The Mysterious Bell – Chapter 13
माँ उठीं और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। वो हर समय गरम रहती हैं — चूल्हे के पास ज़िंदगी बिताने वाली औरत के हाथ ठंडे कैसे हो सकते हैं, ये आज पहली बार समझ आया।
"इधर आ," उन्होंने कहा। "खाना लगाऊँ।"
"माँ, पापा बाहर गए हैं —"
"वो आ जाएँगे।" उनका हाथ मेरी कलाई पर सख़्त हो गया। "बात बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है, अंकुश। खाना ठंडा हो रहा है।"
मैं पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर झाँक सकता था। दरवाज़ा खुला था। बाहर अंधेरा था और उस अंधेरे में पापा खड़े थे।
मैंने चुपचाप झाँका।
वो साइकिल के ठीक सामने खड़े थे। हाथ नीचे लटके हुए। सिर झुका हुआ। मुझे ऐसा लगा जैसे वो किसी से बात कर रहे हैं, पर उनके होंठ नहीं हिल रहे थे। बस वो उसे देख रहे थे। उस जंग लगी, टूटी, खड़खड़ाती साइकिल को देख रहे थे, जिसे मैंने दो दिन पहले मेले में एक चुपचाप बैठे कबाड़ी बूढ़े से दो सौ रुपये में खरीदा था।
और फिर मैंने देखा कि उनके कंधे हल्के से काँप रहे हैं।
बहुत हल्के से। इतने हल्के से कि अगर मैं ठीक से न देखता तो पता भी न चलता। पापा पचपन साल के हैं और मैंने उन्हें कभी रोते नहीं देखा। एक बार मेरी उँगली कट गई थी, बहुत खून बहा था, तब भी वो चुपचाप पट्टी बाँधकर चले गए थे। माँ की तबीयत खराब होती है तो वो बाहर जाकर खड़े रहते हैं। यही उनका रोना है।
पर आज कंधे काँप रहे थे।
मैं आगे नहीं बढ़ा। आज तक मुझे इस बात का एहसास है कि उस रात मैं आगे क्यों नहीं बढ़ा। शायद डर से। शायद इसलिए कि अगर मैं उनके पास जाता और वो मुड़कर देखते, तो मुझे कुछ कहना पड़ता। और मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
माँ ने मुझे खींचकर अंदर कर दिया और दरवाज़ा आधा बंद कर दिया।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
थाली में रोटी रखी। रोटी वो वाली, जो वो हमेशा मेरे लिए बनाती हैं — किनारों पर ज़्यादा सिंकी हुई, क्योंकि मुझे वो ख़ास पसंद है और मज़ाक करने पर वो कहती हैं कि मेरी शक्ल बर्बाद हो गई है, सारा सुख जले हुए किनारों में है। आज वो किनारे भी मुझे जले हुए लग रहे थे।
काजल ने मेरे सामने बैठकर अपनी थाली खींच ली। वो कुछ नहीं बोली। और काजल का कुछ न बोलना — ये सबसे बड़ा ख़तरा है। वो दिन में चौदह बार मेरी हँसी उड़ाती है, मेरी जीन्स के घुटने पर टिप्पणी करती है, मेरे ग्रीस लगे हाथों पर चिढ़ती है। आज वो चुपचाप रोटी को टुकड़ों में तोड़ रही थी।
मैंने एक रोटी उठाई और मज़ाक करना चाहा।
"अरे, इतना सन्नाटा क्यों है? क्या कोई मुर्दे की नींद खराब हो गई है? मैं तो —"
"खा।" माँ ने कहा।
बस इतना। एक शब्द।
मैं खा गया।
और मुझे अपनी ही आवाज़ अजीब लगने लगी। मैंने अपनी हँसी पर झूठ बोलना छोड़ दिया — बोलता हूँ, पर उस रात लगा कि मैं हँस नहीं रहा, सिर्फ़ ऐसा दिखा रहा हूँ। जैसे किसी बंद कमरे में सिग्नल न आ रहा हो और फ़ोन की स्क्रीन पर सिर्फ़ एक काला घेरा घूम रहा हो।
पाँच मिनट बाद पापा अंदर आए।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। अपनी थाली उठाई, घुटनों के बल नीचे बैठे, और खाने लगे। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। चश्मा आज भी कान पर टेप से बँधा था। वो टेप का रंग पीला पड़ चुका है, वो उसे दो साल से बदलने की सोच रहे हैं।
खाने के बाद काजल ने बर्तन उठाए। माँ कॉपी के पास लौट गईं। पापा वहीं दीवार से टिककर बैठ गए और अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रखकर उन्हें देखने लगे, जैसे दूसरे के कुछ हो गया हो।
मैं चुपचाप उठा।
छत पर गई हुई हवा थी। हमारे घर की छत छोटी है, पर रात में वहाँ से पूरी गली दिखती है — चबूतरी, नल, पुल, और आगे नई बस्ती की रोशनी। मैं वहाँ बैठ गया और जेब से घंटी निकाल ली।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "आज तू चुप क्यों है?"
