने पूछा। "तुम मरीज़ हो या साथ आए हो?"
"माँ को लाया हूँ।"
"बेटा है तुम।" उसने कहा। "अच्छी बात है। माँ को लाना चाहिए।"
फिर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ हल्का था, पर मुझे लगा किसी ने मेरे कंधे पर कोई काग़ज़ रख दिया हो, जिसका वज़न नहीं दिखता, पर उतारना मुश्किल होता है।
"अंकुश।" उसने कहा। "तुम शंकर यादव के बेटे हो न?"
मेरे पैरों के नीचे का फ़र्श एक इंच खिसक गया।
"हाँ।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर मुझे अपना ही डर महसूस हुआ।
चंद्रेश मुस्कुराया। वो मुस्कान अब भी वैसी ही थी, पर उसकी आँखों में कुछ और था, जैसे उसने बहुत दिनों से कोई गाँठ बाँध रखी हो और आज वो खुल गई हो।
"तुम्हारे पापा से कहना," उसने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "वो काग़ज़ अभी भी मेरे पास सुरक्षित रखा है।"
और उसके बाद उसने अपना हाथ मेरे कंधे से उठाया, फ़ाइल दोबारा पकड़ी, डॉक्टर इसरानी की तरफ़ मुड़ा, और बोला, "बेटा, मैं अगले हफ़्ते फिर आऊँगा। तुम तब तक सोच लेना। और हाँ, तुम्हारे बच्चों को भी बताना, जो मुझे सफ़ेद कुर्ते में देखकर डरते हैं। मैं किसी का बुरा नहीं करता। मैं बस काग़ज़ों का आदमी हूँ।"
वो मुड़ा और चला गया।
उसके जाने के बाद वो टूटी खिड़की वाली धूप वैसी ही पड़ी रही, वो बेंच वैसी ही रही, वो बूढ़ी औरत वैसी ही बैठी रही। कुछ नहीं बदला।
बस मेरे अंदर कुछ बदल गया था। मुझे लगा जैसे मैं अब तक एक दरवाज़े के बाहर खड़ा था, और अब जाकर मुझे दिखा कि वो दरवाज़ा किसी और रास्ते का दरवाज़ा नहीं, मेरे ही घर का दरवाज़ा है।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी ठंडी थी, पर अब वो खाली नहीं लग रही थी। अब उसमें एक शब्द बैठा था, जो उसने अभी नहीं कहा, पर मैंने सुन लिया।
मीठी आवाज़ वाला सबसे ज़्यादा तोड़ता है।
॥
अस्पताल की सीढ़ियों से उतरते वक़्त मुझे लगा कि मेरे कंधे पर अभी भी कोई हाथ रखा है। मैंने दो बार पीछे देखा। कोई नहीं था। बस वही टूटी खिड़की वाली धूप, वही बेंच पर बैठी बूढ़ी औरत, और दवाइयों की गंध जो कपड़ों में चिपक जाती है।
मैंने साइकिल नहीं उठाई। पैदल चला। साइकिल घर के पीछे खड़ी थी, और मुझे लगा कि आज अगर मैंने उसे छुआ, तो कहीं वो भी कुछ पूछ बैठे। जब दिमाग़ में इतने सवाल हों, तब आदमी औज़ारों से दूरी बना लेता है। तुम सोच रहे होगे कि साइकिल क्या पूछेगी भाई। तुमने अभी वो घंटी सुनी नहीं है, इसीलिए ये बात तुम्हें हल्की लग रही है।
गली में उस वक़्त धूप आधी हो चुकी थी। पीपल की छाँव लंबी होकर नाली तक आ गई थी। शबनम आपा की गुमटी पर कोई नहीं बैठा था, बस चिमटी कराहट की आवाज़ कर रही थी। उस्ताद की दुकान पर वही ताला, वही धूल। मैंने चलते-चलते उस शटर को देखा और मन में कहा, उस्ताद, आपने चार तह का काग़ज़ छोड़कर मुझे आधा ही समझाया। बाक़ी आधा कब बताओगे।
घर का दरवाज़ा खुला था।
माँ चूल्हे पर थीं। कमर में पल्लू खोंसा हुआ, माथे पर चंदन का टीका, और पास में हिसाब की कॉपी खुली पड़ी थी। उनकी साँस सीने से आ रही थी, गले से नहीं। मैंने सुना और कुछ नहीं कहा। इन दिनों घर में एक नियम बन गया था — जो चीज़ सबको दिख रही है, उसका नाम नहीं लिया जाता।
"आ गया?" माँ ने पूछा, बिना मुड़े।
"आ गया।"
"डॉक्टर ने क्या कहा?"
