The Mysterious Bell – Chapter 15
सुबह मैंने आँख खोली तो पाँच बजे थे। माँ के चूल्हे की आवाज़ आ रही थी, और उसके साथ वही खाँसी, जो अब सुबह भी थोड़ी देर रुकती है।
मैं उठा और बाहर गया।
काजल बाल बाँधते हुए रसोई में खड़ी थी, हाथ में नर्सिंग की किताब दबाए। माँ चूल्हे पर रोटी डाल रही थीं, और उनका कंधा थोड़ा झुका हुआ था।
"आज जल्दी क्यों?" माँ ने पूछा। "चाय पी ले।"
"पी लूँगा।"
काजल ने मुझे देखा और आँखें सिकोड़ीं।
"भैया, आपकी आँखें लाल हैं। रात में क्या हुआ था? मुझे आवाज़ आई थी, आँगन की तरफ़।"
"कुछ नहीं। साइकिल का स्टैंड लग रहा था, वो गिर गई थी।"
"आधी रात को साइकिल का स्टैंड लगाने कौन जाता है?"
"मैं जाता हूँ। मेरा पेशा है।"
वो हँस पड़ी, पर उसकी हँसी में वो चीज़ थी जो बड़ी बहनों की हँसी में नहीं होती और छोटी बहनों की हँसी में होती है — थोड़ा डर।
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
"ये पकड़।"
"ये क्या है?"
"घंटी है। साइकिल की।"
"तो?"
"बजा।"
"क्यों?"
"बस बजा। दो बार।"
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उससे कहा हो कि जाकर आसमान से चाँद तोड़ लाओ। फिर उसने घंटी ली और दो बार बजाई।
टन। टन।
साधारण आवाज़। वो आवाज़ जो हर साइकिल की घंटी करती है। जिससे किसी की नींद नहीं उड़ती, किसी का दिल नहीं डूबता, कुछ नहीं होता।
"हुआ क्या?" उसने पूछा।
"तीन बार बजा।"
उसने तीन बार बजाई।
टन। टन। टन।
कुछ नहीं हुआ। माँ ने चूल्हे से कहा, "अब सुबह-सुबह घंटी क्यों बज रही है? काजल, छोड़ दे उसे।"
काजल ने घंटी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"लो। मरम्मत कर लो, आवाज़ में लगता है थोड़ा पानी घुसा है।"
मैंने घंटी अपने हाथ में ली।
और जैसे ही मेरी उँगली उसके ऊपर के पीतल के ढक्कन पर टिकी, मैंने उसे बजाया।
टन।
और आवाज़ आई।
"तू अब भी सोचता है कि ये सब तेरे दिमाग़ में है?"
मैं जैसे जम गया।
आवाज़ वही थी। रूखी। छोटी। बिना जल्दबाज़ी। और उसमें वो चीज़ थी जो लोग तब बोलते हैं जब वो जानते हैं कि तुम अभी मानने वाले नहीं हो।
काजल रोटी का डिब्बा खोल रही थी।
"भैया, क्या हुआ? ऐसे देख रहे हो जैसे कोई भूत देख लिया हो।"
"तूने सुना?"
"क्या सुना?"
"कुछ नहीं।"
"क्या सुना, भैया?"
"मैंने कहा कुछ नहीं, काजल।"
वो रुकी। उसने डिब्बा बंद किया और मेरी तरफ़ आई, और मेरे माथे पर हाथ रखा।
"भैया, तुम कम सो रहे हो। तुम दो रात से ठीक से नहीं सोए। और सुबह तुम्हारा चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे कोई काम अधूरा छूट गया हो।"
"काजल।"
"हाँ?"
"तू अगर कोई चीज़ बजाए और उसके अंदर से कोई बोले, और मुझे सुनाई न दे — तो तू क्या करेगी?"
वो एक पल रुकी। फिर उसने मेरी आँखों में देखा और बोली, "मैं सबको बता दूँगी। और सबको बताने से पहले मैं ये देखूँगी कि मुझे क्या सुनाई दिया था — क्योंकि अगर सिर्फ़ मुझे सुनाई दे रहा है, तो शायद मुझे ही कुछ सुनना है।"
मुझे उसकी बात समझ नहीं आई और ठीक उसी वक़्त मुझे यह भी समझ आ गया कि वो सही बोल रही है।
माँ ने आवाज़ दी, "काजल, अब देर हो रही है, खाना रख दे।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
और जब मैं बाहर निकल रहा था, मेरे दिमाग़ में एक बात ठीक से बैठ गई, जैसे कोई पेंच आख़िरी चक्कर में जाकर बैठ जाता है।
काजल ने घंटी तीन बार बजाई। उसके हाथ में कुछ नहीं हुआ।
मैंने एक बार बजाई और आवाज़ आ गई।
यानी ये चीज़ सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानती है।
और ये बात मुझे किसी चमत्कार जैसी नहीं लगी। ये बात मुझे ऐसी लगी जैसे कोई कह रहा हो — भाई, तेरे सिवा कोई नहीं है। तू अकेला है इस चीज़ में।
और मैंने उस सुबह पहली बार सोचा कि अगर ये सब सच है, तो इसका मतलब ये भी है कि मैं अब किसी को भी ये नहीं दिखा सकता। मैं किसी को भी ये साबित नहीं कर सकता। और जो इंसान किसी को कुछ साबित नहीं कर सकता, वो आख़िर में सिर्फ़ खुद को साबित करता रह जाता है।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे, चश्मा टेप से बँधा, हाथ में चाय का कप। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
मैंने भी उनकी तरफ़ नहीं देखा।
माँ ने कहा, "दुकान खोलने जा रहा है? चाय पीकर जा।"
"पी लिया।"
"झूठ बोल रहा है। कप वहीं रखा है।"
मैंने कप उठाया और दो घूँट में पी लिया, जबकि वो बहुत गरम थी, और मेरी जीभ जल गई, और मैंने कुछ नहीं कहा।
जब मैं दरवाज़े से निकल रहा था, तब काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।
"भैया।"
"हाँ।"
"पापा से बात हुई?"
मैंने सिर हिलाया।
वो मुस्कुराई। छोटी सी, थकी हुई मुस्कान।
"और? क्या बोले?"
"बोले — इसे मत बेचना।"
"किसे?"
"साइकिल को।"
काजल ने मेरा हाथ छोड़ दिया और उसका चेहरा बदल गया।
"तो मत बेचो।"
"काजल, माँ के दो टेस्ट बाकी हैं। तू जानती है ना?"
"जानती हूँ।"
"तो फिर?"
वो एक पल चुप रही, फिर बोली, "भैया, पैसे का रास्ता निकाल लेंगे। किसी तरह निकाल लेंगे। पर जो चीज़ पापा ने पहली बार बोलकर माँगी है, उसे मत बेचो। वो ज़िंदगी में कुछ नहीं माँगते।"
वो अंदर चली गई।
मैं सड़क पर खड़ा रह गया, और मुझे लगा कि आज सुबह सब लोग मुझसे ऐसी बातें कह रहे हैं जिनका जवाब मेरे पास नहीं है।
दुकान पर पहुँचकर मैंने शटर उठाया।
टेढ़ा बोर्ड अब भी वहीं टँगा था, एक कील से, जैसे कोई आदमी एक ही टाँग पर खड़ा हो। मैंने उसे उतारा और मेज़ पर रखा, और कील ठोकने लगा।
मेज़ के एक कोने पर वो पुराना बैग रखा था। सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी का।
कल सुबह वो आया था, बैग रखकर बोला था कि वो पापा का पुराना जानने वाला है और अपनी चीज़ लेने आया है, और फिर चला गया था ये कहकर कि शाम को आएगा।
शाम को नहीं आया।
रात को पापा आए, आँगन में, साइकिल के सामने।
और मैंने उस बैग को नहीं खोला। मैंने सोचा था — जो आदमी अपनी चीज़ लेने आएगा, वो खुद खोलेगा। पर अब मैं उस बैग को देख रहा था और मुझे लग रहा था कि वो बैग मेरी दुकान पर नहीं, मेरे सीने पर रखा है।
मैंने उसे उठाकर नीचे बेंच के नीचे रख दिया।
तभी टिंकू आ गया, स्कूल की कॉपी बगल में दबाए, घुटने पर पट्टी बदली हुई।
"उस्ताद!"
"हाँ।"
"आज आपका चेहरा ऐसा है जैसे आपने रात में किसी से झगड़ा किया हो।"
"किसी से झगड़ा नहीं किया। खुद से किया।"
"खुद से झगड़ा कैसे करते हैं?"
"बड़े हो जाओगे तो सीख जाओगे। और ये बताओ, स्कूल से भागकर आए हो?"
"नहीं। छुट्टी है।"
"छुट्टी कब से?"
"आज से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने आँखें चुरा लीं और साइकिल का पहिया घुमाने लगा।
"टिंकू।"
"हाँ उस्ताद।"
"छुट्टी है या तुमने छुट्टी कर दी?"
वो कुछ नहीं बोला।
"मैंने पूछा, टिंकू।"
"कल मास्टर ने कहा कि फीस का काग़ज़ लेकर आना। मैंने घर पर कहा तो माँ ने कहा कि अगले महीने देखेंगे। और मुझे लगा कि अगर मैं स्कूल जाऊँगा और काग़ज़ नहीं ले जाऊँगा, तो सबके सामने खड़ा कर देंगे।"
वो पहिया घुमाता रहा।
"तो बैठ जाओ यहाँ। मेरे पास काम है।"
"अच्छा?"
"हाँ। ये बोर्ड ठीक करना है। तेरे हाथ हल्के हैं।"
वो बैठ गया, और मैंने उसे कील और हथौड़ा दिया, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें लगता है कि कोई उन्हें बड़ा आदमी समझ रहा है।
मैं दिन भर दुकान पर बैठा रहा।
और मैं सच बताऊँ — मैं काम नहीं कर रहा था। मैं देख रहा था।
हर आने-जाने वाले को।
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