The Mysterious Bell – Chapter 17
और वो चले गए। बिना झगड़े के। बिना धमकी के। और यही सबसे डरावना था — उन्होंने धमकी नहीं दी, क्योंकि जिनके पास काग़ज़ होता है, वो धमकी नहीं देते। वो सिर्फ़ तारीख़ देते हैं।
वो गली के मुहाने की तरफ़ बढ़े।
मैं उनके पीछे ही चल पड़ा, दूर से, जैसे हमारी गली का कोई आदमी हो जो ये देखना चाहता है कि ट्रक कितनी देर में आता है।
और तभी उनमें से बड़े आदमी ने अपना बंडल खोला, क्योंकि हवा लग गई थी और काग़ज़ उड़ने लगे थे।
काग़ज़ों की पहली शीट ऊपर आई, और मैंने उस पर दूर से एक नाम देखा।
शंकर यादव।
मेरे पापा का नाम।
और उस नाम के आगे, उसी लाल स्याही से जो उनकी डिब्बी में थी, एक छोटा सा निशान बना हुआ था — ठीक वैसा ही निशान जैसा किसी अंगूठे का होता है।
मैं वहीं जम गया।
और जेब में घंटी, जो दो दिन से ठंडी और चुप थी, अचानक इतनी ठंडी हो गई जैसे किसी ने उसे मेरी हड्डी के अंदर रख दिया हो।
मैंने उसे बाहर निकाला और बजाया।
टन।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस इतना कहा, इतने धीमे से कि मुझे लगा किसी ने मेरे कान के अंदर साँस छोड़ी है —
"अब पूछ। मत बेचना का मतलब।"
॥
तंत्र ने जो कहा, वो सिर्फ़ तीन शब्दों में था, पर उसने मेरे अंदर एक कमरा खाली कर दिया।
"अब पूछ। मत बेचना का मतलब।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। वो इतनी ठंडी थी कि लगा किसी ने बर्फ़ का टुकड़ा मेरी हड्डी के अंदर रख दिया हो।
"पूछ क्या रहा हूँ, तू बता।" मैंने गली की तरफ़ देखा। सामने किराने की दुकान का बूढ़ा काका अब भी अपनी मेज़ पर बैठा था, दोनों हाथ जोड़कर, जैसे कोई बच्चा अपना खोया हुआ खिलौना देख रहा हो। "तूने कहा, अब पूछ। तो मैं पूछ रहा हूँ। पापा का अंगूठा उस काग़ज़ पर क्यों है?"
"क्योंकि उन्होंने लगाया था।"
"कब?"
"जब उन्हें लगाना पड़ा।"
मेरी उँगलियाँ घंटी पर कस गईं। "तू सीधा बोल ना। तू ऐसे बोलती है जैसे पहेली बुझा रही हो।"
"पहेली का जवाब पूछने वाले के पास होता है, घंटी के पास नहीं।"
मैंने आँखें बंद कीं। बारह साल की उम्र में मैंने एक बार पापा को रात में चूल्हे के पास बैठे देखा था, हाथ जोड़े, आँखें बंद। मैंने सोचा था प्रार्थना कर रहे हैं। आज उसी तस्वीर के सामने एक काग़ज़ आ गया था, और तस्वीर का मतलब पूरा बदल गया था।
"मत बेचना का मतलब क्या है?" मैंने धीरे से पूछा।
"जिस चीज़ पर हाथ रखा जाए, वो पहले देखना चाहिए कि हाथ किसका है।"
"ये जवाब नहीं है।"
"यही जवाब है। तू साइकिल की सोच रहा है। साइकिल बहाना है।"
मैंने घंटी को जेब में वापस रखा। दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले गली के मुहाने से गायब हो चुके थे। हवा अब भी वहीं खड़ी थी, जहाँ वो काग़ज़ उड़े थे, जैसे हवा को भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि उसने क्या देखा।
मैं अपनी दुकान पर लौटा। बोर्ड अब भी मेज़ पर पड़ा था, और मैंने उसे उठाकर देखा। लकड़ी पर काले अक्षर आधे उखड़े हुए थे। मैंने उँगली से उन पर हाथ फेরা।
फिर मैं घर गया।
रात में माँ की खाँसी तीन बार उठी। पहली बार दो बजे, दूसरी बार तीन बजकर कुछ, और तीसरी बार सुबह ठीक चूल्हा जलने के वक़्त। मैं छत पर लेटा था, आँखें बंद, पर नींद नहीं थी। नीचे से तवे पर रोटी पलटने की आवाज़ आ रही थी और माँ बीच-बीच में हाँफ रही थीं, और हर हाँफ मेरे सीने पर पत्थर रख रही थी।
सुबह छह बजे मैं नीचे गया और बोला, "माँ, आज अस्पताल चलेंगे।"
उन्होंने तवा उठाया, पोंछा, रख दिया, और बिना मेरी तरफ़ देखे बोलीं, "पाँच बजे का टिफ़िन है। स्कूल वाले पंद्रह हैं, दुकान वाले नौ। किसके हाथ में दूँ?"