"कहा कि दवा बदलेगी। दो जाँच और हैं।"
माँ ने करछी एक बार हाँडी में घुमाई, फिर रख दी।
"अच्छा।"
बस इतना। अच्छा। जैसे मैंने कहा हो कि बाहर हल्की बारिश है।
पापा कोने में बैठे थे। उनके सामने फर्श पर एक पुराना पंखा खुला पड़ा था, जिसका तार टूटा हुआ था। वो उसी में लगे थे। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, हाथ में छोटा पेचकस, और उँगलियाँ धीरे-धीरे घूम रही थीं, जैसे कोई प्रार्थना कर रहा हो जिसमें शब्द नहीं होते।
मैंने जूते उतारे। पानी पिया। एक बार सोचा कि चुपचाप चला जाऊँ, दुकान पर बैठूँ, किसी की साइकिल का पहिया सीधा करूँ और अपना दिमाग़ टाल दूँ।
पर आज दिमाग़ टलने वालों में नहीं था।
मैं उनके सामने बैठ गया। फर्श पर। घुटनों के बल।
"पापा।"
उन्होंने पेचकस घुमाया।
"पापा।"
"हम्म।"
"वो कौन सा काग़ज़ है?"
पेचकस रुक गया। बस एक पल के लिए। फिर वापस घूमने लगा।
"कौन सा काग़ज़, पापा? जो चंद्रेश के पास सुरक्षित रखा है। जो उसने आज अस्पताल में मुझसे कहा कि तुम्हारे पापा से कहना, वो काग़ज़ अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।"
पापा ने सिर नहीं उठाया। उन्होंने पंखे की एक तार उठाई, देखी, फिर उसी जगह रख दी, जहाँ से उठाई थी। जैसे उन्होंने मेरी बात सुनी ही न हो। जैसे मैं हवा में बोल रहा हूँ और हवा को जवाब देने की ज़रूरत नहीं।
"पापा, मैं आपसे पूछ रहा हूँ।"
"पंखा ठीक करने दे।"
"पंखा छोड़ो।"
"पंखा गरमी में काम आएगा।"
"पापा!"
मेरी आवाज़ घर में फैल गई। माँ का हाथ करछी पर रुक गया। पड़ोस से किसी के बर्तन की आवाज़ आई और फिर चुप्पी।
पापा ने सिर उठाया। उनकी आँखें थकी हुई थीं। डर से नहीं — थकान से। और वो थकान मुझे जानी-पहचानी लगी, क्योंकि वो थकान मेरे अंदर भी पिछले कुछ महीनों से बैठी हुई है।
"बेटा," उन्होंने धीमे से कहा, "तुम डॉक्टर से क्या बात करके आए हो, वो बताओ। बाक़ी सब बाद में।"
"बाद में कब? जब वो काग़ज़ आपके सामने मेज़ पर रखा होगा? जब घर चला जाएगा? जब माँ को…" मैंने अपनी आवाज़ पकड़ ली। "पापा, आप पिछली रात साइकिल देखकर टूट गए थे। आपने मुझसे पूछा तक नहीं कि वो कहाँ से आई। आपको पहले से पता था। सब पता था। और आप मुझे आज तक कुछ नहीं बताया।"
"मैंने तुम्हें सब बताया। दादा की बीमारी, गिरवी, घंटी —"
"वो आधा सच था, पापा।"
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