The Mysterious Bell – Chapter 206
"जो साहब से भी ऊपर है," उसने कहा। "और वो काग़ज़ पर अंगूठा नहीं माँगता। वो नाम माँगता है।"
"नाम?"
"हाँ।" उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "उसकी उँगली में काली अंगूठी है। और साहब, साहब उसके आगे हाथ जोड़ते हैं।"
मैंने साँस रोक ली।
"आपने उसे देखा है?"
"मैंने सिर्फ़ उँगली देखी है," उसने कहा। "गाड़ी की खिड़की से, एक बार। बस उँगली। साहब जब उससे बात करते हैं, तो खिड़की बंद रहती है।"
फिर वो मुड़ा।
"मुझे अब जाना होगा," उसने कहा। "सुबह फिर खटखटाने जाना है।"
"आप जाएँगे?" मैंने पूछा। "आज भी?"
"आज भी," उसने कहा। "आदमी को एक काम मिल जाए तो वो उसी को पकड़कर जीता है। मेरे पास यही एक काम बचा है।"
वो अंधेरे में घुल गया। उसके जूतों की आवाज़ भी नहीं आई। सिर्फ़ धूल में उसके पैरों के निशान बचे थे, जो हवा धीरे-धीरे मिटा रही थी।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
फिर घंटी ने कहा, "जूते देख लिए?"
"देख लिए," मैंने कहा।
"वो डरा हुआ है," घंटी ने कहा।
"मुझे भी लगा।"
"नहीं," घंटी ने कहा। "वो डरा हुआ है, पर उस डर के पीछे कुछ और है। वो अपने फ़ायदे के लिए नहीं डरा है।"
"तो?"
"वो उस दरवाज़े से डरता है," घंटी ने कहा। "और जो आदमी किसी दरवाज़े से डरता है, वो उसे रोज़ खटखटाने जाता है। सोच, क्यों?"
मैंने सोचा। और मुझे जवाब नहीं मिला।
घंटी चुप हो गई।
मैंने टिकट उठाया, उसे अपनी जेब में रखा, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
उस रात मैंने आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। मेरे कान में बार-बार एक ही लाइन घूम रही थी — साहब उस काग़ज़ को किसी और को दे देते हैं, जो नाम माँगता है।
सुबह मुझे नींद से नहीं, आवाज़ ने उठाया।
ड्रिल की आवाज़।
मैं उठा, मुँह धोया, शटर उठाया, और सामने देखा।
गली के मुँह पर दो आदमी खड़े थे। एक के हाथ में पीतल का नया नल चमक रहा था, दूसरा सीमेंट का थैला खोल रहा था। उनके पीछे एक बड़ा बोर्ड टेक लगाकर खड़ा कर दिया गया था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच शिविर। नीचे छोटी लाइन में — मुफ़्त दवा, मुफ़्त जाँच, बड़े अस्पताल के डॉक्टर।
और उस बोर्ड के ऊपर रणवीर भारद्वाज की तस्वीर थी, हाथ जोड़े हुए।
मैंने पहचान लिया। वो एक आदमी वही था जो बबलू के साथ नाप लेने आया था, कमल जैसे चेहरे वाला, जो ज़मीन में कील ठोंक रहा था।
"अंकुश भाई!" उसने दूर से ही हाथ हिलाया, जैसे हम पुराने दोस्त हों। "इधर आओ, देखो साहब का तोहफ़ा।"
मैं धीरे-धीरे चला।
रमेश भाई पहले से वहीं खड़े थे। उनकी आँखों में अजीब सी चमक थी। नसीम भाई दूसरी तरफ़ खड़े थे, हाथ में वही गीला तौलिया।
"देखो," कमल चेहरे वाले ने कहा, "पुराना नल कब से टपक रहा था। साहब ने कहा, गली के लोगों को पता भी नहीं चलेगा, नल बदल जाएगा। पीतल का, टिकाऊ, बीस साल की गारंटी।"
"पैसे?" रमेश ने पूछा, हालाँकि जवाब उन्हें पता था।
"पैसे किस बात के?" वो हँसा। "साहब कहते हैं, गली की औरतें रोज़ तीन बाल्टी पानी ढोती हैं। ये साहब को अच्छा नहीं लगता।"
मैंने रमेश भाई की तरफ़ देखा। उनका चेहरा लाल हो गया। मुझे पता था — उनकी औरत की किडनी में पत्थर है, और वो रोज़ तीन बाल्टी भरते हैं। ये बात उन्होंने दो दिन पहले सबके सामने कही थी।
उन्हीं दो दिन में रणवीर के आदमी को ये भी पता चल गया कि किसके घर में कितनी बाल्टी उठती है।
"मुफ़्त में नल लग रहा है," नसीम भाई ने धीमे से कहा। "तो लगने दो।"
"नसीम भाई," मैंने कहा, "आपने तो अभी पिछले महीने दो सौ अस्सी रुपये लगाकर नल ठीक कराया था। याद है? तीन महीने की तारीफ़ वाली बात भी हुई थी।"
वो चुप हो गया। उसने गीला तौलिया घुटनों पर रख लिया।
"और ये जाँच वाला बोर्ड?" मैंने पूछा। "कल से?"
