The Mysterious Bell – Chapter 18
डॉक्टर इसरानी साठ के पार हैं, पर उनकी आवाज़ अब भी वैसी है जैसे किसी ने उसे अलमारी में बंद करके रखा हो और वो बाहर निकलने की जल्दी में न हो। सफ़ेद बाल, कम किए हुए चश्मे, और हाथ में एक पुराना स्टेथोस्कोप जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ था।
"आओ, बहू।" उन्होंने कहा। "बैठो।"
माँ बैठीं और तुरंत बोलीं, "डॉक्टर साहब, मैं तो ठीक हूँ। बेटा ज़्यादा डरता है। रात को मेरी खाँसी सुनकर छत पर बैठ जाता है, और सुबह मुझे डाँटता है जैसे मैं उसकी बेटी होऊँ।"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में हल्की हँसी आई।
"बेटा तो डरेगा ही।" उन्होंने स्टेथोस्कोप उठाया। "अगर बेटा न डरे तो समझो कुछ गड़बड़ है। ज़रा साँस लो, बहू।"
माँ ने साँस ली। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार, और तीसरी बार में खाँसी आ गई, और वो खाँसी कमरे में चारों तरफ़ फैल गई जैसे कोई चीज़ गिर पड़ी हो।
मैं दीवार की तरफ़ देखता रहा। दीवार पर एक कैलेंडर लटक रहा था, जिसका महीना दो महीने पुराना था, और उस पर एक बच्चे ने पेंसिल से सूरज बनाया हुआ था।
"ठीक है।" डॉक्टर इसरानी ने स्टेथोस्कोप नीचे रखा। "अब सुनो, दोनों।"
मैंने सुना।
"खाँसी अब सूखी नहीं है, बल्कि सीने के अंदर से आ रही है। पुरानी बात यह है कि इसे लंबा इलाज चाहिए। अच्छी बात यह है कि अभी देर नहीं हुई है।" उन्होंने मेज़ पर से एक परची उठाई और लिखने लगे। "दो जाँच और हैं। दवा बदलनी पड़ेगी। और तुम, बेटा—" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, "—माँ को रोटी बनाने से रोकना चाहो तो रोक लो, पर मना मत करना। औरत अगर रसोई छोड़ दे तो वो बीमार नहीं, बेकार हो जाती है। मुझे बीमार मरीज़ चाहिए, बेकार औरत नहीं।"
माँ हँस पड़ीं। "सुन लिया? डॉक्टर साहब भी मेरी तरफ़ हैं।"
"डॉक्टर साहब मरीज़ की तरफ़ होते हैं, बहू।" उन्होंने कहा। "बस कभी-कभी मरीज़ को यह बताना पड़ता है कि वो मरीज़ हैं।"
मैं बाहर आ गया।
दीवार से टिक गया। वो दीवार जिस पर सफ़ेदी उतरी हुई थी और जिसके नीचे लाल रंग की एक पट्टी बनी थी, जैसे किसी ने दीवार की कमर पर पेटी बाँध दी हो।
मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि किस बात पर ज़्यादा डरूँ। उस काग़ज़ पर पापा के नाम के आगे लगे अंगूठे पर, या उस परची पर जिस पर दो जाँच और लिखी थीं और जिनके आगे लिखी तारीख़ पिछले महीने की हो चुकी थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली। उसे देखा। वो चुप थी। बजाई तो भी चुप रही। मैंने धीरे से कहा, "अब तू क्यों चुप है?"
कुछ नहीं।
"जब बात मेरे समझ में न आए, तब तू बोलती है। अब मेरे समझ में आ गया कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, तो तू चुप है?"
कुछ नहीं।
तो मैंने घंटी को जेब में रख दिया और मैंने अपने आप से कहा, ठीक है, अकेले सोचता हूँ।
और ठीक उसी वक़्त काजल भागकर आई।
वो इतनी तेज़ भागी कि उसके कोट की आस्तीन खुल गई और पेन ज़मीन पर गिर गया, और वो पेन उठाने के लिए भी न रुकी।
"अंकुश।" उसने मेरी बाँह पकड़ी। "सुन।"
"क्या?"
"जाँच के पैसे।"
मेरा पेट कस गया। "कितने हैं?"
"नहीं, तू सुन।" उसने मेरी बाँह दबाई। "डॉक्टर साहब ने कहा है कि जाँच के पैसे कुछ महीने के लिए टाल दिए गए हैं। एडवांस नहीं, टाल दिए। उन्होंने स्टेशनरी वाले को फ़ोन भी किया और कहा कि जाँच की तारीख़ जल्दी की जाए।"
मैंने उसका हाथ हटाया। "कितने पैसे?"
"तू पैसे की बात क्यों कर रहा है, मैं बता रही हूँ पैसे की ज़रूरत नहीं है—"
"काजल।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "कितने?"
