The Mysterious Bell11 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 11

7 min read November 5, 2026

सैकड़ों चूड़ियाँ ज़मीन पर गिरीं। काँच की आवाज़ ऐसी उठी जैसे किसी ने हँसी को तोड़कर फेंक दिया हो। कुछ चूड़ियाँ नहीं टूटीं, वो ज़मीन पर लुढ़कती रह गईं, और वो लुढ़कना उस बूढ़े की ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था। बूढ़ा नीचे बैठ गया और दोनों हाथों से चूड़ियाँ समेटने लगा, बिना एक शब्द कहे।

लोगों ने देखा। सबने देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा।

मेरे अंदर कुछ हुआ। मैं नहीं बता सकता कि वो गुस्सा था या वो शर्म जो दूसरों की बेइज़्ज़ती देखकर होती है। पर मेरे पैर खुद आगे बढ़ गए।

"भाई साहब," मैंने कहा, "हाथ धीरे। ये गुमटी इनकी रोटी है।"

चारों तरफ़ चुप्पी। मीरा का कैमरा मेरी तरफ़ घूम गया।

बबलू ने धीरे से मुड़कर देखा। जैसे कोई बड़ा जानवर ये तय कर रहा हो कि जो आवाज़ आई है, वो खाने की चीज़ है या नहीं।

"तू कौन है?"

"मैं साइकिल वाला हूँ। गली के मोड़ पर। आप मेरी दुकान के सामने से कई बार गुज़रे हैं। एक बार मेरे पंप से हवा भी भरी थी, और पैसे नहीं दिए थे। मैंने कुछ नहीं कहा था, क्योंकि मुझे लगा था कि आप भूल गए होंगे। पर अब लगता है आपको भूलने की बीमारी है, भाई साहब।"

भीड़ में कोई हँसा। बस एक। और बबलू का चेहरा बदल गया।

वो मेरे पास आया। उसका पेट मेरे पेट से टकराने की दूरी पर था। उसकी साँस में पान और तंबाकू की बदबू थी।

"साइकिल मिस्त्री," उसने कहा, "बहुत बोलने लगा है।"

"बोलना मेरा पेशा है, भाई साहब। जो ठीक नहीं होता, उसके बारे में बोलना पड़ता है। जो ठीक हो जाता है, उसके बारे में चुप रहता हूँ।"

उसका हाथ बढ़ा और मेरा गला पकड़ लिया।

मैं झूठ नहीं बोलूँगा — उस पल मेरे अंदर जो पहली चीज़ उठी, वो गुस्सा नहीं था। डर था। ठंडा, सीधा, बच्चों वाला डर। गला पकड़े जाने पर आदमी की आवाज़ छोटी हो जाती है, चाहे वो कितना ही बड़ा बोलने वाला हो।

पर मेरी जेब में घंटी थी।

और घंटी ने कहा।

इतना धीरे कि मुझे लगा मैंने सुना, और फिर लगा कि मैंने खुद सोचा।

"ये डरता है।"

मैंने बबलू की आँखों में देखा।

और मैंने देखा। उसकी पकड़ मज़बूत थी, पर उसकी आँखें मेरी आँखों से नहीं मिल रही थीं। वो मेरे कंधे के पीछे देख रहा था। भीड़ की तरफ़ नहीं — भीड़ के पीछे, मेले के दरवाज़े की तरफ़। जैसे उसे डर था कि कोई आ रहा है।

"भाई साहब," मैंने धीरे से कहा, गला दबा हुआ था, आवाज़ फट रही थी, "आप मुझे छोड़ दीजिए। मुझमें दम नहीं है। मैं दुबला आदमी हूँ, मेरे साथ ये ज़ुल्म अच्छा नहीं लगता।"

उसने पकड़ थोड़ी ढीली की, पर छोड़ा नहीं।

"सुन," उसने कहा, "तेरी दुकान की जगह पर एक बड़े साहब की नज़र है। वो जगह मोटी है। तेरी दुकान उस जगह पर ऐसे बैठी है जैसे हाथी के रास्ते में चींटी। समझा?"

"समझ गया। पर एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"वो बड़े साहब को मेरी दुकान में ऐसा क्या दिखा जो मुझे नहीं दिखा? क्योंकि मैं वहाँ तीन साल से बैठा हूँ और मुझे तो वहाँ सिर्फ़ तेल, ग्रीस और एक टूटी कुर्सी दिखती है।"

बबलू हँसा। पर उसकी हँसी में मज़ा नहीं था। उसने मेरा गला छोड़ दिया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा, जैसे कोई भाई नसीहत दे रहा हो।

"तेरे जैसे लोग सोचते हैं कि दुकान ज़मीन पर खड़ी होती है। दुकान काग़ज़ पर खड़ी होती है, बेटा। और काग़ज़ किसी के हाथ में होता है। तेरे हाथ में क्या है? पेचकस?"

