The Mysterious Bell – Chapter 16
एक औरत गुज़री जो सब्ज़ी का थैला लिए थी, और मैंने सोचा कि वो मेरी तरफ़ देखकर क्यों मुस्कुराई। एक आदमी साइकिल पर निकला, और मैंने सोचा कि वो घंटी क्यों नहीं बजा रहा। एक बच्चा रोता हुआ गुज़रा और मैंने सोचा कि किसी का घर टूटा होगा।
मुझे कोई हल चाहिए था, और मुझे पता नहीं था कि हल कैसा दिखता है, इसलिए मैं हर चीज़ में हल ढूँढ रहा था।
शबनम आपा ने दोपहर में चाय भेजी। चाय के साथ एक समोसा भी, हल्के हाथ से लपेटकर काग़ज़ में।
"आपा कह रही हैं कि खाली पेट चाय मत पीना," चिंटू ने कहा और भाग गया, क्योंकि वो जानता था कि मैं पैसे देने की ज़िद करूँगा और वो नहीं ले सकता।
दो बजे मीरा आई।
वो हमेशा की तरह जल्दी में थी, बाल उड़ रहे थे, कैमरा कंधे पर, और फटा बैग उसके ज़्यादा फटा हुआ लग रहा था।
"अंकुश।"
"जी, मैडम।"
"वो जो तुमने मुझे रात के ट्रकों की जानकारी दी थी, मैंने लगा दी। वीडियो पर दो हजार लोगों ने देखा।"
"वाह। दो हजार।"
"मज़ाक मत करो। दो हजार इस बस्ती के हिसाब से बहुत है।"
"मैं मज़ाक नहीं कर रहा। मैं सच में खुश हूँ कि दो हजार लोगों ने कुछ देखा।"
वो मेरी तरफ़ देखकर रुक गई।
"तुम आज अजीब लग रहे हो।"
"मैं रोज़ अजीब लगता हूँ।"
"नहीं। रोज़ तुम ऐसे लगते हो जैसे सब कुछ मज़ाक है। आज तुम ऐसे लग रहे हो जैसे सब कुछ मज़ाक है और तुम उस मज़ाक के अंदर फँसे हुए हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो बैठ गई, मेज़ के किनारे पर, और उसने अपना माइक वहीं रख दिया।
"सुनो, एक बात है। पीछे के प्लॉट पर जो मिट्टी गिर रही है, वो सिर्फ़ मिट्टी नहीं है। मैंने दो लोगों से पूछा। कह रहे थे कि ज़मीन के काग़ज़ में कुछ गड़बड़ है। और उन्हीं दो लोगों ने मुझे ये भी कहा कि अब लोगों से अंगूठे लिए जा रहे हैं।"
मेरा सिर ऊपर उठा।
"कौन ले रहा है?"
"पता नहीं। पर जो भी है, वो काग़ज़ के साथ घूम रहा है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"और तुम्हारी दुकान का नाम भी कहीं आ रहा है, अंकुश। मुझे ठीक से नहीं पता, पर सुनकर लगा कि जिस सूची में दुकानें लिखी हैं, उसमें तुम्हारी दुकान भी है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हो गया।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तूने मेले में मेरा गला पकड़ा हुआ वीडियो रखा है ना?"
"रखा है।"
"अभी मत छापना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तूने छाप दिया, तो वो लोग समझ जाएँगे कि हम उनकी तरफ़ देख रहे हैं। और जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि हम देख रहे हैं, उस दिन वो रुकेंगे नहीं। वो और तेज़ हो जाएँगे।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही।
"ये बात तुमने किससे सीखी?"
"किससे नहीं सीखी। मैं रोज़ देखता हूँ कि लोग चीज़ें कैसे तोड़ते हैं। पहले हल्के से, फिर ज़ोर से।"
वो उठी और उसने अपना माइक उठाया।
"ठीक है। मैं रोक लेती हूँ। पर ज़्यादा देर नहीं रोक पाऊँगी, अंकुश। मैं उस आदमी की नहीं हूँ जो चुप बैठता है। मैं वो आदमी हूँ जो गलत वक़्त पर बोलकर अपना घर बिगाड़ बैठता है।"
"मुझे पता है।"
वो रुकी।
"क्या पता है?"
"तुझे पता है कि मुझे पता है।"
वो हँसी, पर उसकी हँसी में वो चीज़ नहीं थी।
वो जाने लगी, फिर रुकी और बोली, "तुम्हारी माँ ठीक हैं?"
"हाँ।"
"सच?"
