The Mysterious Bell203 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 203

6 min read November 5, 2026

मैं हँसा।

"आपा," मैंने कहा, "आप पत्रकार होनी चाहिए थीं।"

"मैं क्या हूँ," उन्होंने कहा, "यह गली जानती है।"

वो चली गईं।

थोड़ी देर बाद उस्ताद अली बक्श आए। वो धीरे चलते हैं — हर क़दम पर लाठी रखते हैं, जैसे ज़मीन उनकी हो और वो उससे पूछकर आगे बढ़ रहे हों।

"उस्ताद," मैंने कहा। "आपको परेशान कर दिया।"

"मैं बैठा था," उन्होंने कहा। "परेशान नहीं, बैठा था।"

वो मेरी दुकान के पास रखी बेंच पर बैठे।

"बोल," उन्होंने कहा।

मीरा ने उन्हें सब कुछ बताया — एडिटर का फोन, रणवीर का बुलावा, कैमरे का सवाल।

उस्ताद ने सब सुना। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे कुर्ते से पोंछा और वापस लगाया।

"कैमरा रखना," उन्होंने कहा।

"जी?"

"कैमरा रखना," उन्होंने दोहराया। "पर उसकी गाड़ी पर मत करना। उसकी तरफ़ मत करना। सीधे उसके पीछे खड़े आदमी पर करना।"

मीरा रुक गई।

"पीछे कौन खड़ा होगा?"

"मुझे नहीं पता," उस्ताद ने कहा। "पर जब कोई बड़ा आदमी गाड़ी से उतरता है, गली में घुसता है, तो उसके पीछे हमेशा कोई एक आदमी होता है जो उससे भी ज़्यादा डरता है। और डरे हुए आदमी का चेहरा कैमरे में सबसे सच बोलता है।"

मीरा ने उनकी तरफ़ देखा।

"आपको यह सब कैसे पता?" उसने पूछा।

"मैंने पचास साल दुकान चलाई है," उस्ताद ने कहा। "मैंने उस दौरान हज़ार कपड़े नापे हैं, हज़ार आदमी नापे हैं। और जो आदमी नापना जानता है, वो हाँकना भी जान जाता है।"

फिर वो उठे।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"जी।"

"जब वो बोले," उन्होंने कहा, "तू बीच में मत बोलना।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो तुझसे बोलवाना चाहता है," उन्होंने कहा। "वो तुझे अंदर खींचेगा, तेरी बात को मोड़ेगा, और फिर कहेगा कि देखो, यह लड़का गुस्से में है, इसकी बात में दम नहीं। तू चुप रहेगा, तो वो डरेगा। चुप्पी की आदत नहीं है उसे।"

मैंने सिर हिलाया।

"और एक बात," उन्होंने कहा। "जब वो जाने लगे, तो उसकी गाड़ी नहीं देखना। उसके जूते देखना।"

"जूते?"

"आज सुबह गली में जो आया," उस्ताद ने कहा, "उसके जूते बहुत साफ़ थे। इतने साफ़ कि गली की धूल उनसे अलग लग रही थी। आज शाम को वो बाहर नहीं उतरेगा। वो गाड़ी से ही बोलेगा।"

उन्होंने लाठी उठाई।

"तब उसके जूते कैसे देखूँ?" मैंने पूछा।

उस्ताद मुस्कुराए। बहुत धीमे से। जैसे यह सवाल उन्हें पसंद आया।

"वो उतरेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि वो जानता है कि अगर वो गाड़ी से नहीं उतरा, तो गली कहेगी कि डर गया। और यह बात वो बर्दाश्त नहीं कर सकता।"

वो चले गए।

शाम ढल रही थी। गली में वो पीली रोशनी फैल रही थी जो हर शाम आती है — जब पत्थर भी थोड़ा नरम लगता है और दुकानों के शटरों की आवाज़ भी थोड़ी धीमी।

मीरा ने कैमरा तिपाई पर लगाया।

"चल," उसने कहा। "गली के मुँह पर।"

हम चले।

दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे। उनकी नीली शर्ट। उनका पुराना रूमाल। जब हम गुज़रे, उन्होंने कुर्सी से हाथ उठाया।

"मैं यहीं हूँ," उन्होंने कहा। "अगर कुछ हो, तो पीछे मत देखना।"

मैंने सिर हिलाया।

गली के मुँह पर पीपल की छाया थी। मीरा ने तिपाई खड़ी की। कैमरा सेट किया। उसने एक बार कैमरे के छेद में देखा, फिर पीछे हटकर मुझे देखा।

"अंकुश," उसने कहा।

"हाँ।"

"अगर मैं सवाल पूछते वक़्त रुक जाऊँ," उसने कहा, "तो तू मेरी तरफ़ मत देखना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जब तू मेरी तरफ़ देखेगा," उसने कहा, "तो मुझे लगेगा कि तू सोच रहा है कि मैं गलत बोल रही हूँ। और मैं रुक जाऊँगी।"

मैंने सिर हिलाया।

"मैं नहीं देखूँगा," मैंने कहा। "मैं उसके जूते देखूँगा।"

