The Mysterious Bell12 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 12

7 min read November 5, 2026

उसने मेरी तरफ़ देर तक देखा। फिर उसने चूड़ियों का एक बंद डिब्बा उठाया, जो गिरते वक़्त बच गया था, और मेरी झोली में रख दिया।

"पैसे नहीं लूँगा," उसने कहा।

"पैसे तो मैं दूँगा ही नहीं, काका," मैंने हँसकर कहा। "मैं तो इन्हें मुफ़्त ले जा रहा हूँ। पर एक दिन आप मेरी दुकान पर आइए, अपनी गुमटी का पहिया ठीक करवाइए। वो गुमटी हिलती है, मैंने देखा है। वो हिलती है तो आपका काम भी हिलता है।"

वो बूढ़ा पहली बार हँसा। उसकी हँसी में दाँत कम थे, पर आवाज़ भरी हुई थी।

मैं घर की तरफ़ चला।

रास्ते में घंटी जेब में ठंडी हो चुकी थी। मैंने पूरे रास्ते उसे टोका नहीं। मुझे गुस्सा था उस पर। उसने मुझे बताया था कि वो औरत मुझे ठग समझेगी, और उसने मुझे बबलू के बारे में एक शब्द नहीं बताया था। उसने मुझे वो बात नहीं बताई जो सबसे ज़रूरी थी।

मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को उँगलियों में पकड़ लिया।

"सुन," मैंने धीरे से कहा, "तूने मुझे बताया था कि वो डरता है। पर ये नहीं बताया कि वो मेरी साइकिल का नाम लेगा।"

एक लंबी चुप्पी। फिर वैसी ही रूखी आवाज़, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खुल रही हो।

"मैंने तुझे बताया था कि वो डरता है," घंटी ने कहा। "ये तुझे समझना था कि डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा देखता है।"

मैं चलता रहा। गली का मोड़ आया। पीतल की घंटी मेरी हथेली में गरम हो रही थी।

"अब सुन," घंटी ने कहा। "कल सुबह दुकान खोलना। कोई आएगा।"

"कौन?"

"जो अपनी चीज़ लेने आएगा। और उसके साथ एक बात लाएगा जो तेरे दुकान के बोर्ड से ज़्यादा भारी है।"

"और तू मुझे ये क्यों नहीं बता सकती पूरा?"

"क्योंकि मैं तेरा नौकर नहीं हूँ।"

मैं रुक गया और हँस पड़ा। रात की गली में मेरी हँसी किसी दरवाज़े से टकराकर लौटी।

"अच्छा," मैंने कहा, "पर एक बात और। आज तू मेरे साथ थी। तूने बबलू को देखा?"

घंटी एक पल चुप रही।

"देखा," उसने कहा। "और एक चीज़ और देखी।"

"क्या?"

"जब वो तुझे धमका रहा था, तब उसकी आँखें मेले के दरवाज़े पर थीं। किसी को ढूँढ रहा था। मतलब वो अकेला नहीं आया था, और जो उसके साथ आया था, वो सामने नहीं आया।"

मेरी हँसी मर गई।

"तू ये अब बता रही है?"

"अब समझ आई। इसीलिए बता रही हूँ।"

॥

रात के ग्यारह बज चुके थे और गली ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने उसका आवाज़ वाला बटन दबा दिया हो। दिन में यहाँ इतना शोर रहता है कि कान दुखने लगते हैं — चाय की केतली की सीटी, उस्ताद की सिलाई मशीन की टिक टिक, दो बच्चों की बहस कि पहले कौन बल्लेबाज़ी करेगा, और ऊपर से ट्रकों की घरघराहट जो पिछले कुछ हफ़्तों से हमारी गली का नया संगीत बन गई है।

पर रात में यही गली अजनबी लगती है।

मैं चल रहा था और मेरी चप्पल की आवाज़ भी मुझे अपनी नहीं लग रही थी। पीपल के पेड़ के नीचे पत्थर की चबूतरी खाली पड़ी थी। बुज़ुर्ग वहाँ दिन में बैठते हैं, चार बजे के बाद। उस वक़्त चबूतरी पर सिर्फ़ एक बंदर बैठा था, जो मुझे देखकर भाग गया — जैसे मुझसे भी कुछ पूछना नहीं चाहता।

मैंने उस्ताद की दुकान की तरफ़ देखा। तीसरे दिन भी ताला। मैंने शटर पर हाथ रखा तो धूल उँगलियों से चिपक गई। धूल का मतलब होता है कि कोई नहीं आया। न कोई खोला, न कोई बंद किया। बस शटर वैसे ही पड़ा है, जैसे कोई बात अधूरी छोड़कर चला गया हो।

"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "आप कहाँ हो?"