"दो टेस्ट बाकी हैं।"
वो कुछ कहने को हुई, फिर नहीं कहा और चली गई।
शाम तक मैंने तीन साइकिलें ठीक कीं। एक बच्चे की, एक दूध वाले की, और एक उस बूढ़े की जिसकी साइकिल पर बैठने की जगह सिर्फ़ एक ही थी और वो उसे रोज़ अस्पताल ले जाता था अपनी औरत को।
और ठीक शाम पाँच बजे, जब मैं पंचर वाले टब में हाथ धो रहा था, गली में वो आवाज़ आई जो किसी गली में सबसे पहले कान पकड़ती है — चप्पलों की एक साथ चलती आवाज़।
दो आदमी आए।
एक के हाथ में काग़ज़ों का एक मोटा बंडल था, दूसरे के हाथ में स्याही की छोटी डिब्बी और एक कपड़ा। दोनों सफ़ेद कुर्ते में थे, पर उनके सफ़ेद में वो सफ़ेदी नहीं थी जो रणवीर भारद्वाज की तस्वीरों में होती है। उनके कुर्ते धोए हुए थे, पर उन पर धूल थी — वो धूल जो सिर्फ़ मिट्टी के ट्रकों के पास उड़ती है।
वो उस्ताद अली बक्श की बंद दुकान के सामने रुके, शटर पर हाथ मारा, और जब कोई नहीं खोला तो एक काग़ज़ शटर के नीचे से अंदर सरका दिया और हँसे।
फिर वो एक-एक दुकान पर जाने लगे।
मैंने अपना हाथ पोंछा और सड़क पर आ गया।
शबनम आपा की गुमटी पर आपा ने चिमटी हाथ में लेकर कहा, "मैं कुछ नहीं लगाती।"
"आपा, ये तो सिर्फ़ एक काग़ज़ है।"
"मेरे पास कुछ नहीं है लगाने को। ये स्टैंड किराए का है, मेरा नहीं है।"
"तो किराए वाले का नाम लगा दो।"
"मैं अपने मालिक का नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लगाती।"
उन्होंने एक-दूसरे को देखा, और फिर छोटे आदमी ने बंडल से एक काग़ज़ निकाला और उसे आपा की गुमटी के किनारे पर रख दिया।
"कल तक लगा देना। साहब नाराज़ होते हैं।"
और वो आगे बढ़ गए।
पीछे की तरफ़ एक पुराने किराने की दुकान है, जिसके बाहर बोरियों में दालें रखी हैं और जिसके अंदर एक बूढ़ा दुकानदार बैठता है, जिसकी आँखें अब ठीक से नहीं देखतीं और जो अपनी दुकान के बाहर बैठकर रोज़ शाम को चना खाता है।
मैंने देखा कि वो दोनों उसकी दुकान पर गए।
और मैं सुन रहा था, क्योंकि गली सिर्फ़ चौदह कद की है और चौदह कद में सब कुछ सुनाई देता है।
"काका, ये काग़ज़।"
"क्या है?"
"आपकी दुकान। आपकी ज़मीन।"
"मेरी ज़मीन मेरी है।"
"है तो। इसीलिए तो आपसे पूछने आए हैं। बस अंगूठा लगा दीजिए कि मकान आपका है।"
"किसलिए?"
"सरकारी काग़ज़ है। बिजली का मीटर।"
"मीटर का काग़ज़ पचास साल से मैं खुद भर रहा हूँ।"
"ये नया नियम है।"
मैंने दुकान की तरफ़ बढ़ते कदम तेज़ किए।
और तभी बूढ़े ने उस काग़ज़ को उठाया, अपनी आँखों के पास ले गया, इतना पास कि उसकी नाक काग़ज़ को छूने लगी। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने ऊपर की लाइन पढ़ी, फिर नीचे की लाइन पढ़ी, और फिर उसने काग़ज़ वापस मेज़ पर रख दिया और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी बच्चे की आवाज़ हो।
"ये तो बिक्री का काग़ज़ है।"
दोनों आदमियों में से छोटे ने तुरंत कहा, "काका, आपने गलत पढ़ा।"
"मैं पैंतालीस साल से ये दुकान चला रहा हूँ। मैंने दो बार ज़मीन बेची है। मैं बिक्री का काग़ज़ पहचानता हूँ। इस पर लिखा है कि मैंने बेच दिया।"
"आपको ठीक से दिखता नहीं है, काका।"
"मुझे ठीक से दिखता नहीं है, पर ये इतना बड़ा लिखा है कि ये अंधे को भी दिखे।"
मैं उनके पीछे खड़ा था।
और उस वक़्त मेरे अंदर से एक आवाज़ निकली, बिना सोचे, बिना रुके।
"एक मिनट।"
दोनों मुड़े।
छोटे आदमी ने ऊपर से नीचे तक मुझे देखा और उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो लोग उस आदमी के चेहरे पर लगाते हैं जिसे वो कुछ नहीं समझते।
"बोलो, मिस्त्री।"
"ये काग़ज़ मुझे दिखाओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरी दुकान भी इस गली में है।"
"तुम्हारी दुकान का काग़ज़ अलग है।"
मैं रुक गया।
"अलग कैसे?"
"तुम्हारी दुकान बड़े साहब खुद देखेंगे। तुम्हारे लिए कोई काग़ज़ नहीं भेजा गया।"
उसने मेरे कंधे की तरफ़ देखा और हँसा, और उसका हँसना ऐसा था जैसे कोई मुझे कुछ बता रहा हो बिना बताए।
"तुम्हारी दुकान की जगह पर बड़े साहब की नज़र है, ये बबलू भाई ने बोला नहीं था तुमसे?"
मैंने जवाब नहीं दिया।
बूढ़े काका ने काग़ज़ उनके हाथ से खींच लिया।
"मैं नहीं लगाऊँगा।"
"काका, सोच लो।"
"मैं नहीं लगाऊँगा।"
"अच्छा।"
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