The Mysterious Bell – Chapter 205
"क्योंकि," मैंने कहा, "जिस दिन कोई सच बोलने से रुक जाता है, उस दिन झूठ जीत जाता है। और आज तूने उससे सीधा सवाल किया। यह भी एक तरह का सबूत है। गली ने सुना। गली ने देखा।"
उसने सिर हिलाया। फिर चली गई।
मैं गली के मुँह पर अकेला खड़ा रहा।
घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा।
"अब बोल," मैंने कहा। "हम आगे क्या करें?"
घंटी गुनगुनी थी।
"तू जानती है," मैंने कहा, "मुझे सबूत नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ़ एक बात चाहिए — कि मेरी गली में कोई अकेला न लड़े।"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "तू भी चुप।"
मैंने उसे वापस जेब में रखा और पीपल के नीचे चला आया।
वहाँ बंसी बाबा बैठे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपने हाथ की तरफ़। उनके हाथ में एक पुराना फ्रेम था — आधा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "बैठ।"
मैं बैठ गया।
"जो आज हुआ," उन्होंने कहा, "वो मैंने देखा।"
"जी।"
"वो आदमी तुमसे नहीं डरता," बंसी बाबा ने कहा। "वो तुम्हारे चैनल से नहीं डरता। वो किसी चीज़ से नहीं डरता।"
"तो किससे डरता है?"
बंसी बाबा ने फ्रेम को हाथ में घुमाया। उसका आधा हिस्सा टूटा हुआ था। उसकी उँगली टूटे हुए किनारे पर रुकी।
"वो हमसे डरता है," उन्होंने कहा। "उस गली से जिसमें लोग मिलकर बैठते हैं। उस गली से जिसमें कोई अकेला नहीं है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारी दुकान के बोर्ड पर जो नाम लिखा है," उन्होंने कहा, "वो तुम्हारे पापा का नहीं, उससे पहले वाले का है। और तुम्हें पता है, उस आदमी ने उस गली में कितने लोगों को जोड़ा था?"
"नहीं।"
"मुझे भी नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ कि उस गली में कोई अकेला नहीं मरा।"
वो उठे।
"और अंकुश," उन्होंने कहा। "मेरा फ्रेम अधूरा है। उसका दूसरा हिस्सा किसी और के पास है। मुझे नहीं पता किसके पास। पर जब मिलेगा, तब तुम्हें बुलाऊँगा।"
"क्यों?"
बंसी बाबा मुस्कुराए।
"क्योंकि तुम वो लड़का हो," उन्होंने कहा, "जो टूटी चीज़ें जोड़ता है।"
वो चले गए।
मैंने उनकी आवाज़ को जेब में रखा, जैसे लोग पैसे रखते हैं।
अंधेरा हो रहा था। पीपल के पत्तों में हवा चल रही थी और चबूतरी पर कुछ पुराने सिक्के जैसी आवाज़ आई — जैसे कोई खेल खेल रहा हो।
मैंने घंटी निकाली।
और इस बार, बिना मेरे कुछ पूछे, घंटी ने कहा, "आज रात।"
"क्या आज रात?"
"जूते," उसने कहा।
"किसके?"
घंटी ने कहा, "तेरी दुकान पर आएगा।"
मैं उठा। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे।
मैं दुकान की तरफ़ चला।
शाम सात बजे के करीब थी। शटर आधा खुला था। पीछे का कमरा अंधेरा था। बल्ब गुनगुना रहा था।
मैं अंदर गया। औज़ारों का ट्रंक खुला था। नई रिंच वहीं पड़ी थी।
मैं चारपाई पर बैठ गया।
और मैं इंतज़ार करने लगा।
इंतज़ार करते हुए मैंने सोचा — आज दिन में हमने बहुत कुछ जोड़ा था। रमेश और नसीम। पापा का सच। मीरा का सवाल। और जिस चीज़ की कीमत कटी, वो मुझे नहीं दिखी।
पर उस्ताद ने कहा था — कीमत कहीं कटती है।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।
फिर मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
बाहर गली में कोई था।
और उसके जूते मैं देख नहीं सकता था, क्योंकि वो अंधेरे में खड़ा था।
पर उसकी एक आवाज़ आई — धीमी, किसी अधेड़ आदमी की आवाज़।
"अंकुश जी," उसने कहा। "घंटी वाले मालिक तो आप हैं ना?"
मैं उठा।
मैंने घंटी जेब में महसूस की।
और घंटी ने कहा, बहुत धीमे से, "देख।"
॥
मैं दरवाज़े की सलाखों तक गया।
बाहर अंधेरा था, पर गली के मोड़ पर लगी पुरानी बत्ती की पीली रोशनी उसके पैरों तक आ रही थी। जूते पुराने थे, सिले हुए, और तलवे पर सूखी मिट्टी जमी थी, जैसे वो चलकर नहीं, खुदाई करके आया हो।
"अंकुश जी," उसने फिर कहा। "सुन रहे हैं या दरवाज़ा बंद कर देंगे?"
"सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "पर पहले ये बताइए, आप खड़े हैं या आपका साया खड़ा है? क्योंकि आपके जूते तो यहाँ तक चलकर आए हैं, और आवाज़ कहीं पीछे से आ रही है।"
वो हँसा। सूखी हँसी थी, जैसे पुराने हैंडपंप से आख़िरी बूँद निकलती है।
"मैं खुद हूँ," उसने कहा। "बस आदमी थोड़ा घिस गया है।"
"घिसे आदमी रात को किसी की दुकान पर नहीं आते," मैंने कहा। "वो घर जाकर सोते हैं।"
"मुझे नींद नहीं आती।"
"तो डॉक्टर के पास जाइए।"
"डॉक्टर के पास जाने के लिए हिम्मत चाहिए," उसने कहा। "और मेरी हिम्मत सिर्फ़ दरवाज़े खटखटाने तक बची है।"
मैं चुप हो गया। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, ठंडी पर ज़िंदा। जैसे कोई चुपचाप सुन रहा हो।
"मैं रणवीर साहब का आदमी हूँ," उसने धीमे से कहा। "पर साहब को मेरा नाम नहीं पता।"
"इतना बड़ा साहब और अपने आदमी का नाम नहीं जानता?"
"साहब को नाम से क्या?" उसने कहा। "साहब को काम से है।"
फिर वो थोड़ा आगे आया। रोशनी उसके चेहरे तक नहीं पहुँची, सिर्फ़ उसकी ठुड्डी तक आई। ठुड्डी पर दो दिन की सफ़ेद दाढ़ी थी। उम्र पचास के आसपास लगी।
"बीस दिन से," उसने कहा, "मैं रोज़ सुबह आठ बजे पुराने बिजलीघर के बंद दरवाज़े पर दो बार खटखटाता हूँ। दो बार। और दो मिनट खड़ा रहता हूँ।"
"कौन खोलता है?"
"कोई नहीं।"
"तो फिर रोज़ क्यों जाते हैं?"
"क्योंकि साहब कभी नहीं पूछते कि दरवाज़ा खुला या नहीं," उसने कहा। "साहब सिर्फ़ पूछते हैं, गए थे?"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"और आज रात?" मैंने पूछा। "आज रात साहब ने क्या पूछा?"
"साहब ने कहा, जा, उस लड़के से मिल। डरा दे। बोल दे कि दुकान जाएगी, बाप की नौकरी जाएगी, माँ की दवा जाएगी।"
"और आपने?"
"मैंने सोचा, पहले देख तो लूँ कि लड़का कैसा है," उसने कहा। "डराने से पहले आदमी को देखना चाहिए।"
"तो देख लिया। कैसा हूँ?"
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।
"तुम अंधेरे में भी खुश लग रहे हो," उसने कहा। "ऐसे आदमी को डराना मुश्किल है।"
फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक पल के लिए रुका।
"आज मैंने एक काम खुद किया," वो बोला। "जो साहब ने नहीं कहा था।"
"क्या?"
"मैं तुम्हें सिर्फ़ सामान देने आया था।" उसने मिट्टी की तरफ़ देखा, जहाँ कुछ पड़ा था। "पर वो हाथ से गिर गया।"
"क्या गिरा?"
"जो बीस दिन से मेरी जेब में था," उसने कहा। "मैं उसे फेंकने की हिम्मत नहीं कर पाया था। आज जब तुमने मुझे पहचान लिया, तो हाथ खुल गया।"
"आपने मुझे कब पहचाना?"
"जब तुमने दरवाज़ा खोला," उसने कहा। "साहब को पता है कि तुम कौन हो। अब मुझे भी पता है।"
मैंने नीचे झुककर देखा। मिट्टी पर वो पीला टिकट पड़ा था, जो मुझे पहले मिला था। पच्चीस साल पुरानी तारीख़, कोने में अस्पताल लिखा।
"ये आपका है?" मैंने पूछा।
"ये मेरा नहीं," उसने कहा। "ये उस दरवाज़े के नीचे से निकला था। बीस दिन पहले। जिस दिन मैं पहली बार खटखटाने गया था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"मतलब दरवाज़े के उस पार कोई है," मैंने कहा।
"कोई है," उसने कहा। "और वो सुनता है। मुझे यक़ीन है, वो सुनता है।"
"तो फिर खोलता क्यों नहीं?"
"क्योंकि वो किसी और का इंतज़ार कर रहा है," उसने कहा। "मेरा नहीं।"
वो पीछे हटा।
"एक बात और," उसने कहा। "आप जो काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगा रहे ना, साहब उस काग़ज़ को अपनी तिजोरी में नहीं रखते। वो उसको किसी और को दे देते हैं।"
"किसको?"
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