"काजल दे देगी।"
"काजल को कॉलेज जाना है।"
"एक दिन की बात है, माँ।"
"एक दिन की बात मैंने बीस साल पहले पापा से सुनी थी। आज तक ख़त्म नहीं हुई।"
मैं हँसा, पर हँसी आधी गले में ही रुक गई। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो माँओं की आँखों में तभी आती है जब उन्हें पता हो कि उनका बच्चा डर रहा है और वो उसे छुपाने की कोशिश कर रहा है।
"बैठ।" उन्होंने कहा।
"माँ—"
"बैठ, दो मिनट।"
मैं बैठ गया। उन्होंने चाय का गिलास मेरे सामने रखा, और फिर अपना पल्लू कमर में खोंसकर बोलीं, "मैं ठीक हूँ, अंकुश। मुझे अपनी बीमारी का डर नहीं है। मुझे इस बात का डर है कि मेरे कारण तुम और काजल अपनी उम्र से पहले बूढ़े हो जाओगे।"
"ये किसने कहा?"
"जो सुबह तीन बजे छत पर बैठा था। मैंने देखा।"
मैंने गिलास पकड़ा, और उसमें एक बूँद भी नहीं गिरी, क्योंकि मेरा हाथ काँप रहा था।
"आज चलेंगे।" मैंने कहा। "बस इस बार ज़िद मेरी है।"
वो कुछ नहीं बोलीं। और माँ का न बोलना माँ की हाँ के सबसे करीब होता है।
गली में उस वक़्त सुबह की धूप पत्थर की चबूतरी पर आधी चढ़ चुकी थी। पीपल के नीचे गुड्डू और रफ़ीक़ कुछ खोज रहे थे, जैसे ज़मीन से कोई सिक्का मिल गया हो। उसी पुराने रिक्शे वाले बूढ़े ने— वो जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाता है— मुझे देखा और साइकिल रोक ली।
"बहू को बैठा? मैं छोड़ आऊँगा।"
"बूढ़े काका, आपकी औरत?" मैंने पूछा।
"आज तीन दिन से बुखार नहीं आया। डॉक्टर साहब ने नई दवा दी है। वो कहते हैं, हमेशा नहीं चलेगा बुखार, कभी रुकेगा भी।" उन्होंने एक हाथ से साइकिल का हैंडल पकड़ा और दूसरे से हवा में एक छोटी सी रेखा खींच दी, जैसे किसी ने उनके जीवन में एक तारीख़ खींच दी हो। "आज मैं अकेला जा रहा हूँ। उसने कहा, आज तू ही जा, मैं घर संभाल लूँगी।"
और मुझे कुछ अजीब लगा। इस गली में बीमारी ऐसे चलती है जैसे कोई किराएदार हो — आता है, रहता है, कभी-कभी चला जाता है, और उसके जाने पर लोग उसे भूल जाते हैं, जैसे वो कभी था ही नहीं।
नूर अस्पताल का दरवाज़ा हमेशा से कुछ टेढ़ा था। लोहे का बना, हरे रंग का, और उसकी एक कुंडी ऊपर, एक नीचे। जब वो खुलता था तो एक ऐसी आवाज़ करता था जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठते वक़्त हल्का कराह दे।
अंदर घुसते ही वो गंध आई जो सिर्फ़ पुराने अस्पतालों में होती है — फ़िनाइल, पुराना काग़ज़, और किसी के हाथ में लगी हुई क्रीम। पीली दीवारें, ऊपर से नीचे तक, और जहाँ-जहाँ हाथ लगा था वहाँ सफ़ेदी उतर गई थी, जैसे दीवार का कोई छोटा-सा राज़ खुल गया हो।
सीढ़ियों के पास की खिड़की टूटी थी। काँच के टुकड़ों पर किसी ने टेप चिपकाकर उसे जोड़ रखा था, और उस टेप से होकर धूप अंदर आती थी, टुकड़ों में, जैसे किसी ने रोशनी भी फाड़कर चिपकाई हो।
बेंच पर चार लोग बैठे थे। एक बूढ़ी औरत, एक आदमी जिसके हाथ में बच्चा था, और दो लड़के जो एक ही काग़ज़ को दोनों तरफ़ से पकड़े हुए थे, जैसे उसका कोई हिस्सा छूट जाने का डर हो।
काजल सफ़ेद कोट में बाहर आई। उसका कोट उससे दो नंबर बड़ा था, आस्तीन ऊपर मोड़ी हुई, और जेब से एक पेन निकला हुआ था।
"तू आ गया!" वो दौड़कर आई और माँ का हाथ पकड़ लिया। "माँ, डॉक्टर साहब आज बहुत अच्छे मूड में हैं। सुबह उन्होंने मुझे पहली बार खुद से सुई लगाने दी।"
"लगाई?" माँ ने पूछा।
"लगाई।" काजल ने गर्व से कहा, फिर धीरे से मेरे कान में बोली, "तीन बार। पहली दो बार मरीज़ ने कहा, बेटा ज़रा नरमी से। तीसरी बार वो सो गया।"
मैं हँसते-हँसते रुक गया।
डॉक्टर इसरानी का कमरा पहली मंज़िल पर था। दरवाज़े पर कोई नाम नहीं, बस एक छोटी सी तख़्ती, जिस पर उनका नाम उभरा हुआ था और किनारे से रंग उतर चुका था। अंदर मेज़ पर काग़ज़ों के तीन ढेर, एक शीशे का गिलास जिसमें पानी आधा, एक चश्मा जिसका एक काँच चिपका हुआ, और दीवार पर एक तस्वीर — एक औरत, जिसकी आँखें हँस रही थीं और जिसके नीचे कोई तारीख़ नहीं लिखी थी।
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