The Mysterious Bell – Chapter 209
मैंने काग़ज़ पढ़ा। टिंकू ने अपने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था — "अंकुश भैया रात को डर के मारे गली छोड़कर जाने की सोच रहे हैं। दुकान में सामान भी बाँध रहे थे। पापा ने मना किया तो रोए। घंटी साथ ले जाने की बात कर रहे हैं। हमने सुना है।"
मैंने पढ़ा और एक पल के लिए मेरी साँस रुकी।
"टिंकू," मैंने कहा, "ये तूने लिखा?"
"हाँ भैया," उसने कहा। "पर ये झूठ है।"
"ये सिर्फ़ झूठ नहीं है," मैंने कहा। "ये झूठ का जाल है। इसे पढ़कर कोई भी मान लेगा कि मैं रात को भाग रहा हूँ। और अगर कोई मान ले कि मैं भाग रहा हूँ, तो वो रात को मेरी दुकान खाली पाकर कहेगा — 'देखा, हमने कहा था ना।'"
"तो फिर?" सानिया ने कहा।
"तो फिर," मैंने कहा, "हम उन्हें वही देंगे जो वो माँग रहे हैं। एक खाली दुकान। एक भागता हुआ आदमी।"
मैंने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा।
"ये काग़ज़ तूने बबलू को दिया?"
"हाँ भैया। उसने लिया। पढ़ा नहीं, पर अपने आदमी को दिया और बोला — 'साहब को भेज।'"
"अच्छा," मैंने कहा।
"और भैया," टिंकू ने कहा, "उसने हँसकर कहा — 'अब तो ये लड़का गया।' और उसके मुँह में पान था, भैया। पान की पीक गिरी और वो हँसा।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो गर्म थी। गर्म, और थोड़ी काँपती हुई।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब सुनो, ये काग़ज़ मेरे पास रहेगा।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रख लिया।
"भैया," गुड्डू ने कहा, "अगर वो रात को आए और दुकान खाली मिले, तो?"
"तो," मैंने कहा, "वो वापस जाएगा और कहेगा — 'वो भाग गया।' और जिस दिन कोई यह मान लेगा कि गली में एक लड़का डरकर भाग गया, उस दिन गली डर जाएगी।"
"तो फिर हम क्या करें?" चिंटू ने कहा।
"हम उन्हें वो दुकान दिखाएँगे," मैंने कहा, "जो भागी हुई है। पर हम उन्हें वो गली नहीं दिखाएँगे जो डरी हुई है।"
चारों बच्चे मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनकी आँखों में समझ भी थी और उत्साह भी।
"अब जाओ," मैंने कहा। "और अगर बबलू फिर टॉफ़ी दे, तो ले लेना।"
"और अगर वो फिर कुछ पूछे?" रफ़ीक़ ने कहा।
"कुछ नई बात बताना। कहना — भैया ने रात को अपना बैग भी बाँध लिया है।"
"ये झूठ है ना?"
"हाँ," मैंने कहा। "झूठ है। और यही तो काम का है।"
बच्चे हँसते हुए गए।
फिर शबनम आपा आईं। उनके हाथ में थाली थी और उस थाली में दो कटोरी चाय थी, दो समोसे थे और एक कटोरी में पानी। उन्होंने थाली मेरी मेज़ पर रखी।
"खा," उन्होंने कहा।
"आपा," मैंने कहा, "मैंने कुछ नहीं माँगा।"
"मैंने भी नहीं पूछा," उन्होंने कहा। "खा।"
मैंने समोसा उठाया और एक कौर लिया। फिर मैंने उन्हें सब बताया — टॉफ़ी, बबलू, टिंकू का काग़ज़, सफ़ेद कुर्ते वाले का मुफ़्त नल। शबनम आपा चुप सुनती रहीं। उन्होंने एक बार भी बीच में नहीं रोका।
जब मैं खत्म हुआ, तो उन्होंने कटोरी उठाई और एक घूँट चाय पी। फिर उन्होंने कहा — "मुफ़्त का नल और मुफ़्त की टॉफ़ी, दोनों में एक ही डोर बँधी होती है।"
"मतलब?"
"मतलब ये," उन्होंने कहा, "कि जो चीज़ मुफ़्त में मिलती है, उसका दाम कहीं और से कटता है। जिस जगह कटता है, वहाँ तुम होते हो। तुम्हें पता नहीं चलता कि कब कटा।"
उन्होंने कटोरी नीचे रखी।
"और बबलू," उन्होंने कहा, "वो टॉफ़ी देकर तुम्हारी खबर पूछ रहा है। यानी अब वो डरा हुआ है। जो आदमी डरता है, वो बच्चों से पूछता है।"
"और साहब?"
"साहब," शबनम आपा ने कहा, "साहब बच्चों से नहीं पूछता। साहब बच्चों को खरीदता है।"
तभी मुझे याद आया — उस सुबह सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा था कि बच्चों के लिए मुफ़्त जाँच शिविर लगेगा। पीपल के नीचे। ठीक उसी जगह पर जहाँ बच्चे खेलते थे।
"आपा," मैंने कहा, "आज शाम को पीपल के नीचे एक शिविर लगेगा। मुफ़्त जाँच।"
शबनम आपा ने थाली उठाई।
"तो जाना," उन्होंने कहा। "और देखना कि वहाँ कौन बैठता है।"
"आप नहीं चलेंगी?"