वो हँसी। पहली बार आज उसकी हँसी में कुछ असली था।

धूप और नीचे आई। गली के मुँह पर एक लंबी परछाई आई, फिर चली गई। किसी बच्चे की गेंद आई और पत्थर से टकराकर लौट गई।

और फिर गाड़ी आई।

सफ़ेद। चमकदार। इतनी बड़ी कि गली के मुँह पर वो फँसी-सी लग रही थी, जैसे किसी ने समंदर का जहाज़ नाले में डाल दिया हो।

गाड़ी रुकी।

दो सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

फिर पीछे का दरवाज़ा खुला और रणवीर भारद्वाज उतरा।

सफ़ेद कपड़े। साफ़ कटा बाल। हाथ जोड़कर वो गली की तरफ़ मुड़ा।

और उसने मुस्कुराकर कहा, "राम राम।"

पीपल के नीचे कुछ लोगों ने सिर हिलाया। कोई बोला नहीं।

रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा। मुझे। फिर मीरा की तरफ़। और फिर उसके चेहरे पर वो भाव आया जो लोग तब लाते हैं जब उन्हें किसी चीज़ की उम्मीद नहीं थी और वो चीज़ सामने मिल गई।

"तो यह है वो पत्रकार," उसने कहा। "जो बिना माइक के सवाल पूछती है।"

मीरा ने कैमरा उठाया।

"जी," उसने कहा। "और यह कैमरा है। आपको दिक्कत होगी?"

रणवीर हँसा।

"मुझे कैमरे से क्या दिक्कत होगी, बेटा," उसने कहा। "मैं तो रोज़ कैमरों के सामने रहता हूँ। मेरी तस्वीरें गली-गली में लगी हैं। कैमरा मेरा घर है।"

"तो घर में आइए," मीरा ने कहा।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी।

मीरा ने पहला सवाल पूछा। उसकी आवाज़ साफ़ थी। एक भी काँप नहीं।

"अस्पताल की ज़मीन पर नीलामी का नोटिस आया है," उसने कहा। "उस पर चंद्रेश सक्सेना के हस्ताक्षर हैं। आप उन्हें जानते हैं?"

रणवीर मुस्कुराया।

"चंद्रेश मेरा वकील है," उसने कहा। "वकील हस्ताक्षर करते हैं। यह उनका काम है।"

"तो ज़मीन आपको चाहिए?"

"मुझे ज़मीन नहीं चाहिए," रणवीर ने कहा। "मुझे शहर चाहिए। और शहर को अस्पताल चाहिए। नया अस्पताल। बड़ा अस्पताल। जिसमें नई मशीनें हों, नए बेड हों, और ऐसे डॉक्टर हों जो सत्तर साल की उम्र में भी लाठी टेककर मरीज़ न देखें।"

उसने हाथ जोड़े। जैसे किसी सभा में भाषण दे रहा हो।

"मैं नूर अस्पताल को बंद नहीं कर रहा," उसने कहा। "मैं उसे बेहतर बना रहा हूँ। पुरानी दीवारें गिरेंगी, नई बनेंगी। और उस नई इमारत में डॉक्टर इसरानी के नाम का एक वार्ड होगा। उनकी बीवी के नाम का भी।"

मीरा ने कैमरा थोड़ा और ऊपर किया।

"और जो लोग इस ज़मीन पर रहते हैं?" उसने पूछा। "गली, बाज़ार, पीछे की झुग्गी?"

"उनके लिए नए फ्लैट," रणवीर ने कहा। "सबको। एक-एक को। मैं किसी को बाहर नहीं फेंकूँगा।"

"कितने में?"

"क्या?"

"नए फ्लैट कितने में देंगे?"

रणवीर ने एक पल रुककर उसका चेहरा देखा।

"बेटा," उसने कहा, "यह मोल-भाव मेरे पास नहीं होता। यह सब दफ़्तर में तय होता है। तुम मेरे दफ़्तर आ जाओ, फ़ाइल लेकर बैठो, पूरी डिटेल में बात होगी। चाय पिलाऊँगा।"

"मैं दफ़्तर नहीं आऊँगी," मीरा ने कहा। "मैं यहीं पूछ रही हूँ। और आप अभी हाँ या ना बोलिए।"

गली में एक भी आवाज़ नहीं थी।

शबनम आपा बेंच पर बैठी थीं। उनकी चिमटी हाथ में थी। उन्होंने उसे नीचे नहीं रखा।

रज्जो बाई अपनी बाल्टी लेकर नल के पास खड़ी थीं और बाल्टी झुकी हुई थी, पानी गिर रहा था, पर वो उसे रोक नहीं रही थीं।

भोला भाई अपनी दुकान के शटर के पास खड़े थे, हाथ में पेचकस।

टिंकू साइकिल के पीछे खड़ा था। उसने अपनी जेब में हाथ डाला था। मुझे पता था उसकी जेब में क्या है।

रणवीर ने एक गहरी साँस ली।

"अच्छा," उसने कहा। "तुम पूछो। मैं बोलूँगा। पर पहले तुम यह बताओ — तुम्हें इन सब बातों में इतनी दिलचस्पी क्यों है? तुम गली की लड़की नहीं हो। तुम्हारा घर यहाँ नहीं है।"

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