The Mysterious Bell – Chapter 208
"सुनो," मैंने कहा। "कल सुबह से तुम लोग बाज़ार जाओगे। बबलू तुम्हें बुलाएगा। वो तुमसे कुछ पूछेगा। और तुम उसे यह बताओगे कि मैं रात को डर गया हूँ।"
"पर भैया," सानिया ने कहा, "वो सच मान लेगा तो?"
"मानेगा," मैंने कहा। "क्योंकि वो मानना ही चाहता है। जो आदमी दूसरों को डरा-डरा के चलता है, वो सबसे पहले यही मानता है कि सब डरते हैं।"
"और अगर वो टॉफी दे?" चिंटू ने पूछा।
"ले लेना," मैंने कहा।
"पर भैया, टॉफी तो उसकी तरफ़ से होगी।"
"टॉफी टॉफी होती है," मैंने कहा। "तुम उसका मुँह नहीं खा रहे। तुम उसका हाथ देख रहे हो। और हाथ से ज़्यादा ज़रूरी है — जो काग़ज़ उसके हाथ में है, वो कहाँ जाता है।"
टिंकू ने आँखें मलीं। "भैया, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर वो मुझे टॉफी दे और मैं उसके काग़ज़ पर कुछ लिख दूँ, तो वो पढ़ेगा कैसे? वो तो पढ़ना नहीं जानता, न?"
मैं मुस्कुराया।
"टिंकू," मैंने कहा, "वो खुद नहीं पढ़ेगा। वो उसे साहब को भेजेगा। और साहब पढ़ेगा। तो हमें साहब से बात करनी है, बबलू से नहीं।"
टिंकू की आँखें चमकीं। मुझे लगा कि इस लड़के में कहीं ज़्यादा दिमाग़ है, बस जगह नहीं मिली।
"ठीक है," मैंने कहा। "अब जाओ। सो जाओ। कल सुबह आठ बजे दुकान पर मिलो। और हाँ — ये बात अपनी माँ को भी मत बताना, वरना वो डर जाएँगी और फिर सारी गली को बताएँगी।"
"और शबनम आपा को?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"उन्हें मैं खुद बताऊँगा," मैंने कहा।
बच्चे गए। गली में उनके पैरों की आवाज़ गई, फिर दरवाज़ों के बंद होने की आवाज़ आई, फिर सब चुप।
मैं अकेला बैठा रहा।
चारपाई पर बैठकर मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। शटर आधा खुला था। बाहर अंधेरा था और हवा में वो गंध थी जो बारिश से पहले आती है — मिट्टी की, धूल की, किसी पुरानी चीज़ की।
मैंने घंटी निकाली।
"अब बता," मैंने कहा। "अब तू क्या कहती है?"
घंटी चुप रही।
"सुन," मैंने कहा। "अगर मैं ये झूठ फैलाऊँगा, तो क्या तेरे नियम में कोई गड़बड़ है? मैं झूठ बोलने वाला नहीं हूँ, मैं बच्चों से बुलवा रहा हूँ।"
घंटी फिर भी चुप।
"अच्छा," मैंने कहा। "तू चुप ही रह। मुझे तेरी आदत है।"
और मैं लेट गया।
रात भर मैंने तीन बार आँख खोली। एक बार दरवाज़े पर आवाज़ आई — कोई बिल्ली थी। एक बार पीपल की पत्तियाँ चलीं। और एक बार, मुझे लगा कि रास्ते में कोई खड़ा है, पर खिड़की से देखा तो सिर्फ़ कुत्ता था, जो मेरी गली का ही था और मेरी ही तरह रात को जाग रहा था।
सुबह छह बजे मैं उठा।
मैंने मुँह धोया और दुकान का शटर उठाया। बाहर आसमान में वो रंग था जो सिर्फ़ भोपाल में सुबह के वक़्त दिखता है — हल्का पीला, नीला और थोड़ा-सा गुलाबी।
पीपल के नीचे चबूतरी पर एक बुज़ुर्ग बैठे थे, जो रोज़ आते थे, पर मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था। मुझे लगा कि उन्हें मैंने कहीं देखा है, कहीं सुना है, पर याद नहीं आया।
मैंने दुकान के बाहर साइकिल रखी। एक पहिया सीधा करके आवाज़ आई, तो दो पुराने अंकल आए और बोले — "अंकुश, ज़रा हमारी साइकिल भी देख लेना।"
मैंने सिर हिलाया।
पर उससे पहले कि मैं कुछ कहता, गली के मुँह पर शोर हुआ।
दो टेम्पो रुके। एक लाल ट्रक रुका। और उनमें से तीन आदमी उतरे — एक आदमी जिसके हाथ में लोहे का ताला और चाबी थी, दो आदमी जिनके हाथ में बंडल थे। और उनके साथ एक आदमी था जो सफ़ेद कुर्ता पहने था और जिसके हाथ में एक मोटा काग़ज़ था।
वो सीधे नल के पास आए।
"सुनिए, सुनिए," सफ़ेद कुर्ते वाले ने आवाज़ दी। "गली के लिए नया नल। पक्का पानी। साफ़ पानी। सरकारी योजना। मुफ़्त।"
लोग दरवाज़ों से निकलने लगे।
"मुफ़्त?" किसी ने कहा।
"मुफ़्त," उसने कहा। "बस एक काग़ज़ पर अंगूठा।"
मेरे कान खड़े हो गए।
मैंने हाथ में रिंच पकड़ी और दुकान के बाहर आकर खड़ा हो गया।
"और आप," उस आदमी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "अंकुश भाई, आपकी दुकान भी इस योजना में है। आपकी दुकान के लिए नया काउंटर, नया शटर, नया बोर्ड। बस एक अंगूठा।"
"और एक दिन," मैंने कहा। "लिख के दो — कितने दिन में?"
वो हँसा।
"दो दिन में," उसने कहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "और ये नया नल कहाँ लगेगा?"
"यहीं। इसी जगह। पुराने नल की जगह।"
"और पुराने नल का क्या होगा?"
"वो हटा दिया जाएगा।"
"और उस पुराने नल के नीचे जो पत्थर का टैंक है," मैंने कहा, "वो भी हटेगा?"
वो एक पल रुका।
"वो," उसने कहा, "वो देखा जाएगा।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा — रमेश भाई अपने दरवाज़े पर खड़े थे और उनकी बीवी पीछे खड़ी थी, जो पानी की बाल्टी उठाए हुए थी।
"रमेश भाई," मैंने कहा, "आपको नया नल चाहिए?"
वो कुछ नहीं बोले।
"आपकी बीवी को दिन में तीन बाल्टी पानी चाहिए," मैंने कहा। "अगर नया नल लगाने के लिए पुराना नल हटेगा और नया नल दो हफ़्ते बाद आएगा, तो इन दो हफ़्ते में पानी कहाँ से आएगा?"
रमेश भाई ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने काग़ज़ आगे किया।
"आप सोचिए," उसने कहा। "सोचने में कुछ नहीं जाता।"
"पर अंगूठा लगाने में जाता है," मैंने कहा।
लोग हँसे। कुछ लोगों ने हँसी में सिर हिलाया। सफ़ेद कुर्ते वाले ने काग़ज़ समेटा और अगली गली की तरफ़ चल दिया।
उसके जाने के बाद रमेश भाई मेरे पास आए।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं झगड़ा नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ — अगर सच में नया नल आए, तो?"
"तो अच्छी बात है," मैंने कहा। "पर पहले ये पूछो कि काग़ज़ में क्या लिखा है। ये जो लोग मुफ़्त की बात करते हैं, ये मुफ़्त में कुछ नहीं देते। ये सिर्फ़ उधार देते हैं और उधार की तारीख़ वो खुद लिखते हैं।"
रमेश भाई ने सिर हिलाया, पर उनकी आँखों में वो लालच था जो हर आदमी की आँखों में होता है जब उसे मुफ़्त की बात सुनाई देती है। मैंने कुछ और नहीं कहा। क्योंकि जिसे समझाना हो, उसे एक बार कहना काफ़ी होता है।
फिर दिन चढ़ा।
नौ बजे के करीब बच्चे आए। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों दुकान के बाहर खड़े थे और उनके चेहरों पर वो हँसी थी जो बच्चों के चेहरे पर तब आती है जब उन्होंने कुछ ऐसा किया हो जो बड़ों ने कहा हो पर बड़ों से छुपाया हो।
"भैया," सानिया ने कहा, "हमने कर दिया।"
"क्या किया?"
"बबलू ने हमें बुलाया," गुड्डू ने कहा। "पीपल के पीछे वाली गली में। टॉफ़ी दी। केसर वाली। बड़ी वाली। और पूछा — अंकुश भैया कैसे हैं? डर गए हैं? रात को कहाँ थे?"
"और तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा," चिंटू ने कहा, "कि भैया रात को दुकान में अकेले थे और घंटी को सीने से लगाए बैठे थे।"
"अरे," मैंने कहा।
"नहीं भैया," सानिया ने कहा, "वो मैंने कहा था कि घंटी को हाथ में पकड़े थे, सीने से नहीं। चिंटू गलत बोल रहा है।"
मैं हँसा।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर बबलू ने पूछा, 'भागेगा?'" रफ़ीक़ ने कहा। "तो हम चारों ने एक साथ सिर हिलाया। और मैंने कहा — 'बहुत डर गया है। रात को बार-बार उठकर दरवाज़ा देख रहा था।'"
"और टिंकू कहाँ है?"
"वो आ रहा है," सानिया ने कहा। "वो काग़ज़ पर कुछ लिख रहा था।"
तभी टिंकू आया। वो दौड़ा हुआ आया और उसकी साँस फूल रही थी और उसके हाथ में टॉफ़ी का काग़ज़ था — वही चमकदार सफ़ेद पन्नी, जिस पर कुछ लिखा हुआ था।
"भैया," उसने कहा, "देखो।"
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