"कल सुबह दस बजे से," कमल चेहरे वाले ने कहा। "डॉक्टर आएँगे, मशीन आएगी, दवा मुफ़्त। किसी को कुछ नहीं देना है।"
"अंगूठा भी नहीं?"
उसकी मुस्कान एक पल के लिए रुकी। फिर वो और चौड़ी हो गई।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "आप बड़े मज़ाकिया हो।"
"मैं मज़ाकिया नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ सस्ता हूँ। मेरा मज़ाक भी पैसा नहीं लेता।"
तभी शबनम आपा की आवाज़ आई। वो अपनी गुमटी से निकली, हाथ में लोहे की चिमटी, और सीधे उस बोर्ड के सामने आकर खड़ी हो गई।
"मुफ़्त का नल," उसने कहा, "और मुफ़्त की दवा। दोनों बड़ी प्यारी चीज़ें हैं।"
"बिल्कुल, आपा जी," कमल चेहरे वाला मुस्कुराया।
"पर सुन लो," शबनम आपा ने कहा, "मुफ़्त की चीज़ में डोर बँधी होती है। और डोर का दूसरा सिरा हमेशा किसी की मुट्ठी में रहता है। आज नल मुफ़्त है, कल पानी का दाम पूछा जाएगा। आज दवा मुफ़्त है, कल उस दवा के बदले कोई और चीज़ माँगी जाएगी।"
"आपा जी, आप बहुत शक करती हैं।"
"मैं शक नहीं करती," शबनम आपा ने कहा। "मैं हिसाब रखती हूँ। और मेरा हिसाब कभी गलत नहीं निकला।"
वो मुड़कर गुमटी में चली गई। चिमटी थाली पर पड़ी, टन की आवाज़ आई।
कमल चेहरे वाला हँसता रहा, पर उसकी हँसी अब पहले जैसी नहीं थी।
——
आठ बजे के आसपास सानिया दौड़ती हुई आई।
"अंकुश भैया!" वो हाँफ रही थी। "आज वो आदमी नहीं आया।"
"कौन?"
"वही जो रोज़ सुबह आठ बजे बिजलीघर का दरवाज़ा खटखटाता है," उसने कहा। "गुड्डू रोज़ देखता है। आज वो गया, दो मिनट खड़ा रहा, और वो आदमी आया ही नहीं।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"क्या मतलब आया नहीं?"
"मतलब आया नहीं," सानिया ने कहा। "दरवाज़ा बंद था, कोई खटखटाने वाला नहीं था। गुड्डू ने कहा कि ज़रूर कुछ गड़बड़ है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पर अंदर से मैं जान गया था कि गड़बड़ है। वो आदमी रात को मुझसे मिला था। और आज सुबह वो अपनी जगह पर नहीं आया।
किसी ने उसे रोक दिया था। या किसी ने उसे हटा दिया था।
——
दस बजे के करीब मैं पीछे की छत पर चढ़ गया। मेरे हाथ में पुराना डायनमो था, जिसे मैं वैसे ही खोल-बंद कर रहा था, जैसे कोई काम कर रहा हो। पर मेरी आँखें गुमटी की तरफ़ थीं।
बबलू आया था।
वो आज अलग लग रहा था। सोने की चेन नहीं थी, पानदान नहीं था। बस एक पीली काग़ज़ की थैली थी हाथ में। वो गुमटी की बेंच पर बैठ गया और चाय माँगी।
फिर उसने थैली खोली।
अंदर से वैसी ही टॉफ़ी निकली, जैसी रणवीर उस दिन लाया था। केसर और इलायची की खुशबू इतनी तेज़ थी कि मुझे छत तक आ गई।
बच्चे वहीं खेल रहे थे। चारों — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"आओ, आओ," बबलू ने कहा, बड़ी मीठी आवाज़ में। "टॉफ़ी लो।"
चिंटू सबसे छोटा था। वो सीधे आगे बढ़ गया।
"क्या बोलते हो?" उसने कहा।
"अरे, साहब की टॉफ़ी है," बबलू ने कहा। "मैं तो तुम्हारा ही भला चाहता हूँ।"
उसने चारों को एक-एक टॉफ़ी दी। चिंटू ने तुरंत काग़ज़ खोलकर मुँह में डाल दी। रफ़ीक़ ने पहले सूँघी, फिर खाई। गुड्डू ने जेब में रख ली। सानिया ने हाथ में पकड़ी रही।
"और बताओ," बबलू ने कहा, "अंकुश भैया कैसे हैं?"
"अच्छे हैं," सानिया ने कहा।
"अच्छे हैं?" बबलू ने सिर हिलाया। "मुझे सुना है, वो रात को ठीक से सोते नहीं।"
"सोते हैं," गुड्डू ने कहा।
"अच्छा।" बबलू ने चाय का घूँट लिया। "और वो घंटी? अब भी रखते हैं पास?"
मैंने छत पर अपनी उँगलियाँ रोक लीं।
सानिया ने कहा, "कौन सी घंटी?"
"अरे, वही जो उनकी साइकिल पर है।"
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