पीछे मीरा का कैमरा चल रहा था। मैंने उसे कोने से देखा — वो बिल्कुल स्थिर खड़ी थी, हाथ ऊपर, और उसके होंठ हिल रहे थे। बाद में मुझे पता चला कि वो उस वक़्त अपनी आवाज़ में क्या कह रही थी। वो कह रही थी — ये पहला सबूत है, ये पहला सबूत है, इसे नहीं जाने देना।

बबलू ने मेरी जेब की तरफ़ अनजाने में देखा। बस एक पल। फिर उसने अपना पान का पीक थूका, मेरे पैर से दूर, और कदम पीछे किया।

और फिर वो रुका।

ये चीज़ मुझे आज तक चुभती है। आदमी जब जाता है तो चला जाता है, पर ये आदमी रुका। मुड़ा। मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो अब तक नहीं थी — न गुस्सा, न धमकी। कुछ और। जैसे उसने कुछ देखा हो जो उसे नहीं देखना चाहिए था।

वो मेरे पास आया और बहुत धीरे से कहा, इतना धीरे कि मीरा का कैमरा भी नहीं पकड़ सका, और भीड़ के शोर में वो सिर्फ़ मेरे लिए था।

"अपनी उस जंग लगी साइकिल का हैंडल बदल लेना। वरना कोई उसे उखाड़कर फेंक देगा।"

मेरे पूरे शरीर से खून गिर गया।

उसने मेरे चेहरे का रंग देखा और हँसा। फिर अपने उन दो आदमियों के साथ मेले की दूसरी तरफ़ चला गया, और लोग उसके रास्ते से ऐसे बच रहे थे जैसे रास्ते से नहीं, किसी आफ़त से बच रहे हों।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

जंग लगी साइकिल। मैंने वो साइकिल दो दिन पहले खरीदी थी। दो दिन। मैंने इसके बारे में किसी को नहीं बताया था, सिवाय अपने घर वालों के और टिंकू के।

और वो साइकिल घर के पीछे खड़ी थी।

मीरा मेरे पास आई। उसने कैमरा बंद किया और पहली बार माइक नीचे की।

"तुम ठीक हो?"

"हाँ।"

"झूठ। तुम्हारा चेहरा सफ़ेद है।"

"मेरा चेहरा हमेशा सफ़ेद है, मैडम। मैं दुकान के अंदर रहता हूँ, धूप नहीं मिलती।"

उसने आँख सिकोड़कर देखा। फिर उसने वही किया जो मुझे उससे उम्मीद नहीं थी। उसने अपना बैग खोला, उसमें से एक पानी की बोतल निकाली, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"पी लो," उसने कहा। "और अब सच बताओ। वो तुम्हारे कान में क्या कहकर गया?"

मैंने पानी पिया। पानी गले में जाता हुआ, जहाँ उँगलियाँ थीं, वहाँ जल रहा था।

"मैडम," मैंने कहा, "आप पत्रकार हैं। आपको सबूत चाहिए। ये लीजिए सबूत — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के ट्रक तीन हफ़्ते से बाज़ार के पीछे वाले खाली प्लॉट में मिट्टी डाल रहे हैं। रात में। बिना बोर्ड के। पीछे क्या बन रहा है, ये मुझे नहीं पता। पर वो मिट्टी साफ़ प्लॉट में नहीं डाली जाती। वो मिट्टी नींव के लिए होती है।"

मीरा कुछ सेकंड मेरी तरफ़ देखती रही।

"तुम ये बात मुझे क्यों बता रहे हो?"

"क्योंकि आपने मुझे ठग कहा, और मुझे ठग बनने का शौक़ नहीं है। मैं चाहता हूँ कि आप अपना काम करें। मुझमें भरोसा नहीं है, ठीक है, मुझ पर भरोसा मत कीजिए। पर ट्रकों पर भरोसा कीजिए। वो रात में चलते हैं, और रात में चलने वाली चीज़ें हमेशा कुछ छिपाती हैं।"

उसने कैमरा बैग में रखा। उसका फटा बैग ऐसे लटका जैसे उसने अपनी पूरी ज़िंदगी उसमें ठूँस रखी हो।

"मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ूँगी," उसने कहा। "पर अगर कल वो बोर्ड फिर लगा दिखा, तो मैं उस पर तुम्हारा चेहरा भी लगा दूँगी।"

"और अगर वो बोर्ड तीसरी बार कहीं और लगा दिखा," मैंने कहा, "तो आप मुझे फ़ोन कीजिए। मेरा नंबर शबनम आपा की गुमटी के पास लिखा है, उनके हिसाब वाली कॉपी के पीछे। मैं वहाँ उधार का हिसाब चुकाने जाता हूँ, तो नाम भी लिख देता हूँ।"

मीरा पहली बार मुस्कुराई। बहुत छोटी सी। एक सेकंड भी नहीं। फिर चली गई, भीड़ में, अपनी जल्दबाज़ी वाली चाल में।

मैं वहीं रुका रहा और मेले को देखता रहा। बूढ़ा अब भी चूड़ियाँ समेट रहा था। चारों तरफ़ काँच के टुकड़े चमक रहे थे, और मेले की लाइटों में वो रोशनी ऐसी लग रही थी जैसे ज़मीन पर तारे टूटकर गिरे हों।

मैं उसके पास गया और बैठ गया।

"काका," मैंने कहा, "ये चूड़ियाँ मुझे दीजिए। मेरी बहन है, उसे दे दूँगा।"

वो बूढ़ा मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी आँखें सूखी थीं, और यही सबसे बुरा था। रोने वाले आदमी को आदमी सहलाकर चुप करा सकता है। सूखी आँखों वाले को क्या करेगा?

"बेटा," उसने कहा, "ये सब टूटी हैं।"

"मुझे टूटी ही चाहिए," मैंने कहा। "मेरा पूरा काम टूटी चीज़ों का है।"

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