जवाब नहीं आया। और मुझे अजीब लगा कि जब जवाब की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तब आसपास कोई नहीं होता। न उस्ताद, न पापा। दोनों आदमी हैं जो बोलते कम हैं, और आज दोनों ही गायब हैं।

मैं आगे बढ़ा। शबनम आपा की गुमटी पर एक लालटेन जल रही थी, बहुत धीमी। वो अभी नहीं सोई थी। मुझे देखकर खिड़की से बाहर झाँका और सिर्फ़ इतना कहा, "खाना खा लेना। तीन दिन से तेरा चेहरा भूखा लग रहा है।"

मैंने हाथ जोड़े और आगे बढ़ गया। यही तो हमारी गली है। यहाँ कोई आपसे पूछता नहीं कि तुम ठीक हो क्या। यहाँ लोग सीधे खाना दे देते हैं और यह मान लेते हैं कि तुम समझ जाओगे।

घर का दरवाज़ा खुला था। माँ का ढंग है — जब तक आख़िरी बच्चा घर न आए, दरवाज़ा बंद नहीं होता। पिछवाड़े में मैंने साइकिल खड़ी की। उस पुरानी जंग लगी साइकिल को मैंने घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा किया, जैसे कबाड़ी बूढ़े ने कहा था। और आज पहली बार मुझे लगा कि वो सलाह सिर्फ़ सलाह नहीं थी। वो कुछ और थी जो मैं अभी समझ नहीं पा रहा था।

जब मैंने हैंडल छोड़ा, तो साइकिल की जंज़ीर हल्की सी खड़खड़ाई। मैंने उसे देखा। धूप में तपी हुई, जंग से भरी, हैंडल पर वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट, जहाँ पहले घंटी बैठती थी। उस ब्रैकेट को देखकर मुझे रोज़ ऐसा लगता था जैसे किसी के सिर से ताज उतारकर अलग रख दिया गया हो।

अंदर आया तो माँ हिसाब की कॉपी पर झुकी हुई थीं। उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था, और उँगली काग़ज़ पर ऐसे चल रही थी जैसे कोई गिनती भूल गया हो और दोबारा गिन रहा हो। सामने वाले कोने में पापा बैठे थे। वो कुछ नहीं कर रहे थे। बस बैठे थे। उनके हाथ में एक पुराना पेचकस था जिसे वो घुमा रहे थे, बिना किसी औज़ार पर लगाए। काजल नर्सिंग की किताब खोलकर बैठी थी, पर उसकी आँखें पन्नों पर नहीं थीं।

मुझे देखकर माँ ने चश्मा उतारा।

"खाना रखा है," उन्होंने कहा। "ठंडा हो गया है। गरम कर दूँ?"

और मुझे उस वक़्त कुछ ऐसा सूझा जो मुझे नहीं सूझना चाहिए था। थकान थी, दिन भर का गुस्सा था, बबलू का हाथ गले पर था, मीरा का माइक सामने था, उस्ताद की बंद दुकान थी, और पापा वहाँ बैठे थे — पूरे दिन घर नहीं आए थे, और अब आए हैं तो कुछ नहीं बता रहे।

तो मैंने जेब से घंटी निकाल ली।

पीतल की वही घंटी। पुरानी, घिसी हुई, ऊपर की तरफ़ एक छोटी सी दरार, जो सिर्फ़ अच्छी रोशनी में दिखती है। मैंने उसे हवा में उठाया और हँसते हुए कहा, "पापा, ये घंटी बोलती है। सच में बोलती है। आप आज से सुन लीजिए। आपकी चुप्पी का इलाज मिल गया है।"

मैंने यह इसलिए कहा कि मैं हँसाना चाहता था। मैं यह चाहता था कि पापा सिर उठाएँ, झिड़कें, कहें कि पागल हो गया है, और फिर माँ हम दोनों को डाँटे और घर में कुछ आवाज़ हो। मुझे बस आवाज़ चाहिए थी। उस वक़्त मुझे यह नहीं पता था कि आवाज़ के लिए उठाया गया यह हाथ मेरे घर में क्या कर देगा।

पापा नहीं हिले। एक सेकंड नहीं हिले। फिर उनकी नज़र मेरी ओर से हटकर उस घंटी पर पड़ी।

और फिर जो हुआ, वो मैं आज तक भूल नहीं पाया।

उनका पेचकस उनके हाथ से छूटा। फ़र्श पर गिरा, एक बार उछला, दो बार घूमा, और रुक गया। पापा का चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने उनके सीने पर पत्थर रख दिया हो और वो साँस लेने के लिए मुँह खोल रहे हों, पर साँस न आ रही हो। उनकी आँखें घंटी पर टिकी रहीं। बहुत देर तक। इतनी देर तक कि माँ ने कॉपी बंद कर दी और काजल की किताब उसके हाथ से फिसल गई।

"पापा?" मैंने कहा।

वो नहीं बोले। वो उठे। उठते वक़्त उनका हाथ मेज़ पर टिका और मेज़ की एक टाँग हिली — हमारी मेज़ की लोहे की टाँग आज भी हिलती है, मैं तीन महीने से उसे ठीक करने की सोच रहा हूँ।

वो पिछवाड़े की तरफ़ चले।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र में एक अजीब सी चीज़ थी — डर नहीं, डर से एक कदम आगे की चीज़। जैसे उसे कुछ पता हो और वो मुझे बता न पा रही हो।

"मैंने कुछ गलत कहा?" मैंने पूछा।

"नहीं," काजल ने धीरे से कहा। "तूने कुछ गलत नहीं कहा।"

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