"मैं अपनी गुमटी से देख लूँगी," उन्होंने कहा। "मेरी आँखें दूर से भी तेज़ हैं।"
वो चली गईं।
दोपहर बजी। मैंने दो साइकिलें ठीक कीं। एक पंचर कराया। एक ब्रेक ठीक किया। और हर बार जब मैं औज़ार उठाता, तो मेरा हाथ एक पल रुक जाता — जैसे कुछ भूल रहा हूँ। जैसे कोई चीज़ अनदेखी है।
शाम पाँच बजे पीपल के नीचे शिविर लगा।
दो सफ़ेद तंबू थे। एक मेज़ थी जिस पर दवाओं के डिब्बे थे और एक कुर्सी थी जिस पर एक आदमी बैठा था — सफ़ेद कोट पहने हुए, और उसके गले में स्टेथोस्कोप था। उसके साथ दो लड़के थे जिनके हाथ में काग़ज़ों के बंडल थे।
बच्चों की लाइन लग गई। बुज़ुर्ग आए। कुछ औरतें आईं।
मैं दूर खड़ा था। मैंने देखा कि वो डॉक्टर किसी को भी जाँचता नहीं था। वो सिर्फ़ हाथ पकड़ता, नाड़ी देखता, और फिर काग़ज़ पर कुछ लिखकर दे देता। और हर काग़ज़ के साथ एक पर्ची देता — "दवा मुफ़्त, दुकान भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की।"
मैंने देखा कि सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू लाइन में खड़े थे। और उनके साथ बबलू खड़ा था, और वो उन्हें कुछ बोल रहा था, और बच्चे सिर हिला रहे थे।
मैंने देखा कि बबलू ने सानिया के हाथ में एक चमकदार चीज़ रखी — टॉफ़ी। फिर गुड्डू के हाथ में। फिर रफ़ीक़ के। फिर चिंटू के।
और फिर बबलू ने सानिया के कान में कुछ कहा।
मैंने देखा कि सानिया ने सिर हिलाया। और फिर बच्चे हँसकर वहाँ से चले आए। हँसते हुए। हँसते हुए वो मेरी दुकान की तरफ़ आ रहे थे।
वो मेरे पास आए।
"भैया," सानिया ने कहा, "बबलू ने हमें बताया कि कल सुबह आपका क्या होगा।"
"अच्छा," मैंने कहा। "क्या होगा?"
"कहा कि कल सुबह दस बजे साहब गली में आएँगे और आपकी दुकान पर मुहर लगेगी।"
मैंने सिर हिलाया।
"और टॉफ़ी में ज़हर नहीं था?" मैंने पूछा।
"नहीं," चिंटू ने कहा। "मैंने पहले टॉफ़ी खाई, फिर सोचा, और फिर बबलू से कहा — 'अंकल, ज़रा पहले आप खा लो।' तो वो हँसा और उसने खुद खाई।"
मैं हँसा।
"टिंकू ने भी पूछा था," मैंने कहा।
फिर रफ़ीक़ बोला, "भैया, बबलू ने हमें ये भी कहा — 'अगर तुम्हारे भैया को कुछ पता चले तो मुझे बताना। मैं तुम्हें सौ रुपये दूँगा।'"
"और तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा," सानिया ने कहा, "कि भैया के पास कोई काग़ज़ आया तो हम बताएँगे।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"बताओगे?"
"बताएँगे," गुड्डू ने कहा। "पर गलत काग़ज़।"
मैं ज़ोर से हँसा। इतना ज़ोर से कि उस्ताद की दुकान से आवाज़ आई — "अंकुश, दुकान पर हँसी ठीक नहीं लगती।"
मैंने माफ़ी माँगने के लिए सिर हिलाया।
बच्चे गए।
शाम छह बजे के करीब रणवीर आया। इस बार कोई सफ़ेद गाड़ी नहीं थी। वो पैदल आया। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, सफ़ेद जूते। उसके साथ एक आदमी था जिसके हाथ में एक छोटी पोटली थी — मिठाई की पोटली।
वो सीधे शबनम आपा की गुमटी पर आया और बेंच पर बैठ गया।
"एक चाय," उसने कहा। "और सबके लिए।"
शबनम आपा ने चाय बनाई और उसके सामने रखी। उसने पैसे दिए।
अंकुश ने दूर से देखा।
रणवीर बैठा रहा। एक-एक करके लोग आने लगे। बंसी बाबा आए। रहमत बाबा आए। हाफ़िज़ निसार अहमद आए। पंडित ब्रजकिशोर आए। भोला भाई आए। दुबे अंकल नहीं आए, क्योंकि उन्हें थाने पर बैठना था।
रणवीर ने सबके सामने हाथ जोड़े।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा, "कि कुछ लोग मेरे बारे में बुरा सोचते हैं। और सोचना बुरा नहीं है। गलती मेरी है कि मैं कभी बैठकर बात नहीं कर पाया।"
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