घंटी ने लंबा वक़्त लिया। इतना लंबा कि मुझे लगा वो आज बोलेगी ही नहीं। फिर वही रूखी आवाज़ आई, जैसे किसी पुराने लोहे के दरवाज़े की सिटकनी।
"क्योंकि आज घंटी नहीं, तेरे पापा की बारी है।"
"इसका मतलब क्या हुआ?"
"इसका मतलब हुआ कि आज रात तुझे बोलने वाला मैं नहीं हूँ।"
"तू पहले भी यही कह रही थी कि कुछ मत पूछ। तू मुझे कुछ नहीं बताती।"
"मैं तुझे वो बताती हूँ जो तुझे सुनना चाहिए। सुनना वो नहीं होता जो तुझे अच्छा लगे।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। गरम हो रही थी।
"आज पापा को देखकर ऐसा लगा कि उनको मेरे हँसने का मन नहीं था," मैंने कहा। "पर मैं हँसता रहा। आदत है।"
घंटी चुप रही। शायद वो इस बात से सहमत थी। शायद उसे कहना नहीं था।
नीचे से काजल आई। वो छत के दरवाज़े पर खड़ी रही, फिर आकर मेरे पास बैठ गई। उसने अपने घुटनों को गले से लगाया।
"वो सच में बोलती है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"और क्या बोलती है?"
"कभी कुछ नहीं। कभी आधी बात। मुझे लगता है वो मुझसे ज़्यादा जानती है और मुझे कम बताती है।"
काजल ने घंटी को देखा पर छुआ नहीं। वो अंदर से साफ़-सुथरी है, मेरी बहन। जो चीज़ रखी है वो अपनी नहीं उठाती।
"अंकुश," उसने कहा, "तूने माँ की पर्ची पढ़ ली है ना?"
मैं चौंका। मैंने पापा को बताया था, किसी को नहीं। पर माँ की बातें पढ़ने वाला मेरा चेहरा सबसे पहले काजल ही पढ़ लेती है।
"कैसे पता?"
"तेरा चेहरा। तू सुबह से ऐसे घूम रहा है जैसे किसी ने तेरे साइकिल से हवा निकाल दी हो।" उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। "जिस रकम के बारे में मैं तुझसे झूठ नहीं बोल सकती, वो मैंने तुझसे छुपाई थी। पापा ने छुपाया। माँ ने छुपाया। सब एक ही डिब्बे में बैठे किसी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और नतीजा ये है कि कोई किसी से बोल नहीं रहा।"
"तूने मुझसे क्यों नहीं कहा?" मैंने पूछा। गुस्से में नहीं, थकावट में।
"क्योंकि माँ ने कहा था कि तू अपनी सारी कमाई उसी पर लगा देगा और फिर हम सब एक साथ डूबेंगे।"
मैं हँसा। छोटी, सूखी हँसी।
"और ऐसे हम डूब नहीं रहे?"
काजल ने जवाब नहीं दिया।
थोड़ी देर बाद वो उठी और दरवाज़े की तरफ़ गई। फिर रुकी, और बिना मुड़े बोली, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"पापा से पूछ लेना।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "मैं जानती हूँ कि तू सब अकेले सँभालने की ज़िद करता है। पर कभी कभी सबसे बड़ी मर्दानगी ये होती है कि तू बैठकर पूछ ले कि सच क्या है।"
वो चली गई।
मैं वहीं बैठा रहा। घंटी जेब में डालकर सीढ़ियों से नीचे उतरा। घर सो रहा था। माँ का चूल्हा ठंडा था। हमारे घर में चूल्हा सुबह पाँच बजे जलता है और उस वक़्त से पूरा घर उसी आग पर चलता है। कभी सोचता हूँ कि माँ के हाथ इतनी मेहनत करते हैं और उनकी रिपोर्ट में बस एक आँकड़ा लिखा होता है जो हमारी पूरी ज़िंदगी तय कर देता है।
मैंने अपना बिस्तर खोला। चटाई पर लेटा। आँखें बंद कीं।
बाहर गली में कोई कुत्ता तीन बार भौंका और फिर चुप हो गया। पिछवाड़े से कोई आवाज़ नहीं आई। मुझे लगा पापा सो गए होंगे।
लेकिन मेरी नींद नहीं आई।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को हथेली में दबा लिया। ठंडी थी। फिर उसकी ठंडक मेरी हथेली से मिलकर गरम होती गई।
और मैं जिस चीज़ के बारे में सोचना नहीं चाहता था, वो आ गई।
मैंने सोचा — मैं दिन भर टूटी चीज़ें ठीक करता हूँ। पंचर, चेन, ब्रेक की रस्सी, हैंडल, सीट, गियर, किसी का कटा हुआ तार। लोग मेरे पास ऐसी चीज़ें लेकर आते हैं जो दो रुपये की होती हैं और उन्हें ठीक कराने के लिए तैयार हो जाते हैं। पर एक चीज़ है जो टूटी पड़ी है और जिसे किसी ने ठीक कराने की कोशिश नहीं की।
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