The Mysterious Bell14 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 14

7 min read November 5, 2026

वो मेरा ही घर है।

इसमें सब कुछ है — दीवार, छत, चूल्हा, दो कमरे, इतनी जगह कि दो लोग बिना टकराए चल सकें। पर अंदर से एक-एक चीज़ की जोड़ निकल गई है। माँ के हाथ हर काम करते हैं पर वो अपनी रिपोर्ट कपड़ों के नीचे छुपा देती हैं। पापा रोज़ काम पर जाते हैं और रोज़ वहीं बैठकर ख़ुद को तोड़ते हैं और बोलते नहीं। काजल इतनी छोटी है और उसने अपनी उम्र से दो गुना वज़न उठा लिया है। और मैं — मैं सबके सामने हँसता हूँ।

मैंने आँखें खोलीं और छत को देखा।

उस पल मुझे लगा कि अगर मेरा घर भी एक साइकिल होती, तो वो पिछवाड़े में खड़ी उस जंग लगी साइकिल जैसी होती। हैंडल टेढ़ा, चेन ढीली, और घंटी वाला ब्रैकेट खाली। और कोई जानने वाला भी नहीं कि इसमें क्या कमी है, क्योंकि हर कोई उसे देखकर कहता है — चल तो रही है ना।

घंटी ने हथेली में हल्की सी गरमाहट दी। कुछ नहीं बोली।

मैंने उसे जेब में दबाया और करवट ले ली।

कुछ देर बाद नींद की एक झपकी आई। ऐसी झपकी जिसमें सब कुछ अधूरा रहता है — मेले की लाइटें, मीरा का माइक, बबलू का पान चबाता चेहरा, और उसके पीछे दरवाज़े पर खड़ी एक परछाई जिसका चेहरा नहीं दिखता।

फिर आवाज़ आई।

ऊँची नहीं। बहुत ठंडी भी नहीं। पर ऐसी कि नींद एक झटके में कट गई, जैसे किसी ने तार खींच लिया हो।

"ये साइकिल तू कहाँ से लाया, अंकुश?"

पिछवाड़े से आई थी। पापा की आवाज़।

मैं उठकर बैठ गया।

आधी रात थी। घर में सब सो रहे थे। माँ के साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी — वही खाँसी वाली साँस, जो रात में थोड़ी और भारी हो जाती है। काजल की चूड़ियों की आवाज़ नहीं थी, यानी वो सो गई थी।

और पापा पिछवाड़े में थे। अंधेरे में। साइकिल के सामने।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी, जैसे हमेशा से ठंडी रही हो।

मैंने पूछना चाहा — कुछ कहूँ?

वो चुप रही।

मैंने दरवाज़े का नाम सुना। मैं खड़ा हुआ। मेरे घुटने में एक दर्द उठा, वही जो हमेशा रहता है जब मैं घबराता हूँ।

और उस रात, दरवाज़े की तरफ़ जाते वक़्त, मेरे दिमाग़ में एक ही बात थी —

कि मैंने उस्ताद से पूछा था कि साइकिल घर के किसी पुराने कोने में रखो।

कबाड़ी बूढ़े ने कहा था कि साइकिल को घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा करना।

और आज आधी रात को मेरे पापा उसी साइकिल के सामने खड़े होकर पूछ रहे थे कि मैंने उसे कहाँ से लाया।

मैंने दरवाज़ा खोला।

बाहर अंधेरे में पापा खड़े थे, और उनके हाथ में एक पुराना, जंग लगा, छोटा सा पीतल का टुकड़ा था — जो दिखने में ठीक मेरी जेब वाली घंटी के ब्रैकेट से मिलता था।

॥

पीतल का टुकड़ा उनकी हथेली में था और उस पर आँगन की उस अकेली बल्ब की पीली रोशनी पड़ रही थी, जो रात में कभी-कभी अपने आप झपक जाती है।

मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मैंने कुछ नहीं कहा।

पापा साइकिल के सामने खड़े थे। उनका एक हाथ हैंडल पर था। और वो उसे पकड़ नहीं रहे थे — वो उसे छू रहे थे। जैसे कोई बहुत पुराने ज़ख़्म को छूता है, धीरे-धीरे, ये देखने के लिए कि अब भी दर्द होता है या नहीं।

मुझे लगा कि कमरे में हवा भारी हो गई है।

"पापा?"

वो नहीं हिले। उनका हाथ हैंडल पर वैसे ही टिका रहा, उँगलियाँ रबर के उस घिसे हुए हिस्से पर, जहाँ से पकड़ते-पकड़ते रंग उतर गया था और अंदर का काला लोहा दिखने लगा था।

"ये साइकिल तू कहाँ से लाया, अंकुश?"

आवाज़ वही थी, पर कुछ बदला हुआ था। सुनने में लगा जैसे वो सवाल पूछ नहीं रहे, किसी पुराने काग़ज़ को खोल रहे हैं।

मैंने गला साफ़ किया।

"मेले से, पापा। एक कबाड़ी बैठा था, चुप्पा-चुप्पा। दो सौ में दे दी। मैंने सोचा — इतने में तो सिर्फ़ पहिया मिलता है बाज़ार में।"

पापा चुप रहे।

"और देखिए, चलती भी है। बस चेन ढीली है, ब्रेक की रस्सी बदलनी है, और पिछला मडगार्ड थोड़ा टेढ़ा है। कल दो घंटे लगेंगे, एकदम नई जैसी।"

मैं बोलता जा रहा था। मुझे पता था कि मैं बोलता जा रहा हूँ क्योंकि अगर मैं रुक गया तो उनकी चुप्पी मुझ पर गिर पड़ेगी।

"अंकुश।"

"जी?"

