The Mysterious Bell – Chapter 210
उसने चाय का कप उठाया।
"कल सुबह दस बजे," उसने कहा, "मैं खुद इस गली में आऊँगा। यहीं इस चबूतरी पर बैठूँगा। और सबकी बात सुनूँगा। कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। सिर्फ़ बात।"
लोग एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। कुछ लोगों के चेहरों पर आस थी।
फिर रणवीर ने चाय के कप को नीचे रखा और अपनी गर्दन घुमाई — और उसने सीधे मेरी दुकान की तरफ़ देखा।
मैं दुकान के बाहर खड़ा था, हाथ में रिंच थी।
रणवीर ने मुस्कुराकर कहा — "और अंकुश भाई, कल मैं आपकी दुकान पर बैठकर चाय पिऊँगा। उस घंटी के साथ। वो जो आपकी साइकिल पर लगी है।"
उसकी आवाज़ में कोई धमकी नहीं थी। कोई गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक साफ़, ठंडी बात थी, जैसे कोई तारीख़ बता रहा हो।
और मेरी जेब में घंटी काँपी।
बिना बजे।
बिना हिले।
बस काँपी।
और उसने धीमी आवाज़ में कहा — "अब वह तेरी घंटी का नाम जानता है।"
॥
रात नौ बजे के करीब दुकान के पीछे वाला कमरा भर गया था। कमरा छोटा है, तुम जानते हो। इतना छोटा कि जब पाँच लोग बैठते हैं तो छठे को खड़ा होना पड़ता है, और जब छह बैठ जाते हैं तो औज़ारों का ट्रंक खुद बिस्तर बन जाता है। लोहे की अलमारी के ऊपर पुराना बल्ब गुनगुनाता रहता है, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कोई पुरानी तान गा रहा हो। दीवार पर सालों की ग्रीस ने ऐसे निशान छोड़े हैं जैसे किसी ने उँगली डुबोकर कोई नक्शा बना दिया हो।
मैंने ट्रंक पर एक पुराना अख़बार बिछाया और उस पर चार कटोरे रख दिए। शबनम आपा ने बाहर से चाय लाकर दी थी, पर उन्होंने कहा था कि आज चाय के पैसे नहीं लेने, आज चाय खर्चे में है।
पहले आए उस्ताद अली बक्श। उन्होंने दरवाज़े पर खड़े होकर पूरे कमरे को देखा, जैसे तराज़ू से तोल रहे हों, फिर अंदर आकर ट्रंक के कोने पर बैठ गए। उनका मोटा चश्मा आज भी कान पर पेंसिल के साथ टँगा था।
फिर आए दुबे अंकल। नीली शर्ट, पुरानी कुर्सी से उतरकर आए थे, और हाथ में एक पीला लिफ़ाफ़ा था जिसे उन्होंने अपनी जेब के सबसे अंदर रखा हुआ था, पर लिफ़ाफ़े का कोना थोड़ा बाहर झाँक रहा था, जैसे खुद कह रहा हो — मैं यहाँ हूँ, मुझे कल खोलना।
फिर मीरा आई। उसके बाल आज और भी बेतरतब थे, कैमरा कंधे पर, बैग फटा हुआ, और आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ तब आती है जब कोई दिन भर कुछ ढूँढता रहा हो और कुछ न मिला हो।
फिर टिंकू। वो आया तो सीधा मेरे पास आकर बैठ गया और उसने मेरे हाथ से पेचकस ले लिया, जैसे वो अब उसका हक़ हो।
फिर भोला भाई आए। उनके हाथ अब काँपते नहीं थे। यही सबसे बड़ी बात थी। एक हफ़्ते पहले तक ये आदमी काग़ज़ पर अंगूठा लगाकर काँपता था, आज ये अपनी दुकान का शटर खुद उठाते हैं और चाय खुद लाते हैं।
शबनम आपा सबसे आख़िर में आईं, क्योंकि उन्होंने गुमटी बंद करनी थी। आते ही उन्होंने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "ये कमरा है या डिब्बा? इसमें तो साँस नहीं आएगी।"
"आपा, आप बैठिए," मैंने कहा। "साँस मैं लूँगा, आप बस बोलिए।"
"बहाना मत बनाओ," उन्होंने कहा और ट्रंक पर बैठ गईं। "कल सुबह दस बजे सबको कुछ न कुछ बोलना पड़ेगा। मैं पहले बोलूँगी। मुझे किसी का मुँह देखकर नहीं बोलना।"
काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी। वो माँ के पास से आई थी, अस्पताल से। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी और आँखें लाल थीं।
"माँ कैसी है?" मैंने पूछा।
"सो गई हैं," काजल ने कहा। "पर सोने से पहले उन्होंने एक बात कही।"
"क्या?"