वो रुक गई। उसने होठ भींचे। उसकी आँखें भर आईं और वो एकदम से बोली, "मुझे पता नहीं। उन्होंने मुझे नहीं बताया। मैंने मेज़ पर परची देखी, पर वो उन्होंने उलटी कर दी। और मैं जानती हूँ कि तू पैसे देगा और मैं जानती हूँ कि तेरे पास नहीं हैं और मैं जानती हूँ कि तू ये बात मुझे नहीं बताएगा, इसलिए मैं पहले बता रही हूँ।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने कहा, "बात करूँगा।"
"अंकुश—"
"बात करूँगा, काजल। उनसे। कोई पैसे टालेगा तो मुझे पूछना पड़ेगा। मुफ़्त में कुछ नहीं होता।"
"ये मुफ़्त नहीं है।" वो मेरे सामने आ गई, और उसकी आवाज़ में वही कड़क थी जो माँ की है। "डॉक्टर इसरानी पच्चीस साल से इस अस्पताल में हैं। इस गली के हर बच्चे को उन्होंने टीका लगाया है। मेरे हाथ में सुई उन्होंने पकड़ी थी। जब मैंने कहा था कि मैं नर्सिंग में जाना चाहती हूँ, तो घर में कोई नहीं था जो मानता, इन्होंने आकर पापा से बात की थी।"
मैं नहीं बोला।
"इसलिए डॉक्टर साहब पर शक करना बंद कर।" उसने कहा।
"मैं शक नहीं कर रहा।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "मैं सिर्फ़ यह जानना चाहता हूँ कि भला कोई इंसान किसी से क्यों कहेगा कि तुम्हारे पैसे की ज़रूरत नहीं।"
और तभी पीछे से आवाज़ आई।
"क्योंकि मैं पैसा नहीं माँग रहा। मैं एक चीज़ माँग रहा हूँ।"
डॉक्टर इसरानी दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में वही परची थी, मोड़ी हुई, और उन्होंने उसे अपनी जेब में डाल दिया।
"सर, मेरे पास—"
"मुझे पता है कि तुम्हारे पास क्या है और क्या नहीं है।" उन्होंने कहा। "तुम्हारी दुकान का हिसाब मैंने एक बार देखा था, दो साल पहले, जब तुम्हारे पापा की तबीयत खराब थी। तुम उस वक़्त काग़ज़ों पर टाइल का डिब्बा रखकर उन्हें छुपा रहे थे।"
मैंने नज़रें नीची कर लीं।
"बेटा, इलाज रुकेगा नहीं।" उन्होंने कहा। "बस अस्पताल बचा रहे।"
मैं ठिठक गया।
"मतलब?"
"मतलब यह कि तुम अपनी माँ को यहाँ लाना बंद मत करना।" उन्होंने कहा। "बस इतना।"
"नहीं, आपने कहा—"
"अंकुश।" उन्होंने मेरा नाम लिया और मैं चुप हो गया। "अभी मैं मरीज़ देख रहा हूँ। बाद में बात करेंगे।"
और वो अंदर चले गए। दरवाज़ा बंद नहीं किया, बस अधखुला छोड़ गए, और उस अधखुले दरवाज़े से माँ की हँसी आई, जो किसी बात पर काजल को डाँट रही थीं।
मैं दीवार से टिका रहा और मेरे दिमाग़ में एक ही लाइन घूम रही थी।
अस्पताल बचा रहे।
कौन अस्पताल को बचाएगा?
अस्पताल को किससे बचाना है?
और तभी मुझे वो काग़ज़ याद आया — पीछे के प्लॉट की ज़मीन, दुकानों की सूची, मेरी दुकान का नाम, और सबसे ऊपर शंकर यादव।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा ही था कि गेट की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
"निहाल भाई! इतनी सीढ़ियाँ चढ़ूँगा, तो मेरा भी इलाज करना पड़ेगा।"
वो आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि जैसे किसी ने चीनी को पानी में घोलकर हवा में छिड़क दिया हो।
आदमी सफ़ेद कुर्ते में था। कुर्ता इतना साफ़ कि उस पर धूल एक भी दाना नहीं थी, जबकि गली की धूल हर आदमी पर पाँच मिनट में बैठ जाती है। साफ़ कटा बाल, काले रंग की पतली घड़ी, हाथ में एक फ़ाइल जिसके किनारे पर सोने का रंग था, और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो कभी नहीं उतरती— चाहे सामने वाला हँसे या रोए।
वो सीढ़ियों के नीचे खड़ा था और ऊपर देख रहा था। उसने डॉक्टर इसरानी को देखा और दोनों हाथ जोड़कर हल्का सा सिर झुकाया।
"आइए, आइए, चंद्रेश जी।" डॉक्टर इसरानी बाहर आ गए, और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो लोग मेहमान के लिए रखते हैं, पर उनके कंधे अकड़े हुए थे।
"बेटा, तुम्हारी इमारत में लिफ़्ट नहीं है।" चंद्रेश ने कहा, और मुस्कुराया। "साठ पार का आदमी चढ़ेगा कैसे?"
"मुझे साठ पार का आदमी कहकर बुलाओगे?" डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मैं तुमसे दस साल बड़ा हूँ, चंद्रेश।"
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