"मैंने पूछा — कहाँ से लाया।"

मैंने एक साँस ली।

"और मैं सोच रहा था, पापा, कि इसके पुर्ज़े बेचकर माँ की जाँच करवा दूँगा। हैंडल अलग, सीट अलग, पहिए अलग — कबाड़ी बाज़ार में इन्हीं पुराने पुर्ज़ों के अच्छे दाम मिलते हैं। दो टेस्ट बाकी हैं ना? उसके पैसे…"

मैंने बात अधूरी छोड़ दी, क्योंकि पापा ने हाथ हैंडल से हटा लिया था और मेरी तरफ़ देखा था।

और मैं क्या बताऊँ तुम्हें, उनकी आँखों में उस वक़्त क्या था। डर नहीं था, गुस्सा नहीं था। कुछ ऐसा था जैसे कोई आदमी बरसों बाद अपना ही पुराना खत पढ़ रहा हो, और खत में उसकी अपनी लिखाई हो।

"इसे मत बेचना।"

बस इतना कहा। दो शब्द।

और फिर वो मुड़े और अंदर चले गए। दरवाज़ा खुला रह गया, और हवा ने उसे धीरे से हिलाया।

मैं आँगन में अकेला खड़ा रह गया।

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।

"मत बेचना।" मैंने खुद से कहा, आवाज़ में वो ज़हर जो रात में थोड़ा और तेज़ हो जाता है। "बस? बस इतना? और माँ के टेस्ट का पैसा? और वो काग़ज़ जो कोई बार-बार दरवाज़े के नीचे से सरका रहा है? और वो बबलू जो मेरे मुँह पर बोल गया कि मेरी दुकान की जगह पर किसी की नज़र है?"

चुप्पी।

"मत बेचना। बहुत बढ़िया, पापा। मत बेचना। कुछ नहीं बेचना। कुछ नहीं कहना। कुछ नहीं करना। बस बैठे रहना और देखना कि सब अपने आप टूटता जाए।"

मैंने पत्थर पर लात मारी। पत्थर दीवार से टकराया और उछलकर साइकिल के पैडल पर लगा, और घंटी झनकी — एक छोटी, धातु वाली आवाज़।

मैं रुक गया।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ नहीं थी। मैं उसे जेब में रखना भूल गया था, वो साइकिल के हैंडल पर टँगी थी, जहाँ मैंने उसे सबसे पहले टाँगा था।

मैं उसके पास गया और मेरी नज़र साइकिल पर पड़ी।

और पहली बार मैंने उसे ध्यान से देखा।

आधी रात में, पीली बल्ब की रोशनी में, जब आस-पास कुछ नहीं था और देखने के सिवा कोई काम नहीं था।

सीट की चमड़ी सामने से नहीं, पीछे से ज़्यादा घिसी थी। जैसे सवार हमेशा आगे खिसककर बैठता हो। हैंडल के दोनों सिरों पर रबर घिसा था, पर बाएँ हाथ की तरफ़ थोड़ा ज़्यादा — क्योंकि कोई आदमी एक हाथ से सीटका और दूसरे से हैंडल पकड़ता होगा। पैडल का रबर दाएँ तरफ़ से ज़्यादा घिसा था। पिछले मडगार्ड पर एक गहरा बेंचा हुआ गड्ढा था, जैसे एक ही जगह पर बरसों एक ही ताले की चोट पड़ती रही हो।

और फ्रेम पर, पीछे की तरफ़, मैंने उँगली से धूल हटाई तो नीले रंग की एक पतली पट्टी दिखी, जिस पर कोई चीज़ लिखी थी और सब मिट चुका था।

मैंने हाथ पीछे कर लिया।

क्योंकि अचानक मुझे समझ आ गया कि पापा ने पूछा नहीं था कि मैंने इसे कहाँ से लिया।

उन्होंने पूछा था कि मैंने इसे कहाँ से लाया — और जवाब सुनकर चुप हो गए। जैसे जवाब उन्हें पहले से पता था। जैसे वो इस चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे।

मैंने घंटी पकड़ी और उसे हिलाया।

"बोल।"

कुछ नहीं।

"अरे, अब क्या चुप हो गई? कल रात तो खूब बोल रही थी। मुझे नल पर घसीटकर ले गई थी।"

घंटी ठंडी थी, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में रखकर छोड़ दिया हो।

"ठीक है। तेरी मर्ज़ी।"

मैंने उसे जेब में ठूँसा और अंदर चला गया, और तब मुझे पता चला कि मुझे नींद नहीं आएगी। मैं करवट बदलता रहा, और छत पर उसी बल्ब की रोशनी का एक पीला धब्बा नाचता रहा, और मेरे दिमाग़ में पापा का वो एक वाक्य घूमता रहा — इसे मत बेचना।

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