"कहा — 'काजल, कल जो भी हो, अंकुश के पीछे खड़ी रहना। और अगर किसी ने कहे कि तुम्हारी माँ की दवा के लिए काग़ज़ पर अंगूठा लगाओ, तो उस आदमी के मुँह पर थूक देना।'"
कमरे में एक पल के लिए चुप्पी छा गई। फिर भोला भाई हँसे, धीरे से, और वो हँसी छूत की तरह सब तक पहुँच गई।
"माँ का डायलॉग है," मैंने कहा। "दाल में पानी नहीं, और बात में भी नहीं।"
पापा सबसे आख़िर में आए। वो दरवाज़े पर खड़े रहे, फिर अंदर आकर चारपाई के किनारे बैठ गए। उनके हाथ में आज कोई औज़ार नहीं था। यही सबसे अजीब बात थी। पचपन साल के आदमी के हाथ खाली देखकर लगा जैसे किसी की जेब से कोई चीज़ गिर गई हो।
मैंने चाय उनके आगे रखी। उन्होंने कप उठाया, फिर नीचे रख दिया।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैंने उनके मुँह से पहले कभी नहीं सुना था।
"मैं डरता हूँ," पापा ने कहा।
कमरे में कोई नहीं हिला।
"मैं पाँच साल से डरता हूँ। उस दिन से डरता हूँ जिस दिन मैंने उस दफ़्तर में अंगूठा लगाया था। शुरू में मुझे लगा कि डर उतर जाएगा। वो नहीं उतरा। वो रोज़ सुबह मेरे साथ उठता है और रात मेरे साथ सोता है। मैंने सोचा था कि चुप रहने से डर कम होगा। चुप रहने से डर बढ़ता है। हर चुप्पी उसे एक ईंट देती है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं आज भी डरता हूँ," उन्होंने कहा। "पर अब छिपूँगा नहीं। कल सुबह मैं उसी चबूतरी पर खड़ा होकर वो सब बोलूँगा जो मैंने पाँच साल अपने अंदर दबाया है। और अगर उसके बाद भी डर रहे, तो डर रहे। मैं उसके साथ ज़िंदा रह लूँगा, पर उसके पीछे नहीं छिपूँगा।"
मैं उठा। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ सूखा था, खुरदुरा था, और उसमें वो सारे औज़ार थे जो उन्होंने ज़िंदगी भर पकड़े थे, और एक काग़ज़ भी था जिस पर उन्होंने अंगूठा लगाया था।
"पापा," मैंने कहा। "सच अब अकेले नहीं बोला जाएगा।"
उन्होंने सिर हिलाया। कुछ नहीं कहा। मुझे लगा वो नहीं कह पाए। फिर उन्होंने मेरा हाथ दबाया, बस एक बार, हल्का सा, और मैंने समझ लिया।
तुम सोच रहे होगे कि ये सब भावुक बातें क्यों कर रहे हैं जब कल लड़ाई है। तो सुनो, मैंने सीखा है कि लड़ाई से पहले की रात ही असली लड़ाई होती है। सुबह तो हाथ काम करते हैं, रात में दिल काम करता है।
फिर मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से काग़ज़ निकाले।
"मैं सीधी बात करती हूँ," उसने कहा। "कल के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।"
"कुछ नहीं मतलब?" भोला भाई ने पूछा।
"मतलब, लिखित सबूत नहीं है। नीलामी की सूची है, पर उस पर सरकारी मुहर नहीं है और गवाह की जगह खाली है। भोला भाई का अतिक्रमण नोटिस है, उसका यही हाल है। सनी का आधा काग़ज़ है, वो आधा है, पूरा नहीं। पाँच साल पुराने अंगूठे वाले काग़ज़ की नक़ल है, पर वो पापा के अंगूठे को साबित करती है, रणवीर की साज़िश को नहीं। और उस आदमी के ऊपर काली अंगूठी वाला कोई, उसका तो नाम भी नहीं है। मेरे पास एक मानहानि का नोटिस है जिस पर शिकायतकर्ता का नाम नहीं है। ये सब ऐसा है जैसे किसी ने एक चीज़ को चार टुकड़ों में तोड़कर दिया हो और कहे — जोड़कर दिखाओ।"
"तो कल सभा का फ़ायदा क्या?" काजल ने पूछा।
दुबे अंकल ने अपनी नीली शर्ट के बटन बंद किए, जैसे कोई बैठक से पहले तैयार हो रहा हो।
"फ़ायदा यह है," उन्होंने कहा, "कि कल सबूत काग़ज़ से नहीं, लोगों के मुँह से निकलेगा।"
वो सीधे बैठे। उनकी आवाज़ चौक की शाम जैसी धीमी थी।
"मैं पच्चीस साल थाने में बैठा हूँ। मैंने हज़ारों काग़ज़ देखे। एक बात सीखी — काग़ज़ किसी को बुरा नहीं बनाता, काग़ज़ सिर्फ़ गवाह होता है। असली गवाह आदमी होता है। अगर कल गली में तीन आदमी खड़े होकर अपनी बात कह दें, तो तीन काग़ज़ से ज़्यादा हो जाते हैं। क्योंकि काग़ज़ को कोई फाड़ सकता है, आदमी का मुँह नहीं फाड़ सकता। वो फाड़ेगा तो और बोलेगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno